
3D ब्रेन स्कैन ने डोडो की संवेदनशीलता, सूंघने की क्षमता और बुद्धिमत्ता का नया सच उजागर किया। ( विजुअल: AI)
दुनिया के सबसे चर्चित और रहस्यमयी विलुप्त जीवों में शामिल डोडो पक्षी (Dodo Bird) को लेकर सदियों से एक ही धारणा चली आ रही थी कि वह बहुत सुस्त, अनाड़ी और बुद्धिहीन जीव था। यहाँ तक कि आम बोलचाल में भी डोडो को मूर्खता का प्रतीक मान लिया गया था। हालांकि, कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी और लेथब्रिज यूनिवर्सिटी (कनाडा) के अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की ओर से किए गए एक नये और अभूतपूर्व अध्ययन ने इस प्राचीन मिथक को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।
वैज्ञानिकों ने आधुनिक उच्च-रिज़ॉल्युशन सीटी स्कैन (High-Resolution CT Scan) तकनीक का उपयोग कर के डोडो की दुर्लभ खोपड़ियों की जांच की है। इस शोध से यह बात सामने आई है कि डोडो के पास एक जटिल और विकसित संवेदी प्रणाली थी। इसकी सूंघने की क्षमता बहुत तीव्र थी, इसकी विशाल ऊपरी चोंच स्पर्श को पहचानने में बहुत संवेदनशील थी और यह केवल दिन में ही नहीं, बल्कि सुबह से शाम तक सक्रिय रहने वाला जीव था।
वर्तमान में पूरे विश्व में डोडो की केवल दो ही पूर्ण खोपड़ियाँ संरक्षित बची हैं:
डेनमार्क का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय (Natural History Museum of Denmark, Copenhagen)
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय (Oxford University Museum of Natural History)
कोपेनहेगन के संग्रहालय में रखी खोपड़ी सदियों से वैज्ञानिकों की पहुंच में थी, लेकिन आगामी 2027 में खुलने वाली नई गैलरीज की तैयारी के सिलसिले में शोधकर्ताओं को इसका गहराई से अध्ययन करने का अवसर मिला।
रिसर्चर्स ने बिना किसी भौतिक क्षति के खोपड़ी का 3D डिजिटल पुनर्निर्माण तैयार किया। जब पक्षी का मस्तिष्क विकसित होता है, तो वह खोपड़ी की अंदरूनी हड्डियों पर अपनी गहरी छाप छोड़ता है। यद्यपि डोडो का दिमाग सदियों पहले समाप्त हो चुका है, लेकिन हड्डियों पर बने इन निशानों का अध्ययन कर के वैज्ञानिकों ने उसके दिमाग की केविटी का सटीक मॉडल तैयार कर लिया।
रिसर्च टीम ने डोडो के मस्तिष्क मॉडल की तुलना उसके निकटतम जीवित संबंधियों—आधुनिक कबूतरों (Pigeons) और फाख्ताओं (Doves) से की। इस तुलनात्मक अध्ययन में डोडो की शारीरिक और संवेदी क्षमताओं के बारे में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
आधुनिक कबूतरों की तुलना में डोडो के दिमाग में गंध संसाधित करने वाला क्षेत्र अधिक विकसित था। वह भोजन की तलाश और अपने परिवेश को समझने के लिए दृष्टि के साथ-साथ गंध पर भी बहुत हद तक निर्भर था।
रिसर्च टीम के अनुसार डोडो की विशाल ऊपरी चोंच केवल कठोर चीजों को तोड़ने के लिए नहीं थी, बल्कि उसमें सूक्ष्म स्पर्श को महसूस करने वाली तंत्रिकाओं के संकेत मिले हैं। इसकी मदद से वह जमीन में या पत्तियों के नीचे छिपे भोजन को छू कर पहचान सकता था।
आमतौर पर माना जाता था कि डोडो केवल तेज धूप वाले दिन में सक्रिय रहता था, लेकिन सीटी स्कैन से संकेत मिलता है कि इसका दैनिक चक्र सुबह के धुंधलके से लेकर शाम के अंधेरे तक फैला रहता था।
जूलॉजिकल जर्नल ऑफ द लिनियन सोसाइटी में प्रकाशित इस अध्ययन के सह-लेखक और डेनमार्क के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में पक्षी विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर पीटर एंड्रयू होस्नर कहते हैं:
"डोडो दुनिया का सबसे आसानी से पहचाना जाने वाला विलुप्त जानवर है, लेकिन विडंबना यह है कि यह वास्तव में कैसे जीता था, इसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। केवल दो पूर्ण खोपड़ियों की डिजिटल तुलना करने से हमें यह समझने का एक अनूठा अवसर मिला कि यह पक्षी मॉरीशस के अपने वातावरण को कैसे महसूस करता था।"
इसी अध्ययन की सह-लेखिका और एसोसिएट प्रोफेसर क्रिस्टी अन्ना हिप्सली के अनुसार:
"विलुप्त जीवों का अध्ययन करना किसी जासूसी कहानी से कम नहीं है। डोडो का दिमाग भले ही लुप्त हो गया हो, लेकिन खोपड़ी के अंदर उसने अपनी छाप छोड़ी है। उस स्थान का डिजिटल निर्माण करके हम यह समझ पा रहे हैं कि डोडो दुनिया के साथ कैसे बातचीत करता था।"
सतरहवीं शताब्दी के अंत में मॉरीशस द्वीप पर मनुष्यों के आगमन और उनके लाए गए जानवरों (जैसे सूअर, कुत्ते और चूहे) के कारण डोडो तेजी से विलुप्त हो गया। चूंकि इस द्वीप पर डोडो का कोई प्राकृतिक शिकारी नहीं था, इसलिए लाखों वर्षों के विकासक्रम में उसने बिना उड़ने वाले और शांत स्वभाव वाले जीव का रूप ले लिया था।
रिसर्चर्स का साफ तौर पर कहना है कि डोडो का विलुप्त होना उसकी कम संज्ञानात्मक क्षमता (Cognitive Ability) या 'बेवकूफी' के कारण नहीं था, बल्कि वह एक अलग द्वीप पर विकसित हुई अद्वितीय संवेदी अनुकूलन प्रणाली का परिणाम था।
बहरहाल,कोपेनहेगन विश्वविद्यालय का यह अध्ययन डोडो के प्रति मानव दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव लाता है। सीटी स्कैन और आधुनिक डिजिटल मॉडलिंग की मदद से अब वैज्ञानिक अनुमानों से आगे बढ़ कर ठोस साक्ष्यों के आधार पर डोडो के जीवन की सटीक तस्वीर पेश कर रहे हैं। डोडो केवल विलुप्त होने का प्रतीक नहीं है, बल्कि जैव-विकास (Evolution) की एक अत्यंत जटिल और अनसुलझी पहेली है।
Updated on:
09 Aug 2026 03:49 pm
Published on:
09 Aug 2026 03:49 pm
