
जेन ज़ी के आंदोलन से क्या बदलेगी राजनीति ? (Photo: ChatGpt)
CJP : पहले दिन से ही संसद की कार्यवाही बाधित हो रही है। पिछले दिनों "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) के बैनर तले युवा आंदोलन ने ‘चलो संसद’ मार्च के जरिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफे की मांग उठाई। उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना। 20 जुलाई को मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर और संसद मार्ग पर मोबाइल जैमर लगाए, भारी सुरक्षा बल तैनात किए और लाठीचार्ज व आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदन में कई बार स्थगित हुआ।
CJP आंदोलन की शुरुआत एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान के रूप में हुई, जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोज़गार युवाओं की तुलना “क्रॉकरोच” (cockroaches) से की थी। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद अभिजीत दिपके ने सीजेपी की ऑनलाइन नींव रखी।दरअसल सीजेआई की टिप्पणी से युवा वर्ग आहत हो गया और आंदोलन शुरू हो गया। इस पार्टी की सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रियता बढ़ती चली गई। इंस्टाग्राम पर इसके कई मिलियन फॉलोअर्स हो गए।
आंदोलन ऑनलाइन से सड़कों पर भी उतर आया। CJP का पहला विरोध प्रदर्शन 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ, इसके बाद 11 जून को पुणे में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय परिसर में प्रदर्शन हुआ। प्रधान के इस्तीफे की मांग पूरी न होने पर 20 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया, जो मानसून सत्र के दौरान 'चलो संसद' मार्च के रूप में और बड़ा हो गया। हजारों छात्र, अभिभावक और शिक्षक इसमें शामिल हुए और पुलिस की रोकने की कोशिशों के बावजूद प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से जारी रहा।
संसद में विपक्ष ने CJP आंदोलन का मुद्दा उठाया। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पुलिस कार्रवाई की निंदा की और कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों को दबाने की कोशिश कर रही है। लोकसभा में भी NEET पेपर लीक, राम मंदिर में दान की चोरी और CJP आंदोलन को लेकर विपक्ष ने जोरदार विरोध किया, जिससे दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार बाधित हुई।
सरकार ने CJP से बातचीत की पहल की। केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने आंदोलन के प्रतिनिधियों से मुलाकात की, लेकिन किसी मांग पर तत्काल सहमति नहीं दी गई। सरकार ने कड़े कानून की घोषणा की और तेज़-ट्रैक अदालतों में पेपर लीक मामलों की सुनवाई का भरोसा दिलाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वीडियो संदेश में यह आश्वासन दिया।
आंदोलन में निर्णायक मोड़ तब आया जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। CJP ने इसे अपनी "राजनीतिक जीत" और "लोकतंत्र की जीत" बताया, और सरकार से तीन प्रमुख मांगें मनवाने के बाद जंतर-मंतर पर जारी धरना समाप्त कर दिया — इनमें छात्र आत्महत्या के मामलों में मुआवजा, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई वापस लेना और पुलिस की माफी जैसी मांगें शामिल थीं।
यह आंदोलन बताता है कि युवा वर्ग अब सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि संसद की राजनीति में भी अपनी आवाज़ बुलंद कर रहा है। एक व्यंग्यात्मक शुरुआत ने वास्तविक राजनीतिक दबाव में तब्दील होकर सरकार को कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया। यह दर्शाता है कि संसदीय या चुनावी राजनीति में अब युवा आंदोलनों और सोशल मीडिया की ताकत को नजरअंदाज नहीं कर किया जा सकता।
CJP ने आंदोलन तो समाप्त कर दिया है, लेकिन उन्होंने सरकार से जो वादे लिए हैं, उनका पालन होना जरूरी है। छात्र आत्महत्या के मामलों में मुआवजा, पुलिस कार्रवाई की समीक्षा और शिक्षा प्रणाली में सुधार जैसे वायदों को अब जमीन पर उतारा जाना चाहिए। सांसदों को भी इन मांगों को संसद में उठाकर जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि युवा आंदोलन अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। वे संसद की राजनीति को भी प्रभावित कर रहे हैं और सांसदों को इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझना और जवाबदेही के साथ काम करना होगा, तभी लोकतंत्र की जमीन मजबूत बनेगी।
Updated on:
29 Jul 2026 11:49 am
Published on:
29 Jul 2026 11:35 am
