
दशहरे पर कानपुर के अनोखे रावण मंदिर में उमड़ती है भारी भीड़( Image: Chat Gpt)
दशहरे का दिन पूरे भारत में असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हर शहर, कस्बे और गांव में दशानन रावण के विशाल पुतले बनाए जाते हैं, आतिशबाजी होती है और भगवान श्रीराम के जयकारों के बीच रावण दहन किया जाता है। लेकिन इसी उत्सव के बीच उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में एक ऐसी अनूठी और विस्मयकारी परंपरा निभाई जाती है, जो इस दिन की आम धारणा को पूरी तरह उलट देती है।
कानपुर के ऐतिहासिक शिवाला इलाके में स्थित कैलाश मंदिर परिसर में एक ऐसा मंदिर है, जिसके कपाट साल के 364 दिन बंद रहते हैं और केवल दशहरे के दिन मात्र कुछ घंटों के लिए खोले जाते हैं। यह है उत्तर भारत का प्रसिद्ध दशानन मंदिर। जहां एक तरफ पूरी दुनिया रावण के अंत का जश्न मनाती है, वहीं यहां सुबह से ही हजारों श्रद्धालु रावण की प्रतिमा की पूजा-अर्चना, आरती और दुग्धाभिषेक के लिए कतारों में खड़े नजर आते हैं।
कानपुर के शिवाला स्थित दशानन मंदिर की नींव लगभग 136 वर्ष पूर्व 19वीं सदी के उत्तरार्ध (लगभग 1890) में रखी गई थी। इस मंदिर का निर्माण उन्नाव के राजा गुरु प्रसाद शुक्ल ने करवाया था। राजा गुरु प्रसाद भगवान शिव के परम भक्त थे और उन्होंने शिवाला में एक विशाल 'कैलाश मंदिर' का निर्माण कराया था, जहां भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और उनके परिवार को स्थापित किया गया।
मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव के मंदिर के परिसर में ही रावण की प्रतिमा इसलिए स्थापित की गई क्योंकि रावण महादेव का सबसे बड़ा अनन्य भक्त माना जाता है। शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने वाले लंकाधिपति रावण की भक्ति और विद्वता के सम्मान में ही इस विशेष मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर में रावण की आदमकद पाषाण प्रतिमा स्थापित है, जिसके दस सिर और हाथ में शक्ति व ज्ञान के प्रतीक सुशोभित हैं।
इस मंदिर की सबसे रहस्यमयी और दिलचस्प बात इसके खुलने का समय है। मंदिर के पट साल में केवल एक बार, विजयादशमी की सुबह खोले जाते हैं।
शुद्धिकरण और अभिषेक: दशहरे के दिन तड़के ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। सबसे पहले प्रतिमा का पंचामृत, गंगाजल और दूध से महाभिषेक किया जाता है। इसके बाद रावण की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार होता है।
आरती और पूजन: सुबह करीब 8-9 बजे रावण की महाआरती होती है। इसके बाद आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर के दरवाजे खोल दिए जाते हैं।
सरसों के तेल के दीपक: श्रद्धालु यहां फूल, माला और फल अर्पित करने के साथ-साथ सरसों के तेल के दीपक जलाते हैं।
शाम को कपाट बंद: जैसे ही शाम ढलती है और पास के रामलीला मैदान में रावण के पुतले के दहन की तैयारी शुरू होती है, ठीक उसी समय मंत्रोच्चार के बीच इस मंदिर के कपाट अगले एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं।
भारतीय जनमानस में रावण को अहंकार और अनीति का प्रतीक माना गया है, तो फिर यहां उसकी पूजा क्यों की जाती है? मंदिर के पुजारियों और स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां रावण के अहंकार या उसके कुकर्मों की पूजा नहीं होती, बल्कि उसके ज्ञान, तपस्या और भक्ति का सम्मान किया जाता है।
वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता: रावण चारों वेदों और छह शास्त्रों का प्रकांड पंडित था। उसे आयुर्वेद, ज्योतिष और संगीत का अद्वितीय ज्ञान था।
शिवभक्ति का आदर्श: रावण जैसा शिवभक्त तीनों लोकों में दुर्लभ माना गया। उसने अपने शीश काटकर महादेव को अर्पित कर दिए थे।
ज्योतिषीय प्रभाव: जनश्रुति है कि दशहरे के दिन रावण के इस स्वरूप के दर्शन और सरसों के तेल का दीपक जलाने से ग्रह बाधाएं, विशेषकर शनि और राहु-केतु के दोष शांत होते हैं। लोग अपने बच्चों की बौद्धिक क्षमता और कुशाग्र बुद्धि की कामना लेकर भी यहां शीश नवाते हैं।
कानपुर का दशानन मंदिर भारतीय संस्कृति के उस गहरे दर्शन को दर्शाता है, जहां व्यक्ति के अवगुणों की आलोचना करते हुए भी उसके सद्गुणों और प्रतिभा को नकारा नहीं जाता। जब युद्ध भूमि में रावण मृत्युशैया पर था, तब स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने अनुज लक्ष्मण को रावण के पास राजनीति, धर्म और नीति की शिक्षा लेने भेजा था।
दशानन मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था भी इसी दर्शन पर टिकी है। लोग मानते हैं कि रावण का अहंकार उसके पतन का कारण बना, लेकिन उसका ज्ञान और उसकी शिवभक्ति आज भी अनुकरणीय है। यह मंदिर हर इंसान को यह संदेश देता है कि कितना भी बड़ा विद्वान क्यों न हो, यदि चरित्र और आचरण में अहंकार आ जाए तो पतन निश्चित है।
हर साल दशहरे के दिन शिवाला क्षेत्र में एक भव्य मेले जैसा माहौल बन जाता है। न केवल कानपुर बल्कि आसपास के जिलों जैसे उन्नाव, फतेहपुर, लखनऊ और यहां तक कि दूर-दराज के राज्यों से भी लोग इस अनोखे मंदिर के दर्शन करने पहुंचते हैं।
शाम होते ही जब पटाखों की आवाज और पुतला दहन का धुआं आसमान में उठता है, तब दशानन मंदिर की घंटियां शांत हो जाती हैं और उसके भारी कपाट अगले दशहरे तक के लिए सील कर दिए जाते हैं। यह विरोधाभास एक तरफ पुतले का दहन और दूसरी तरफ प्रतिमा की आरती कानपुर की इस अनूठी परंपरा को पूरे देश में विशिष्ट और दर्शनीय बनाता है।
Updated on:
12 Oct 2026 06:04 pm
Published on:
12 Oct 2026 06:04 pm
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