18 सितंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

समुद्र में बढ़ेगी भारत की ताकत: नौसेना के लिए अगली पीढ़ी के दूसरे मिसाइल पोत का निर्माण शुरू, जानें इसकी खासियत

भारतीय नौसेना के लिए अगली पीढ़ी के मिसाइल पोत का निर्माण शुरू किया गया है। यह पोत अत्याधुनिक हथियारों और सेंसर से लैस होगा, जिससे भारतीय नौसेना की युद्धक क्षमता को और मजबूती मिलेगी।
3 min read
Google source verification

भारत

image

Vinay Shakya

Sep 18, 2026

Indian Navy next generation missile frigate

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने की दिशा में एक और अहम कदम उठाया गया है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), कोच्चि में 17 सितंबर 2026 को अगली पीढ़ी के मिसाइल पोत (नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल वेसल/NGMV) परियोजना के दूसरे पोत की 'स्टील कटिंग' समारोह आयोजित की गई। इस मौके पर मुख्य अतिथि रियर एडमिरल कपिल मेहता, सहायक नियंत्रक युद्धपोत उत्पादन एवं अधिग्रहण रहे। भारतीय नौसेना और CSL के वरिष्ठ अधिकारी भी इस अवसर पर मौजूद रहे।

क्या है योजना?

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, कोचीन शिपयार्ड के साथ छह NGMV के निर्माण और आपूर्ति का अनुबंध 30 मार्च 2023 को किया गया था, जिसकी कुल कीमत करीब ₹9,804 करोड़ आंकी गई है। परियोजना के पहले पोत (यार्ड नंबर BY-531) की स्टील कटिंग 16 दिसंबर 2024 को हो चुकी है और नौसेना में पहले पोत के शामिल होने की योजना मार्च 2027 से बनाई गई है, बाकी पोत उसके बाद के वर्षों में चरणबद्ध तरीके से नौसेना को सौंपे जाएंगे।

नए युद्ध पोत की खासियत

NGMV को हाई-स्पीड युद्धपोत के तौर पर डिजाइन किया गया है, जिसकी लंबाई करीब 89 मीटर और भार क्षमता लगभग 1,437 टन होगी। यह पोत सरफेस-टू-सरफेस मिसाइल सिस्टम (ब्रह्मोस), एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयर सर्विलांस और फायर कंट्रोल रडार जैसे अत्याधुनिक हथियारों और सेंसरों से लैस होगा। इसके अलावा इसमें OTO मेलारा 76mm सुपर रैपिड गन, AK-630M क्लोज-इन वेपन सिस्टम, VL-SRSAM हवाई रक्षा मिसाइल, VSHORAD एंटी-ड्रोन सिस्टम और कवच डिकॉय सिस्टम भी लगाए जाएंगे। पोत की अधिकतम रफ्तार करीब 35 नॉट (करीब 65 किमी/घंटा) होगी।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस पोत की मुख्य भूमिका दुश्मन के युद्धपोतों, व्यापारिक जहाजों और स्थल लक्ष्यों के खिलाफ आक्रामक क्षमता प्रदान करना है। ये पोत मैरीटाइम स्ट्राइक ऑपरेशन और एंटी-सरफेस वारफेयर ऑपरेशन में सक्षम होंगे और खासतौर पर चोक पॉइंट्स पर दुश्मन के जहाजों के लिए 'सी-डिनायल' का असरदार हथियार साबित होंगे। रक्षात्मक भूमिका में इनका इस्तेमाल लोकल नेवल डिफेंस और अपतटीय विकास क्षेत्र (ऑफशोर डेवलपमेंट एरिया) की सुरक्षा के लिए भी किया जाएगा।

स्वदेशी उपकरणों से तैयार हो रहा पोत

सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस युद्ध पोत की भूमिका तय करने वाले सभी प्रमुख उपकरण देश में ही विकसित और निर्मित किए गए हैं। यह 'आत्मनिर्भर भारत', 'मेक इन इंडिया' और 'मेक फॉर द वर्ल्ड' पहल के अनुरूप है। यह परियोजना कोचीन शिपयार्ड के लिए भी एक बड़ा कदम है, क्योंकि यह पहली बार है जब CSL इतने अधिक हथियारों से लैस युद्धपोत श्रेणी का निर्माण कर रहा है।

क्या पड़ेगा असर?

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इन पोतों के बेड़े में शामिल होने से भारतीय नौसेना की हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में तेज, आक्रामक और सटीक हमले की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। छोटे आकार और तेज रफ्तार के चलते ये पोत समुद्री चोक पॉइंट्स जैसे- मलक्का जलडमरूमध्य या होरमुज के आसपास के इलाके पर दुश्मन की नौसैनिक आवाजाही को रोकने (सी-डिनायल) में कारगर होंगे।

ब्रह्मोस मिसाइल से लैस होने के चलते ये पोत तटीय क्षेत्रों और अपतटीय तेल-गैस प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को भी मजबूत करेंगे। इसके साथ ही, पूरी तरह स्वदेशी हथियार-प्रणाली होने से भारत की रक्षा आपूर्ति शृंखला विदेशी निर्भरता से मुक्त होगी और घरेलू रक्षा उद्योग व रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा।

नौसेना में 'INS निपुण' शामिल होने से ताकत बढ़ी

हाल ही में स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट पोत 'INS निपुण' भी नौसेना के बेड़े में शामिल हुआ है। इसे 31 अगस्त 2026 को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन की मौजूदगी में कमीशन किया गया। हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड, विशाखापत्तनम द्वारा निर्मित यह पोत निस्तार श्रेणी का दूसरा और अंतिम डाइविंग सपोर्ट वेसल है।

पहला पोत 'INS निस्तार' जुलाई 2025 में पूर्वी कमान (विशाखापत्तनम) में शामिल हुआ था। निपुण की तैनाती पश्चिमी तट (मुंबई) पर हुई है, जिससे नौसेना को अब पूर्वी और पश्चिमी, दोनों समुद्री तटों पर समर्पित गहरे समुद्र बचाव क्षमता हासिल हो गई है। यह पोत 300 मीटर तक सैचुरेशन डाइविंग और डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (DSRV) के जरिए 650 मीटर तक की गहराई से पनडुब्बी चालक दल को बचाने में सक्षम है। इसके निर्माण में 120 से अधिक भारतीय MSME शामिल रहे और इसमें करीब 75-80 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है।