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नदियों का पानी आखिर किसका है? एक राज्य दूसरे राज्य से पानी क्यों मांगता है? जानिए पूरी कहानी

Inter State River Water Disputes India : नदियों के पानी पर किस राज्य का कितना अधिकार है? जानिए कावेरी, यमुना और सतलुज-यमुना लिंक विवाद की पूरी कहानी, अनुच्छेद 262 और राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के कानूनी नियम।
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Water Crisis

पांच राज्यों से दिल्ली तक पानी की कहानी, PC- Chatgpt

भारत में नदियां सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि खेती, पीने के पानी, बिजली और उद्योगों की जीवनरेखा हैं। लेकिन जब एक नदी एक से ज्यादा राज्यों से होकर गुजरती है, तो सवाल उठता है। उस नदी के पानी पर अधिकार किसका है? क्या नदी के ऊपरी हिस्से में बसे राज्य का पानी पर ज्यादा हक है या नीचे बसे राज्य का भी बराबर अधिकार है?

यही सवाल कई बार राज्यों के बीच बड़े विवाद में बदल जाता है। कावेरी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु, सतलुज-यमुना लिंक यानी SYL को लेकर पंजाब और हरियाणा और यमुना को लेकर कई राज्यों के बीच लंबे समय से पानी के बंटवारे को लेकर मतभेद रहे हैं।

नदी का पानी किसी एक राज्य की निजी संपत्ति नहीं

भारत में अंतरराज्यीय नदी के पानी को लेकर व्यवस्था संविधान और संसद के कानूनों से तय होती है। संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतरराज्यीय नदियों के पानी के इस्तेमाल, बंटवारे और नियंत्रण से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। इसी व्यवस्था के तहत Inter-State River Water Disputes Act, 1956 बनाया गया।

यानी किसी राज्य का यह कहना कि नदी उसके क्षेत्र से निकलती या गुजरती है, इसलिए पूरा पानी उसी का है। अपने आप में अंतिम कानूनी आधार नहीं है। पानी के बंटवारे में नदी का पूरा बेसिन, उपलब्ध पानी, राज्यों की जरूरत, मौजूदा उपयोग और पहले हुए समझौतों जैसे कई पहलू देखे जाते हैं।

विवाद पैदा होने की बड़ी वजहें

  • नदी कई राज्यों से होकर गुजरती है
  • पानी की उपलब्धता हर साल समान नहीं रहती
  • खेती के लिए राज्यों की जरूरत अलग होती है
  • शहरों की आबादी और पेयजल मांग बढ़ती रहती है
  • बांध और बैराज के कारण पानी के प्रवाह पर नियंत्रण होता है
  • सूखे के समय हर राज्य अपने हिस्से को सुरक्षित रखना चाहता है

यही वजह है कि सामान्य साल में जिस बंटवारे पर सहमति रहती है, सूखे साल में वही व्यवस्था विवाद का कारण बन सकती है।

पानी की एक नदी, दो राज्यों की बड़ी लड़ाई

कावेरी विवाद भारत के सबसे चर्चित नदी जल विवादों में से एक है। इसके प्रमुख पक्ष कर्नाटक और तमिलनाडु हैं, जबकि केरल और पुडुचेरी भी विवाद की कानूनी व्यवस्था में पक्षकार रहे हैं। विवाद का मूल सवाल यह है कि कावेरी बेसिन के उपलब्ध पानी को अलग-अलग राज्यों के बीच किस तरह बांटा जाए।

कर्नाटक नदी के ऊपरी हिस्से में है और वहां बांधों तथा सिंचाई परियोजनाओं के जरिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है। तमिलनाडु नीचे की ओर है और ऐतिहासिक रूप से कावेरी के पानी पर उसकी कृषि व्यवस्था काफी निर्भर रही है। जब मानसून कमजोर होता है और जलाशयों में पानी कम रहता है, तब दोनों राज्यों की जरूरत और टकरा जाती है।

कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना फैसला दिया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र ने Cauvery Water Management Scheme बनाई, जिसमें Cauvery Water Management Authority और Cauvery Water Regulation Committee की व्यवस्था की गई।

इसका मतलब यह है कि विवाद खत्म होने के बाद भी पानी की निगरानी और बंटवारे को लेकर संस्थागत व्यवस्था जरूरी रहती है। 2025 में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कावेरी जल बंटवारे के फैसले के क्रियान्वयन से जुड़ी शिकायतों के लिए संबंधित प्राधिकरणों के पास जाने की व्यवस्था मौजूद है।

पांच राज्यों से दिल्ली तक पानी की कहानी

यमुना का मामला थोड़ा अलग है क्योंकि यहां सिर्फ दो राज्यों के बीच विवाद नहीं है। ऊपरी यमुना बेसिन में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली की हिस्सेदारी और जरूरतें जुड़ी हुई हैं।

1994 में पांच राज्यों और दिल्ली के बीच यमुना के पानी के बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। इसमें उपयोग योग्य जल संसाधन का राज्यों के लिए आवंटन तय किया गया। उदाहरण के तौर पर उस समझौते में हरियाणा के लिए 5.730 BCM, उत्तर प्रदेश के लिए 4.032 BCM, राजस्थान के लिए 1.119 BCM, हिमाचल प्रदेश के लिए 0.378 BCM और दिल्ली के लिए 0.724 BCM का वार्षिक आवंटन बताया गया था।

इसके लिए Upper Yamuna River Board की व्यवस्था भी की गई, जिसका उद्देश्य समझौते के तहत पानी के प्रबंधन और बंटवारे को लागू करना है।

यमुना विवाद की दिलचस्प बात यह है कि पानी की मांग सिर्फ सिंचाई के लिए नहीं है। दिल्ली के लिए यमुना और उससे जुड़े जल स्रोतों का महत्व पेयजल के कारण भी बहुत ज्यादा है। दूसरी तरफ हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की अपनी कृषि और पेयजल जरूरतें हैं।

नहर के रास्ते पानी का विवाद

पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर का विवाद बताता है कि नदी जल विवाद सिर्फ 'कितना पानी मिलेगा' का सवाल नहीं होता, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि वह पानी एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचेगा कैसे।

1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद पंजाब और हरियाणा के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का सवाल उठा। केंद्र के स्तर पर हुए निर्णयों के बाद हरियाणा के हिस्से के पानी को पहुंचाने के लिए SYL नहर की योजना बनी। हरियाणा का तर्क रहा कि उसे आवंटित पानी प्राप्त करने के लिए लिंक नहर जरूरी है, जबकि पंजाब ने विभिन्न समय पर पानी की उपलब्धता और अपने अधिकारों को लेकर आपत्ति जताई।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने 2016 में पंजाब को नहर के निर्माण से संबंधित दायित्व पूरा करने को लेकर निर्देश दिए थे और केंद्र को भी समाधान की दिशा में काम करने को कहा था। मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी पंजाब-हरियाणा के बीच SYL नहर का विवाद लंबित मुद्दे के रूप में दर्ज है।

फिर तय कौन करता है कि किसे कितना पानी मिलेगा?

जब राज्यों के बीच बातचीत से समाधान नहीं निकलता, तो अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के लिए कानूनी व्यवस्था के तहत जल विवाद न्यायाधिकरण बनाया जा सकता है। न्यायाधिकरण उपलब्ध आंकड़ों, नदी बेसिन, ऐतिहासिक उपयोग, सिंचाई और अन्य जरूरतों को देखकर पानी के बंटवारे पर फैसला करता है।

इसके अलावा केंद्र सरकार, केंद्रीय जल आयोग और संबंधित नदी बोर्ड भी पानी के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ मामलों में अंतिम विवाद सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचता है। संविधान के तहत राज्यों के बीच कानूनी अधिकारों से जुड़े विवादों में सुप्रीम कोर्ट का मूल क्षेत्राधिकार भी है, हालांकि अंतरराज्यीय जल विवादों के लिए अनुच्छेद 262 की विशेष व्यवस्था लागू होती है।

असली समस्या पानी की कमी या बंटवारे की?

कई मामलों में दोनों चीजें एक साथ होती हैं। भारत में आबादी, खेती और शहरों की पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ मानसून पर निर्भरता और जलवायु परिवर्तन के कारण नदी में उपलब्ध पानी साल-दर-साल बदल सकता है।

ऐसे में किसी राज्य को उसका तय हिस्सा देना सिर्फ कागज पर संख्या तय करने से संभव नहीं है। नदी में वास्तविक प्रवाह, बांधों में पानी, बारिश और मौसमी जरूरतों को भी देखना पड़ता है।

भविष्य में विवाद क्यों बढ़ सकते हैं?

  • बढ़ती आबादी और शहरों की पानी की मांग
  • सिंचाई के लिए बढ़ती जरूरत
  • भूजल का तेजी से दोहन
  • अनियमित मानसून
  • सूखे और बाढ़ की बढ़ती घटनाएं
  • राज्यों के बीच पुराने समझौतों की बदलती परिस्थितियां

नदी का पानी किसी एक का नहीं, लेकिन हिस्सेदारी सबकी है

भारत में अंतरराज्यीय नदी जल विवाद की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नदी एक प्राकृतिक व्यवस्था है, जबकि उसका इस्तेमाल राज्यों की प्रशासनिक सीमाओं के भीतर होता है। नदी को सीमा का पता नहीं होता, लेकिन पानी का इस्तेमाल करने वाले राज्यों की अपनी सीमाएं, जरूरतें और राजनीतिक हित होते हैं।

इसलिए कावेरी, यमुना या सतलुज का विवाद सिर्फ पानी के कुछ आंकड़ों का मामला नहीं है। यह कृषि, पेयजल, बिजली, पर्यावरण और संघीय राजनीति सबको जोड़ता है। आने वाले समय में जब पानी की मांग बढ़ेगी और जलवायु परिस्थितियां अनिश्चित होंगी, तब राज्यों के बीच पानी बांटने से ज्यादा जरूरी होगा कि उपलब्ध पानी का इस्तेमाल कैसे कम नुकसान और ज्यादा दक्षता के साथ किया जाए।