
दुनियाभर में घट रही पक्षियों की आबादी (फोटो- AI)
Climate Change Effect: प्रवासी पक्षी (Migratory Birds) हर साल हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं और बीज फैलाने, पौधों के परागण, कीट नियंत्रण तथा पोषक तत्वों के वितरण जैसे कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिक कार्य करते हैं। अब दुनिया के आधे से ज्यादा प्रवासी पक्षियों की आबादी (Bird Population) घट रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल पक्षियों का संकट नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी के पर्यावरण और जैव विविधता (Environment and Biodiversity) के बिगड़ते स्वास्थ्य का संकेत है।
हालिया वैश्विक समीक्षा में पाया गया कि दुनिया की 3,380 प्रवासी पक्षी प्रजातियों में से 50% से अधिक की संख्या घट रही है। यह रिसर्च अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के अर्थ कॉमन्स इंस्टीट्यूट के डीन पीटर मारा के नेतृत्व में की गई। यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल नेचर रिव्यूज बायोडायवर्सिटी में प्रकाशित की गई है। इस अध्यन में शोधकर्ताओं ने दुनिया की 3,380 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों की स्थिति, उन पर मंडरा रहे खतरों और उनके संरक्षण के प्रयासों का व्यापक आकलन किया। रिसर्च में पता चला कि कुल 3,380 में आधे से ज्यादा प्रजातियां (51%) पूरी दुनिया में घट रही हैं।
अध्ययन के मुताबिक, विदेशी पक्षी सिर्फ यात्री नहीं हैं। प्रवास पर आए पक्षी पौधों का परागण करते हैं, बीज फैलाते हैं, खेती को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों पर नियंत्रण रखते हैं। इसके अलावा पक्षी पारिस्थितिकी तंत्रों के बीच पोषक तत्वों का स्थानांतरण करने और इकोटूरिज्म के जरिए स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में सहायत हैं। इसलिए पक्षियों की घटती संख्या का मतलब सिर्फ जैव विविधता में कमी नहीं, बल्कि यह उस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में बढ़ती दरार का संकेत है। पारिस्थितिकी तंत्र पर इंसान और वन्यजीव दोनों निर्भर हैं।
कॉमन्स इंस्टीट्यूट के डीन पीटर मारा के मुताबिक, प्रवासी पक्षियों की संख्या में गिरावट जलवायु परिवर्तन का बड़ा संदेश है। पीटर मारा की टीम ने ही 2019 में एक अध्ययन करके बताया था कि 1970 के बाद से उत्तर अमेरिका में करीब 3 अरब पक्षी घट चुके हैं। यह आंकड़ा पक्षियों की कुल आबादी का करीब एक-तिहाई है।
शोधार्थियों ने पक्षियों की घटती आबादी के पीछे इंसानी गतिविधियों को बड़ी वजह बताया है। शोध के अनुसार, पक्षियों की आबादी घटने के पीछे मुख्य वजह- आवास का विनाश (जंगल कटाई, खेती का विस्तार, शहरीकरण), कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल, अवैध शिकार, इमारतों-बिजली की तारों से टकराव और मछली पकड़ने के जाल में फंसना है। शोधार्थी पीटर मारा के मुताबिक, पिछले 40-50 वर्षों में ज्यादातर पक्षियों की आबादी में भारी गिरावट आई है और कुछ प्रजातियों में यह गिरावट पिछले 10-15 वर्षों में और तेज हुई है।
पक्षियों की लगातार कम हो रही संख्या में जलवायु परिवर्तन का असर भी दिख रहा है। हालांकि, पक्षियों की आबादी में गिरावट और विलुप्त हो रही प्रजातियों के पीछे मुख्यतः आवास हानि, आक्रामक प्रजातियों, प्रदूषण और अत्यधिक शिकार जैसे कारण शामिल हैं।शोधकर्ताओं का कहना है कि ज्यादातर प्रवासी पक्षी अपने पूरे वार्षिक चक्र का बड़ा हिस्सा संरक्षित क्षेत्रों से बाहर बिताते हैं, इसलिए सिर्फ क्षेत्र-आधारित संरक्षण योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं।
भारत सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (मध्य एशियाई प्रवास मार्ग) का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मार्ग साइबेरिया से लेकर मालदीव तक करीब 30 देशों को जोड़ता है, जिसमें भारत फ्लाईवे के आखिरी छोर पर स्थित है। भारत में अब तक करीब 1,349 पक्षी प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें से लगभग 370 प्रजातियां प्रवासी मानी जाती हैं और 3 प्रमुख फ्लाईवे से होकर आती हैं। इस लिहाज से प्रवासी पक्षियों की वैश्विक गिरावट भारत के लिए भी सीधे तौर पर चिंता का विषय है, खासकर नमी वाली जगह और तटीय क्षेत्रों के लिए, जहां हर बार सर्दी के मौसम में लाखों पक्षी शरण लेते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट अभी पलटा जा सकता है, लेकिन इसके लिए आवास संरक्षण, कीटनाशकों पर नियंत्रण, शिकार पर रोक और वैश्विक स्तर पर समन्वित नीतियों की जरूरत होगी। अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो आगामी दशकों में पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं।
भारत में पक्षियों की आबादी और उनकी विविधता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। देश में पक्षियों की 900 से अधिक प्रजातियों का आकलन किया गया है, जिससे यह पता चलता है कि पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन प्रजातियों के दीर्घकालिक आंकड़ों का अध्ययन किया गया, उनमें से लगभग 60 प्रतिशत पक्षियों की संख्या में पिछले 30 वर्षों में गिरावट दर्ज की गई है। पर्यावरणविद और पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण हैं।
प्राकृतिक आवासों का तेजी से नष्ट होना, वनों की कटाई, अंधाधुंध शहरीकरण, कृषि में कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग और जलवायु परिवर्तन पक्षियों के लिए बड़े खतरे बन गए हैं। विशेष रूप से घास के मैदानों (Grasslands), आर्द्रभूमि (Wetlands) और वनों में रहने वाले विशिष्ट पक्षी, जैसे कि विभिन्न प्रकार के गिद्ध, बत्तख और प्रवासी पक्षी सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
आर्कटिक और यूरेशिया से आने वाले लंबे सफर के प्रवासी पक्षियों की संख्या में भी 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। हालांकि, कुछ प्रजातियां ऐसी भी हैं, जो खुद को नए वातावरण के अनुसार ढालने में सफल रही हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय राष्ट्रीय पक्षी मोर, एशियन कोयल, और कबूतर जैसी सामान्य प्रजातियों की आबादी में वृद्धि या स्थिरता देखी गई है। इसके बावजूद, पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षियों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण किया जाए। प्रदूषण पर लगाम लगाई जाए और लुप्त हो रही प्रजातियों के लिए विशेष कार्ययोजनाएं लागू की जाएं।
Updated on:
29 Jul 2026 08:10 pm
Published on:
29 Jul 2026 08:10 pm
