1 अगस्त 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

इमरान प्रतापगढ़ी: शायरी से संसद तक, कैसे बने कांग्रेस की प्रमुख आवाज़

इमरान प्रतापगढ़ी की कहानी आपको बताती है कि कैसे एक युवा कवि ने सत्ता के गलियारों में अपनी आवाज़ को बुलंद किया! वह 6 अगस्त को 39 वर्ष के हो जाएंगे।
3 min read
Google source verification
Imran

इमरान प्रतापगढ़ी (ChatGpt)

इमरान प्रतापगढ़ी आज अपने दम पर राजनीति में एक नई आवाज पहचान बना चुके हैं। इमरान प्रतापगढ़ी उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्होंने शायरी और राजनीति, दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से निकलकर राज्यसभा तक पहुंचने वाले इमरान ने सामाजिक न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक मुद्दों पर मुखर आवाज़ उठाई है।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्मे इमरान प्रतापगढ़ी (जन्म 6 अगस्त 1987) ने साहित्य और राजनीति दोनों में अपनी अलग पहचान बनाई है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने उर्दू मुशायरों में अपनी नज़्मों के ज़रिए एक लोकप्रिय चेहरा बना लिया। उनकी प्रसिद्ध नज़्म "मदरसा" ने भारतीय मुसलमानों की पहचान और अनुभव को संवेदनशीलता के साथ उजागर किया, जिससे वे मंचों पर बेहद लोकप्रिय हुए।

शायरी से राजनीति तक का सफर

2019 में कांग्रेस ने उन्हें मुरादाबाद लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, लेकिन वे लगभग साढ़े पांच लाख वोटों के अंतर से हार गए। हार के बावजूद उनकी राजनीतिक यात्रा रुकी नहीं। जून 2021 में उन्हें कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इसके बाद जुलाई 2022 में वे महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद बने और इस तरह कांग्रेस के युवा चेहरे के रूप में उभरे।

वक्फ बिल: संसद से लेकर कानूनी लड़ाई तक में रहे सक्रिय

राज्यसभा में इमरान प्रतापगढ़ी ने कई अवसरों पर अपनी बेबाक और भावनात्मक शैली से चर्चा बटोरी। अप्रैल 2025 में उन्होंने वक्फ (संशोधन) विधेयक का विरोध करते हुए संसद के बाहर काले कपड़ों में प्रदर्शन किया और “Reject Waqf Bill” का बोर्ड पकड़े खड़े रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी इस बिल के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे केवल भाषण ही नहीं, बल्कि कानूनी लड़ाई में भी सक्रिय हैं।

इस कविता से खड़ा हुआ था बड़ा विवाद

जनवरी 2025 में गुजरात पुलिस ने इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ एक वीडियो पोस्ट करने पर एफआईआर दर्ज की, जिसमें 'ऐ खून के प्यासे बात सुनो…' कविता का इस्तेमाल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले उनके खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई। बाद में मार्च 2025 में अदालत ने एफआईआर रद्द करते हुए कहा कि कविता और कलात्मक अभिव्यक्ति को बिना पर्याप्त आधार के घृणा फैलाने वाला भाषण नहीं माना जा सकता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण किया जाना चाहिए।

सामाजिक मुद्दों पर रहते हैं काफी सक्रिय

उनकी शायरी और राजनीतिक गतिविधियों में सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यकों के अधिकार और बहुलता की रक्षा प्रमुख विषय रहे हैं। 2017 में उन्होंने दिल्ली के जंतर मंतर पर “लहू बोल रहा है” नाम से रक्तदान शिविर आयोजित किया, जो लिंचिंग की घटनाओं के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध था। वे मंचों से लेकर संसद तक, हर जगह इन मुद्दों को उठाते रहे हैं।

क्या है उनकी राजनीतिक ताकत और चुनौतियाँ

इमरान प्रतापगढ़ी की ताकत उनकी युवा अपील, साहित्यिक पृष्ठभूमि और अल्पसंख्यक नेतृत्व में उनकी भूमिका में निहित है। वे प्रियंका गांधी वाड्रा और कांग्रेस नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, जिससे उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण स्थान मिला है। दूसरी ओर, उनकी आलोचना भी होती है। कुछ लोग उन्हें पहचान आधारित राजनीति का चेहरा मानते हैं, जबकि समर्थक उन्हें बहुलवादी आवाज़ कहते हैं।

राजनीतिक गढ़ और भविष्य

प्रतापगढ़ से निकलकर राष्ट्रीय मंच पर पहुंचने वाले इमरान प्रतापगढ़ी ने साहित्य और राजनीति का जो संगम बनाया है, वह उन्हें एक अलग पहचान देता है। उनके लिए अब चुनौती यह है कि वे इस पहचान को ज़मीन पर मतदाताओं और समाज के बीच कैसे मजबूत करें। अल्पसंख्यक विभाग की जिम्मेदारी और संसद में उनकी सक्रियता उन्हें कांग्रेस की अगली पीढ़ी के प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर सकती है।

कैसे हो सकते हैं और लोकप्रिय?

राजनीतिक रूप से उनकी राह अभी खुली है। यदि वे अल्पसंख्यक मुद्दों के साथ-साथ युवाओं, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर भी काम करते रहे, तो उनकी लोकप्रियता और प्रभाव और बढ़ सकता है। उनकी कहानी यह दिखाती है कि साहित्य और राजनीति का संयोजन किस तरह सामाजिक बदलाव की ताकत बन सकता है। इमरान प्रतापगढ़ी की कहानी यह बताती है कि राजनीति में विपक्ष की आवाज़ बने रहना संभव है।