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क्या प्रियंका गांधी बनेंगी महिलाओं की असली आवाज़? जानें कैसे कर रही हैं राजनीति में बदलाव

Priyanka Gandhi: प्रियंका गांधी लोकसभा से लेकर सड़कों पर महिलाओं, छात्राओं और युवाओं के मुद्दे जोरदार ढंग से उठा रही हैं। उनकी लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ रही है। लोग उनमें इंदिरा गांधी की छवि भी देख रहे हैं। आइए प्रियंका गांधी के राजनीतिक सफर, महिला सशक्तिकरण, संसद में उनकी सक्रियता, ताकत, चुनौतियों और भारतीय राजनीति में उनकी बढ़ती भूमिका को विस्तार से जानिए।
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Priyanka gandhi

प्रियंका गांधी (Photo: ChatGpt)

प्रियंका गांधी वाड्रा ने 23 जनवरी 2019 को कांग्रेस की महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभाली, जिससे उनका औपचारिक राजनीतिक सफर शुरू हुआ। इससे पहले वे 2004 से ही अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के चुनाव अभियानों में सक्रिय रहीं, विशेषकर अमेठी और रायबरेली में। सितंबर 2020 में उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया गया। उनकी सक्रियता ने कांग्रेस को एक नई ऊर्जा दी। उनके राजनीति में आने से विशेषकर युवा और महिला मतदाताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ।

चुनाव में पहला कदम और संसद तक का सफर

उनका पहला चुनावी कदम 2024 में केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से हुआ, जब उन्होंने भाई राहुल गांधी द्वारा खाली की गई सीट पर उपचुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत हासिल की - 6,22,338 वोट (64.99%) और 4,10,931 वोटों के अंतर से। इस जीत के साथ ही गांधी परिवार के तीन सदस्य राहुल गांधी (लोकसभा), सोनिया गांधी (राज्यसभा) और प्रियंका गांधी (लोकसभा) एक साथ संसद में पहुंच गए। यह प्रियंका के राजनीतिक करियर का पहला चुनाव था और उनके लिए संसद में औपचारिक प्रवेश का जरिया बना।

महिला सशक्तिकरण का दिया ऐसे संदेश

प्रियंका गांधी ने "लड़की हूं, लड़ सकती हूं" अभियान की शुरुआत की, जिसके तहत कांग्रेस ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 40% टिकट देने की घोषणा की। हालांकि इस नीति का चुनावी असर सीमित रहा। कांग्रेस को उस चुनाव में केवल 2 सीटें मिलीं। फिर भी इस अभियान ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया, और कई सामाजिक संगठनों ने इसे एक प्रेरणादायक कदम बताया।

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर सक्रियता

अप्रैल 2026 में जब संविधान का 131वां संशोधन विधेयक, जो महिला आरक्षण को जल्द लागू करने से जुड़ा है, संसद में पेश हुआ। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन के नाम पर जनता को गुमराह कर रही है और इससे राज्यों के प्रतिनिधित्व व ओबीसी वर्ग के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन यह बहस असल मुद्दे यानी जल्द से जल्द प्रभावी आरक्षण से भटक रही है।

जमीनी छवि और जनसंपर्क

प्रियंका गांधी की सबसे बड़ी ताकत उनकी जनसंपर्क क्षमता और आम जनता से जुड़ने की शैली रही है। अक्टूबर 2021 में लखीमपुर खीरी हिंसा के दौरान पीड़ित किसान परिवारों से मिलने जाते समय उन्हें सीतापुर में पुलिस ने हिरासत में ले लिया था, जिससे उनकी छवि एक साहसी और मैदान में डटी रहने वाली नेता के रूप में बनी। उनकी भाषा सरल, भावनात्मक और स्थानीय संदर्भों से जुड़ी होती है, जो उन्हें आम जनता के बीच लोकप्रिय बनाती है। इस अंदाज़ ने उन्हें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में एक मजबूत जनाधार दिलाया है।

प्रियंका गांधी की ताकत और सीमाएं

क्या है उनकी ताकत?

  • परिवार की राजनीतिक विरासत और लोकप्रियता, विशेषकर उत्तर प्रदेश में।
  • महिलाओं के मुद्दों पर स्पष्ट और मुखर रुख।
  • सड़क से जुड़ने और जनभावनाओं को समझने की क्षमता।

क्या हैं उनके समक्ष चुनौतियां

  • चुनावी जीत का अनुभव सीमित है - अभी तक केवल एक उपचुनाव जीत।
  • "लड़की हूं, लड़ सकती हूं" जैसे अभियान का चुनावी असर अब तक सीमित रहा है।
  • संगठनात्मक और नीति-निर्माण में उनका अनुभव अभी विकसित हो रहा है।

क्या है आगे का रास्ता

प्रियंका गांधी के लिए अगला कदम यह होगा कि वे संसद में महिलाओं के मुद्दों को और मजबूती से उठाएं, संगठनात्मक नेतृत्व में अपनी भूमिका बढ़ाएं और चुनावी जीत को दोहराने की रणनीति बनाएं। यदि वे उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में सक्रियता दिखा पाती हैं, तो उनकी राजनीतिक पकड़ और मजबूत हो सकती है।

प्रियंका गांधी वाड्रा ने राजनीति में महिलाओं की आवाज़ को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। उनकी जनसंपर्क शैली, महिला सशक्तिकरण के लिए अभियान और संसद में सक्रियता उन्हें एक अलग पहचान देती है। लेकिन उन्हें संगठनात्मक और चुनावी धरातल पर अपनी ताकत को और मजबूत करना होगा। यदि वे ऐसा कर पाती हैं, तो वे सचमुच महिलाओं की एक प्रमुख आवाज़ बन सकती हैं, लेकिन यह सफर अभी जारी है।