
बिजली कटने पर आप क्या-क्या कर सकते हैं?
बिजली का बिल समय पर जमा करने के बाद उपभोक्ता की उम्मीद होती है कि उसे तय मानकों के मुताबिक बिजली मिलेगी। लेकिन गर्मियों में लंबी बिजली कटौती, ट्रांसफॉर्मर खराब होने, लो-वोल्टेज या अचानक बढ़े हुए बिल जैसी शिकायतें आम हैं। ऐसे में सवाल है…क्या उपभोक्ता सिर्फ शिकायत कर सकता है या उसके पास मुआवजा मांगने का भी अधिकार है?
भारत में बिजली उपभोक्ताओं के अधिकारों को Electricity (Rights of Consumers) Rules, 2020 के तहत स्पष्ट किया गया है। इन नियमों के मुताबिक उपभोक्ता को वितरण कंपनी से न्यूनतम सेवा मानक के मुताबिक बिजली पाने का अधिकार है। साथ ही राज्य बिजली नियामक आयोगों को अलग-अलग सेवाओं के लिए समय-सीमा और मानक तय करने होते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि बिजली कुछ घंटे बंद होते ही उपभोक्ता को अपने आप पैसे मिलने लगेंगे। बिजली आपूर्ति के Standards of Performance राज्य की बिजली नियामक आयोग तय करते हैं। अगर वितरण कंपनी इन निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करती, तो नियमों के अनुसार मुआवजे की व्यवस्था हो सकती है। मुआवजे की राशि और दावा करने की प्रक्रिया राज्य के नियमों पर निर्भर करती है।
सबसे पहले यह पता करना जरूरी है कि कटौती planned outage, स्थानीय खराबी, ट्रांसफॉर्मर फेल होने या किसी बड़े तकनीकी कारण से हुई है। इसके बाद वितरण कंपनी के हेल्पलाइन नंबर, मोबाइल ऐप, वेबसाइट या स्थानीय शिकायत केंद्र पर शिकायत दर्ज करें।
सिर्फ फोन करके शिकायत करने के बजाय complaint number जरूर लें। यही नंबर बाद में यह साबित करने में मदद करता है कि आपने समस्या कब दर्ज कराई थी और कितनी देर तक उसका समाधान नहीं हुआ।
केंद्रीय नियमों के तहत वितरण कंपनियों को उपभोक्ताओं के लिए 24x7 टोल-फ्री कॉल सेंटर की व्यवस्था करनी है और शिकायतों की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक करने की सुविधा भी देनी है।
ट्रांसफॉर्मर फेल होने की स्थिति में भी उपभोक्ता को अनिश्चित समय तक बिजली के बिना रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। इसकी वास्तविक समय-सीमा संबंधित राज्य के Standards of Performance में तय होती है।
उदाहरण के लिए राजस्थान के मौजूदा प्रदर्शन मानकों में डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर फेल होने पर Class-1 शहरों और शहरी क्षेत्रों में 8 घंटे तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 24 घंटे के भीतर सप्लाई बहाल करने का मानक दिया गया है। दूसरे राज्यों में समय-सीमा अलग हो सकती है।
यानी पूरे देश के लिए 'ट्रांसफॉर्मर इतने घंटे में ठीक होगा' का एक ही आंकड़ा नहीं है। अपने राज्य के बिजली नियामक आयोग के नियम देखना जरूरी है।
मान लीजिए सामान्य तौर पर आपका बिल ₹1,000-2,000 आता है, लेकिन अचानक ₹20,000 का बिल आ गया। ऐसी स्थिति में इसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
नियमों के अनुसार बिजली बिल सामान्यतः वास्तविक मीटर रीडिंग के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए। उपभोक्ता को बिल की जानकारी समय पर मिलनी चाहिए। अगर मीटर की रीडिंग उसकी वास्तविक खपत से मेल नहीं खाती, तो उपभोक्ता मीटर की जांच की मांग कर सकता है।
अगर मीटर जांच में गलत या inaccurate पाया जाता है, तो अतिरिक्त या कम वसूले गए शुल्क को बाद के बिलों में समायोजित किया जाना चाहिए, जैसा संबंधित आयोग के नियमों में निर्धारित है।
अगर उपभोक्ता को लगता है कि मीटर गलत रीडिंग दे रहा है, तो वह वितरण कंपनी से मीटर टेस्ट कराने की मांग कर सकता है। केंद्रीय नियमों के मुताबिक ऐसी शिकायत मिलने पर मीटर की जांच संबंधित आयोग द्वारा तय समय के भीतर की जानी चाहिए, जो 30 दिन से ज्यादा नहीं हो सकता।
मीटर गलत पाए जाने पर अतिरिक्त या कम बिल की राशि का समायोजन किया जा सकता है। अगर उपभोक्ता कंपनी की जांच रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं है, तो नियमों के तहत अनुमोदित तीसरे पक्ष की टेस्टिंग एजेंसी से जांच कराने का विकल्प भी मौजूद है।
यहीं उपभोक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था आती है। बिजली कंपनी से शिकायत करने के बाद भी समस्या हल नहीं होती तो मामला Consumer Grievance Redressal Forum (CGRF) में ले जाया जा सकता है। Electricity Act, 2003 की धारा 42(5) के तहत वितरण लाइसेंसधारी को उपभोक्ताओं की शिकायतों के निपटारे के लिए ऐसा फोरम स्थापित करना होता है।
अगर CGRF के स्तर पर भी उपभोक्ता संतुष्ट नहीं है, तो वह संबंधित Electricity Ombudsman के पास जा सकता है। यह व्यवस्था भी Electricity Act की धारा 42 में दी गई है।
शिकायत की सीढ़ी समझिए : बिजली कंपनी/डिस्कॉम → शिकायत नंबर → CGRF → Electricity Ombudsman
हर शिकायत के लिए सीधे अदालत या बड़े अधिकारी के पास जाने की जरूरत नहीं होती। पहले निर्धारित शिकायत व्यवस्था का इस्तेमाल करना ज्यादा प्रभावी रहता है।
जरूरी नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। मुआवजा तभी लागू होगा जब संबंधित राज्य के Standards of Performance में उस सेवा या उल्लंघन के लिए compensation का प्रावधान हो और उस मामले में निर्धारित शर्तें पूरी होती हों। कुछ ऐसे मानक भी हैं जिनकी निगरानी दूर से की जा सकती है और नियमों में automatic compensation की व्यवस्था का प्रावधान है।
Updated on:
09 Aug 2026 05:36 pm
Published on:
09 Aug 2026 05:36 pm
