
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
कोविड महामारी के बाद दुनिया का आर्थिक भूगोल तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव के केंद्र में भारत का नाम बार-बार आ रहा है। एक रिपोर्ट में भारत को कोविड के बाद वैश्विक सप्लाई चेन के पुनर्गठन से सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाला देश बताया गया है। कई वैश्विक रेटिंग एजेंसियां तथा इन्वेस्टमेंट बैंक 2026-27 को इस बदलाव के लिहाज से अहम मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह भरोसा आंकड़ों में भी दिख रहा है या अभी भी यह मौका सिर्फ संभावना ही है?
भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना इस रणनीति के दो मुख्य स्तंभ हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने हाल ही में संसद में बताया कि 31 मार्च 2026 तक 14 प्रमुख क्षेत्रों में PLI योजना के तहत 892 आवेदनों को मंजूरी मिल चुकी है, जिसके चलते 2.40 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का वास्तविक निवेश हुआ और लगभग 14.15 लाख प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोज़गार पैदा हुए। सबसे ज़्यादा निवेश हाई-एफिशिएंसी सोलर पीवी मॉड्यूल क्षेत्र में (64,873 करोड़ रुपये) आया। इसके बाद फार्मास्यूटिकल्स (45,158 करोड़ रुपये) और ऑटोमोबाइल-ऑटो कंपोनेंट्स (44,326 करोड़ रुपये) का नंबर है। सरकार ने अब तक लाभार्थियों को 35,354 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन जारी भी कर दिया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र इस रणनीति की सबसे बड़ी सफलता कहानी माना जाता है। बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, यह अब भारत का तीसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बन चुका है और वित्त वर्ष 2026 में इसका कुल कारोबार करीब 150 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। जिसमें से 28 अरब डॉलर निर्यात होने की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक इस उत्पादन को 500 अरब डॉलर और निर्यात को 200 अरब डॉलर तक ले जाना है। एपल-फॉक्सकॉन का उदाहरण इस बदलाव को और स्पष्ट करता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया में बिकने वाले कुल आईफोन में भारत की उत्पादन हिस्सेदारी 2025 के 23 प्रतिशत से बढ़कर 2026 में करीब 28 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि इसी दौरान चीन में एपल के उत्पादन की हिस्सेदारी 2024 के 83 प्रतिशत से घटकर 2025 में 74 प्रतिशत रह गई। फॉक्सकॉन और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स दोनों भारत में अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहे हैं। हालांकि, एप्पल की सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा अब भी चीन पर निर्भर है।
करीब 200 से ज़्यादा सप्लायर अभी भी चीन में हैं और अनुमान है कि सिर्फ 10 प्रतिशत उत्पादन क्षमता चीन से बाहर शिफ्ट करने में भी 8 साल तक लग सकते हैं। इसके साथ ही, चीन के नए सप्लाई चेन नियमों को लेकर इंडस्ट्री संगठन ICEA ने चेतावनी दी है कि इससे भारत में निवेश और विनिर्माण की रफ्तार पर असर पड़ सकता है। ICEA ने भारत में निवेश और विनिर्माण की रिपोर्ट का अध्ययन करके नीतिगत कदम उठाने को कहा है।
विनिर्माण बढ़ने के बावजूद लॉजिस्टिक लागत भारत की सबसे बड़ी कमजोरी बनी हुई है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का करीब 13 से 14 प्रतिशत हिस्सा लॉजिस्टिक्स पर खर्च करता है। वहीं, जर्मनी और जापान जैसे प्रतिस्पर्धी देशों में यह आंकड़ा महज 8 से 9 प्रतिशत है। इसी अंतर को भरने के लिए सितंबर 2022 में शुरू की गई राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (NLP) के तहत यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (ULIP) और PM गतिशक्ति जैसी पहलें अब पूरी तरह चालू हैं।
सरकार का अनुमान है कि भारत का लॉजिस्टिक्स क्षेत्र 2026 तक 10.7 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ेगा और लाखों नए रोजगार पैदा करेगा। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, FY2014 से FY2022 के बीच लॉजिस्टिक लागत में GDP के अनुपात में करीब 0.8-0.9 प्रतिशत की गिरावट भी दर्ज हो चुकी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क तक पहुंचने में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
आर्थिक नीतियों के अलावा कूटनीति भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रही है। फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते के तहत अमेरिका ने भारतीय आयात पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रक्षा सहयोग, क्वाड साझेदारी, महत्वपूर्ण खनिज और टेक्नोलॉजी को जोड़ने वाली दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी बताया।
अमेरिकी विदेश विभाग की फैक्ट शीट के अनुसार दोनों देश सप्लाई चेन की मजबूती और गैर-बाजार नीतियों से निपटने के लिए आगे भी सहयोग बढ़ाएंगे, जिसमें सेमीकंडक्टर और फार्मा सप्लाई चेन एकीकरण शामिल है। हालांकि, घरेलू स्तर पर किसान संगठनों की ओर से अमेरिकी कृषि उत्पादों को लेकर विरोध भी सामने आया है, जो दिखाता है कि यह कूटनीतिक संतुलन आसान नहीं है।
Updated on:
12 Aug 2026 07:20 pm
Published on:
12 Aug 2026 07:20 pm
