
ITR filing mistakes 2026 : ITR फाइल करते समय किन गलतियों से बचें, PC- Patrika
हर साल लाखों लोग आयकर रिटर्न (ITR) भरते हैं, लेकिन जल्दबाजी, अधूरी जानकारी या डेडलाइन चूक जाने की वजह से अच्छा-खासा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। आयकर विभाग अब AIS (Annual Information Statement), बैंकिंग डेटा, म्यूचुअल फंड लेनदेन, शेयर ट्रेडिंग और विदेशी खातों सहित सबका आपस में मिलान कर रहा है। ऐसे में न सिर्फ गलती, बल्कि देरी भी उतनी ही भारी पड़ सकती है। आइए इसे दो हिस्सों में समझते हैं, पहला फाइलिंग में होने में वाली गलतियां और दूसरा देरी होने पर कितना फाइन लगता है। पहले समझिए फाइलिंग में होने वाली गलतियां...।
AIS यानी Annual Information Statement में आपके बैंक ब्याज, शेयर निवेश, म्यूचुअल फंड लेनदेन और प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन जैसी जानकारियां दिखाई जाती हैं। लेकिन यह हमेशा 100% सटीक नहीं होता, कभी-कभी किसी लेनदेन की डुप्लीकेट एंट्री हो जाती है या गलत आंकड़ा दर्ज हो जाता है।
इससे यह नुकसान होता है कि अगर गलत जानकारी बिना जांचे स्वीकार कर ली जाए, तो आपकी आय वास्तविक से ज्यादा दिख सकती है और अतिरिक्त टैक्स देना पड़ सकता है। इसका सबसे अच्छा बचाव है Form 16, बैंक स्टेटमेंट और अपने निवेश रिकॉर्ड से AIS का मिलान जरूर करें।
कई करदाता मान लेते हैं कि जो आय AIS में नहीं दिख रही, उसे बताने की जरूरत नहीं। यह गलत है FD और सेविंग अकाउंट पर मिलने वाला ब्याज टैक्स योग्य आय है, भले ही वह AIS में न दिखे।
इसका यह नुकसान है बाद में विभाग को जानकारी मिलने पर अतिरिक्त टैक्स, ब्याज और जुर्माना देना पड़ सकता है।
म्यूचुअल फंड लेनदेन अक्सर ब्रोकर और रजिस्ट्रार (CAMS या KFintech) दोनों द्वारा रिपोर्ट किए जाते हैं, जिससे एक ही निवेश दो बार दिख सकता है। गलत आंकड़े स्वीकार करने पर कैपिटल गेन ज्यादा दिख सकता है और टैक्स देनदारी बढ़ सकती है।
अगर संपत्ति संयुक्त स्वामित्व में है, तो AIS में कई बार पूरी बिक्री राशि एक ही व्यक्ति के नाम दिख जाती है। इससे यह नुकसान होता है कि एक व्यक्ति पर उसकी वास्तविक हिस्सेदारी से अधिक कैपिटल गेन टैक्स का बोझ आ सकता है। इसे स्वामित्व अनुपात के हिसाब से सही तरीके से बांटना जरूरी है।
विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए सिर्फ भारत में बिताए दिनों की गिनती काफी नहीं है। सेक्शन 6(1A) के तहत, अगर किसी भारतीय नागरिक की कुल आय (विदेशी स्रोतों को छोड़कर) ₹15 लाख से अधिक है और वह किसी अन्य देश में निवास या समान आधार पर टैक्स के दायरे में नहीं आता, तो उसे 'डीम्ड रेजिडेंट' माना जाता है। भले ही उसने भारत में एक भी दिन न बिताया हो। यह नियम खासतौर पर UAE, सऊदी अरब जैसे टैक्स-फ्री देशों में रहने वाले भारतीयों पर लागू होता है।
डीम्ड रेजिडेंट को "Resident but Not Ordinarily Resident" (RNOR) की श्रेणी में रखा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि आपकी पूरी विदेशी आय भारत में टैक्सेबल हो जाएगी। RNOR की विदेशी पैसिव आय (जैसे विदेशी बैंक ब्याज) भारत में टैक्स-फ्री ही रहती है। सिर्फ वह आय टैक्सेबल होती है जो भारत-नियंत्रित बिजनेस से जुड़ी हो, साथ ही भारतीय स्रोत की सारी आय (सैलरी, रेंट आदि) हमेशा टैक्सेबल रहती है।
इससे यह नुकसान हो सकता है कि गलत रेजिडेंसी स्टेटस चुनने पर टैक्स नोटिस और अतिरिक्त टैक्स देनदारी बन सकती है। इसलिए अपने दिनों की गिनती और आय दोनों को ट्रैक करना जरूरी है।
आयकर विभाग अब कई देशों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर विदेशी बैंक खातों और संपत्तियों का ब्योरा भी AIS में दिखा रहा है। विदेशी खाते या संपत्ति का खुलासा न करने पर जांच शुरू हो सकती है और भारी जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
कई निवेशक फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) या इंट्रा-डे ट्रेडिंग से हुई आय को कैपिटल गेन मानकर ITR-2 भर देते हैं। जबकि विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी आय आमतौर पर बिजनेस इनकम मानी जाती है, जिसके लिए ITR-3 फॉर्म सही है। गलत ITR फॉर्म चुनने पर रिटर्न त्रुटिपूर्ण मान लिया जाता है और बाद में उसे संशोधित करना पड़ता है।
ध्यान दें: यह AY 2026-27 का आखिरी फाइलिंग सीजन है जो पुराने Income Tax Act, 1961 के तहत होगा। नया Income Tax Act, 2025 1 अप्रैल 2026 से लागू है, लेकिन FY 2025-26 की आय अब भी पुराने कानून के दायरे में आती है।
Updated on:
28 Jul 2026 10:56 am
Published on:
28 Jul 2026 10:56 am
