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तेल के ऊंचे दाम और वैश्विक महंगाई पर IMF की चेतावनी: खाड़ी देशों के बीच युद्ध खत्म होने पर भी 2027 तक रहेगा ऊर्जा संकट!

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने तेल के बढ़ते दामों को लेकर बड़ी चेतावनी दी है। IMF का कहना है कि अगर खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जल्द खत्म भी हो जाता है, तो ऊर्जा की ऊंची कीमतें 2027 तक बनी रह सकती हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

•

Oct 07, 2026

imf major warning on oil prices

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Gemini)

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने तेल के बढ़ते दामों को लेकर बड़ी चेतावनी दी है। IMF का कहना है कि अगर खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जल्द खत्म भी हो जाता है, तो ऊर्जा की ऊंची कीमतें 2027 तक बनी रह सकती हैं। IMF ने कहा कि तेल की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल बनी हुई है, जबकि रिफाइनिंग क्षमता और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर दबाव महंगाई बढ़ा रहा है और वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर असर डाल रहा है।

IMF ने क्या कहा?

IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा कि अब तक अधिक दक्षता, ईंधन के विविध स्रोतों, आपातकालीन योजनाओं, रणनीतिक भंडार से आपूर्ति जारी करने और मांग-आपूर्ति में बदलाव के कारण ऊर्जा संकट का असर सीमित रहा है। हालांकि, महत्वपूर्ण जोखिम अभी भी बने हुए हैं।

थाईलैंड में अगले सप्ताह होने वाली आईएमएफ-विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों से पहले सिंगापुर में जॉर्जीवा ने कहा- खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति बहाल होने की अनिश्चितता के बीच तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल बनी हुई हैं। इसमें जोखिम, परिवहन की ऊंची लागत और अन्य कारक भूमिका निभा रहे हैं।

दबाव सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं

क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने आगे कहा कि दबाव सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर रिफाइनिंग क्षमता की संरचनात्मक कमी के कारण क्रैक स्प्रेड यानी कच्चे तेल की कीमत और उससे बनने वाले रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य के बीच का अंतर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि इसका परिणाम डीजल और अन्य रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की रिकॉर्ड खुदरा कीमतों के रूप में सामने आया है।

खाड़ी क्षेत्र से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी बुरी तरह प्रभावित है, क्योंकि जब तक होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही पर खतरा बना हुआ है, तब तक एलएनजी (एलएनजी) के परिवहन के विकल्प सीमित रहेंगे। जॉर्जीवा ने कहा- इसका दुनिया के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग असर पड़ रहा है, जिसमें एशिया और यूरोप विशेष रूप से प्रभावित हैं। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही महंगाई के दबाव और कमजोर आर्थिक वृद्धि का सामना कर रही है।

किन सेक्टरों में महंगाई का असर?

IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा के मुताबिक, ऊर्जा की ऊंची लागत का असर उर्वरकों, खाद्य पदार्थों और प्रमुख औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों पर पड़ता है। वहीं, अल नीनो खाद्य सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। इस स्थिति से महंगाई बढ़ने के साथ आर्थिक वृद्धि पर भी दबाव पड़ता है।आने वाले महीनों में दबाव और बढ़ सकता है, क्योंकि उत्तरी गोलार्ध में ठंड बढ़ने से ऊर्जा की मांग बढ़ेगी और देश अपने ऊर्जा भंडार को फिर से भरेंगे।

ऊर्जा की ऊंची कीमतों से महंगाई, ब्याज दरों और प्रमुख सरकारी बॉन्ड यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव पड़ता है। जॉर्जीवा ने कहा कि अमेरिका, जर्मनी और जापान की 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड इस साल काफी बढ़ी हैं और क्रमशः 2007, 2009 और 1996 के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर हैं। IMF के अनुसार, ऊर्जा संकट उन 3 प्रमुख ताकतों में से एक है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं, जबकि अन्य दो ताकतें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का तेजी से विस्तार और सरकारी कर्ज का रिकॉर्ड स्तर है। बता दें कि IMF और विश्व बैंक की वार्षिक बैठक में अगले सप्ताह थाईलैंड में आईएमएफ के 191 सदस्य देशों के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक के गवर्नर शामिल होंगे।