
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
नमक उन गिनी-चुनी खाद्य वस्तुओं में है, जिसे खेत में बोया नहीं जाता। यह न चावल की तरह पानी में उगता है, न आम की तरह पेड़ पर फलता है। यह पूरी तरह सूरज, हवा और मौसम के नाजुक संतुलन का नतीजा है। जलवायु परिवर्तन ने नमक बनाने के इस सदियों पुराने गणित को बिगाड़ दिया है। आम धारणा है कि क्लाइमेट चेंज से गर्मी बढ़ेगी तो वाष्पीकरण तेज होगा और नमक जल्दी बनेगा, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट निकल रही है। अब यह सफेद क्रिस्टल सिर्फ एक मसाला नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग लड़कर आपकी थाली तक पहुंचा एक 'दुर्लभ रत्न' बनता जा रहा है
समुद्री जल से नमक बनाने के लिए खारे पानी को बड़े और उथले गड्ढों (क्यारियों) में इकट्ठा किया जाता है, जहां सूरज की रोशनी और हवा से पानी वाष्पीकृत हो जाता है और नीचे कच्चा नमक बच जाता है। इसके लिए लंबे समय तक सूखा मौसम, तेज धूप और बिना बारिश के दिन चाहिए होते हैं। भारत, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नमक उत्पादक देश है।
भारत में हर साल करीब 3 करोड़ टन नमक का उत्पादन होता है। नमक आयुक्त कार्यालय (साल्ट कमिश्नर ऑफिस) के अनुसार, देश के कुल उत्पादन में गुजरात की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। गुजरात में करीब 85% तक नमक का उत्पादन होता है। नमक उत्पादन में गुजरात के बाद राजस्थान और तमिलनाडु का नंबर आता है।
गेहूं, मक्का या सब्जियों का विकल्प जेनेटिक इंजीनियरिंग या पॉलीहाउस तकनीक से निकाला जा सकता है, लेकिन प्राकृतिक वाष्पीकरण से बनने वाले 'सफेद सोने' यानी नमक का कोई कृत्रिम विकल्प नहीं है। भावनगर स्थित सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSMCRI) जैसी वैज्ञानिक संस्थाएं अब ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैं, जिनसे प्रतिकूल मौसम में भी वाष्पीकरण की दर तेज की जा सके। जैसे- हीट-एब्जॉर्बिंग मैटेरियल, सोलर कंसंट्रेटर और मैकेनिकल टर्बुलेंस के इस्तेमाल से ब्राइन (खारे पानी) के वाष्पीकरण की रफ्तार 30-40 प्रतिशत तक बढ़ाने पर शोध चल रहा है। लेकिन जब तक ये तकनीकें व्यापक स्तर पर जमीन पर नहीं उतरतीं, तब तक उत्पादन घटने, कीमतें बढ़ने और छोटे नमक किसानों की आजीविका पर खतरा बरकरार रहेगा।
Updated on:
18 Sept 2026 07:57 pm
Published on:
18 Sept 2026 07:57 pm
