
पहला संविधान संशोधन (Photo: IANS)
चंपाकम दोरैयाराजन बनाम मद्रास राज्य का मामला भारतीय संविधान और आरक्षण नीति की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। इस फैसले से यह साफ हुआ कि संविधान में निहित मौलिक अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका कितनी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
मद्रास प्रेसिडेंसी ने 1927 में एक "Communal G.O." (सरकारी आदेश) जारी किया था, जिसके तहत मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में हर 14 सीटों में से 6 सीटें गैर-ब्राह्मण हिंदुओं, 2 पिछड़े हिंदुओं, 2 ब्राह्मणों, 2 हरिजनों, 1 एंग्लो-इंडियन/ईसाई और 1 मुस्लिम के लिए आरक्षित की गई थीं। यह आदेश आज़ादी के बाद, संविधान लागू होने के बाद भी प्रभावी बना रहा। इसका उद्देश्य सामाजिक न्याय था, लेकिन यह व्यवस्था पूरी तरह जाति और धर्म के आधार पर लागू की गई थी।
1950 में श्रीमती चंपाकम दोरैयाराजन को यह पता चला कि इस आदेश के चलते ब्राह्मण होने के कारण उन्हें मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिलेगा। उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर की, जिसमें तर्क दिया कि यह आदेश उनके मौलिक अधिकार विशेषकर अनुच्छेद 15(1) और 29(2) का उल्लंघन करता है। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने वास्तव में कॉलेज में आवेदन नहीं किया था। उन्होंने केवल इस आधार पर दावा किया कि उन्हें ब्राह्मण होने के कारण प्रवेश नहीं मिलेगा। इसी तरह की एक याचिका सी.आर. श्रीनिवासन ने भी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश को लेकर दायर की थी। मद्रास उच्च न्यायालय ने 27 जुलाई 1950 को दोनों याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला दिया और आदेश को अवैध घोषित कर दिया।
मद्रास सरकार ने इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की (केस संख्या 270 और 271/1951)। 9 अप्रैल 1951 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकार विशेषकर अनुच्छेद 29(2) संविधान के भाग III में निहित हैं और उन्हें राज्य की किसी भी नीति या निदेशक सिद्धांत (Directive Principles, जैसे अनुच्छेद 46) से ऊपर माना जाना चाहिए। कोर्ट ने Communal G.O. को अनुच्छेद 13 के तहत असंवैधानिक घोषित कर दिया और मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले की पुष्टि की।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि इसने आरक्षण नीति को मौलिक अधिकारों के अधीन कर दिया। इससे पहले आरक्षण को सामाजिक न्याय का सीधा साधन माना जाता था, लेकिन इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक संविधान में स्पष्ट प्रावधान न हो, तब तक जाति-आधारित आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। इसी वजह से 1951 में संविधान का पहला संशोधन लाया गया, जिसमें अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, जिसने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की स्पष्ट अनुमति दी।
इस फैसले ने आरक्षण नीति के कानूनी ढांचे को पूरी तरह बदल दिया और यह स्पष्ट किया कि निदेशक सिद्धांत केवल मार्गदर्शक हैं, वे मौलिक अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकते।
चंपाकम दोरैयाराजन का यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता का भी प्रतीक था। उस समय आरक्षण को लेकर समाज में बहसें तेज़ थीं। इस फैसले ने आगे चलकर आरक्षण नीति की दिशा तय की और सुनिश्चित किया कि आरक्षण संविधान में स्पष्ट अनुमति मिलने पर ही लागू हो।
इस केस ने अन्य राज्यों को भी अपनी आरक्षण नीतियों की समीक्षा के लिए प्रेरित किया। तमिलनाडु ने बाद में अपना आरक्षण कोटा बढ़ाकर 69% तक कर दिया, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50% की सीमा से अधिक है। यह कोटा तमिलनाडु आरक्षण अधिनियम, 1994 के तहत संविधान की 9वीं अनुसूची में डालकर न्यायिक समीक्षा से बचाया गया और आज भी इसे लेकर बहस जारी है।
आरक्षण नीति की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करे, लेकिन संविधान की मर्यादा का उल्लंघन न हो। पाठकों के लिए अगला कदम यह हो सकता है कि वे यह समझें कि वर्तमान में आरक्षण नीति में क्या बदलाव आए हैं, संविधान में आगे और कौन-से संशोधन हुए हैं, और न्यायपालिका ने बाद में इस दिशा में क्या फैसले दिए हैं।
इस तरह, चंपाकम दोरैयाराजन बनाम मद्रास राज्य का फैसला भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर है, जिसने आरक्षण नीति को संविधान की कसौटी पर परखा और मौलिक अधिकारों की रक्षा को सर्वोपरि रखा। यह मामला आज भी प्रासंगिक है और सुनिश्चित करता है कि आरक्षण नीति संविधान के दायरे में रहकर ही लागू हो।
Updated on:
29 Jul 2026 03:50 pm
Published on:
29 Jul 2026 03:50 pm
