
किशोर कुमार (इमेज सोर्स- Chatgpt)
भारतीय सिनेमा में किशोर कुमार का नाम उन गायकों में गिना जाता है, जिनकी आवाज दशकों बाद भी श्रोताओं के दिलों में बसी है। मस्ती भरे गानों से लेकर दर्द में डूबी धुनों तक, उन्होंने हर रंग को अपनी अनोखी शैली में ढाला। दिलचस्प बात यह है कि इस आवाज के पीछे शास्त्रीय संगीत की कोई औपचारिक तालीम नहीं थी।
आम तौर पर किशोर कुमार के बारे में कहा जाता है कि बिना औपचारिक शास्त्रीय प्रशिक्षण के भी भाव और सुर की उनकी स्वाभाविक समझ ने उन्हें आर.डी. बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों का पसंदीदा गायक बनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, किशोर संगीत की औपचारिक शिक्षा से दूर थे, फिर भी उनकी गायकी में असर था।
किशोर कुमार की इस सीख-समझ का सबसे चर्चित उदाहरण 1976 की फिल्म 'महबूबा' का गीत 'मेरे नैना सावन भादो' है। शक्ति सामंत के निर्देशन में बनी इस फिल्म में राजेश खन्ना और हेमा मालिनी मुख्य भूमिकाओं में थे। संगीत आर.डी. बर्मन का था और गीत आनंद बख्शी ने लिखे थे। फिल्म में यह गीत दो रूपों में है। पुरुष वर्जन किशोर कुमार ने और महिला वर्जन लता मंगेशकर ने गाया और दोनों शिवरंजनी राग पर आधारित हैं।
संगीत इतिहास की कई चर्चाओं के अनुसार, शुरुआत में किशोर कुमार इस गीत को गाने से हिचक रहे थे, क्योंकि उनके पास शास्त्रीय संगीत की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं थी। उन्होंने पहले लता मंगेशकर का रिकॉर्ड किया हुआ वर्जन सुनने की इच्छा जताई। फिल्म से जुड़ी एक अन्य प्रस्तुति के अनुसार, आर.डी. बर्मन ने पहले गाने का ड्राफ्ट टेप किशोर को भेजा था, और किशोर ने लता के वर्जन वाला टेप मांगा। अपना वर्जन उन्होंने इसके बाद ही रिकॉर्ड किया।
कहा जाता है कि लता के गाए वर्जन को एक सप्ताह तक बार-बार सुनकर उसकी बारीकियां समझने के बाद ही उन्होंने अपना वर्जन रिकॉर्ड किया। हालांकि 'एक सप्ताह' वाली बात किसी आधिकारिक दस्तावेज के बजाय संगीत-संबंधी लेखों और किस्सों में दर्ज है, इसलिए इसे पक्के तथ्य की बजाय चर्चित वृत्तांत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
दोनों वर्जन की प्रकृति अलग है। लता के वर्जन में लंबा आलाप है जो तीन बार आता है, जबकि किशोर के वर्जन में आलाप की जगह गुनगुनाहट है। लता का गीत करीब 6 मिनट 20 सेकंड का है और किशोर का करीब 5 मिनट 25 सेकंड का है। आज भी किशोर कुमार का वर्जन लता के वर्जन से ज्यादा लोकप्रिय माना जाता है। इस गीत में किशोर की गायकी में भावनात्मक तात्कालिकता दिखती है, जबकि लता के वर्जन में राग की शुद्धता और संतुलन ज्यादा नजर आता है।
यानी तकनीकी परिपूर्णता और भावनात्मक असर के बीच की यह बहस ही इस गीत को खास बनाती है। लोकप्रियता के साथ-साथ यह गीत खुद किशोर कुमार को भी प्रिय था। एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने इसे अपने निजी शीर्ष दस पसंदीदा गानों में गिना था। अलग-अलग लेखों के मुताबिक यह भी चर्चा रही कि बड़े भाई अशोक कुमार को इस गीत को लेकर संदेह था कि बिना शास्त्रीय प्रशिक्षण के किशोर इसे निभा पाएंगे या नहीं।
किशोर कुमार की खूबी यह थी कि वे किसी धुन का भाव जल्दी पकड़ लेते थे और उसमें अपना अंदाज जोड़ देते थे। उनकी गायकी भले ही किताबी कसौटी पर हर बार खरी न उतरती हो, उसमें जज्बात की गहराई जरूर रहती थी। यही वजह रही कि वे शास्त्रीय राग पर आधारित गीतों को भी आम श्रोताओं तक सहजता से पहुंचा पाए।
'महबूबा' को अपने समय में व्यावसायिक रूप से औसत सफलता वाली फिल्म माना गया, लेकिन इसके गाने, खासकर 'मेरे नैना सावन भादो', आज भी बारिश और बिरह के गीतों की सूची में ऊपर रहते हैं। यह किस्सा इस बात की मिसाल है कि सुनने, समझने और डूबकर गाने की लगन कई बार औपचारिक तालीम की कमी भी पूरी कर देती है।
Updated on:
13 Oct 2026 06:02 pm
Published on:
13 Oct 2026 06:02 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
