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दमोह के पथरिया से निकली वह आवाज, जिसने कलम को बनाया अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार

freedom fighter madhavrao sapre: भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए सिर्फ तलवारें, बंदूकें ही नहीं उठीं, बल्कि कुछ आजादी के परवाने ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाया और आंदोलन को लेकर सक्रिए हो गए, आप भी जानें कलमकार माधवराव सप्रे की कहानी, जो कलम से बने स्वतंत्रता सेनाना...
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 12, 2026

madhavrao sapre freedom fighter india untold story

madhavrao sapre freedom fighter india untold story: कलम से लिखा आजादी के इतिहास का सुनहरा दौर (AI Creative)

freedom fighter madhavrao sapre: मध्य प्रदेश के दमोह जिले का पथरिया गांव आज भले ही सामान्य ग्रामीण कस्बे की तरह दिखाई देता हो, लेकिन इसी धरती ने ऐसे व्यक्तित्व को जन्म दिया था, जिसने आजादी की लड़ाई में बंदूक या तलवार के बजाय लेखनी को अपना हथियार बनाया। पंडित माधवराव सप्रे केवल साहित्यकार नहीं थे। वे पत्रकार, संपादक, अनुवादक और राष्ट्रवादी विचारक होने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सक्रिय व्यक्तित्व भी थे।

माधवराव सप्रे का जन्म 19 जून 1871 को दमोह जिले के पथरिया गांव में हुआ था। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने बिलासपुर में पढ़ाई की और रायपुर से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और 1899 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए किया।

उस दौर में सरकारी नौकरी को सुरक्षित और प्रतिष्ठित भविष्य का रास्ता माना जाता था। सप्रे को भी सरकारी सेवा में तहसीलदार के पद का अवसर मिला, लेकिन उनका झुकाव राष्ट्र और समाज के लिए काम करने की ओर था। उन्होंने नौकरी की सुविधा से ज्यादा महत्व उस काम को दिया, जिसे वे देश और समाज के लिए जरूरी मानते थे।

जब पत्रकारिता बनी राष्ट्र जागरण का माध्यम

सप्रे की पत्रकारिता का बड़ा अध्याय 'छत्तीसगढ़ मित्र' से शुरू हुआ। उन्होंने रामराव चिंचोलकर के सहयोग से जनवरी 1900 में पेंड्रा से इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। यह केवल समाचार देने वाला प्रकाशन नहीं था। इसका उद्देश्य हिंदी भाषा, साहित्य और सामाजिक चेतना को आगे बढ़ाना भी था। भारत सरकार के डिजिटल जिला अभिलेख में भी 'छत्तीसगढ़ मित्र' को उनके पत्रकारिता संबंधी महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में दर्ज किया गया है।

इसी पत्रिका से उनकी चर्चित कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी' भी जुड़ी है। इसे हिंदी की आरंभिक आधुनिक कहानियों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। साहित्यिक इतिहास में इसे अक्सर हिंदी की पहली लघुकथा अथवा आरंभिक कहानी के रूप में चर्चा किया जाता है, हालांकि 'पहली कहानी' की संज्ञा को लेकर साहित्यिक जगत में मतभेद भी रहे हैं। इसलिए इसे निर्विवाद रूप से 'हिंदी की पहली कहानी' कहने के बजाय हिंदी कथा साहित्य की शुरुआती महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक कहना अधिक सुरक्षित है।

तिलक के 'केसरी' से निकला हिंदी का 'केसरी'

माधवराव सप्रे का राष्ट्रवादी पत्रकारिता में सबसे महत्वपूर्ण योगदान 'हिंदी केसरी' रहा। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मराठी समाचार पत्र 'केसरी' के विचारों से प्रभावित सप्रे ने उसका हिंदी रूप सामने लाने की दिशा में काम किया। तिलक की अनुमति से 13 अप्रैल 1907 को नागपुर से 'हिंदी केसरी' का प्रकाशन शुरू हुआ। यह साप्ताहिक पत्र था और इसके जरिए राष्ट्रीय विचारों को हिंदी पाठकों तक पहुंचाया गया।

उस समय अंग्रेजी हुकूमत राष्ट्रीय विचारों और ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने वाले लेखों को लेकर बेहद सख्त थी। 'हिंदी केसरी' में भी ऐसे लेख प्रकाशित हुए जिनमें औपनिवेशिक शासन की नीतियों और देश की राजनीतिक स्थिति पर तीखी टिप्पणी की जाती थी। सरकार की नजर इस पत्र पर गई और सप्रे को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। सरकारी अभिलेखों के अनुसार, राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के कारण सप्रे को 1908 में जेल भी जाना पड़ा।

सिर्फ अंग्रेजों का विरोध नहीं, समाज सुधार भी

सप्रे की सोच केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी। वे मानते थे कि मजबूत राष्ट्र के लिए समाज में शिक्षा और जागरूकता भी जरूरी है। उन्होंने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार के पक्ष में काम किया। 1912 में रायपुर में जानकी देवी कन्या पाठशाला की स्थापना से उनका नाम जुड़ा। बाद में महात्मा गांधी के आग्रह पर 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय और अनाथालय की स्थापना में भी उन्होंने भूमिका निभाई।

उनका काम पत्रकारिता की सीमा से आगे निकल चुका था। वे हिंदी के विकास, साहित्यिक चेतना और राजनीतिक जागरूकता को एक-दूसरे से जोड़कर देखते थे। मराठी साहित्य और विचारों को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अनुवाद का काम भी किया। उनके प्रमुख अनुवादों में बाल गंगाधर तिलक की 'गीता रहस्य' शामिल है।

1924 में उन्हें देहरादून में आयोजित अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया। यह उस दौर में हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण था।

23 अप्रैल 1926 को रायपुर में उनका निधन हुआ।

आज जब पत्रकारिता को केवल खबर पहुंचाने के माध्यम के रूप में देखा जाता है, तो माधवराव सप्रे का जीवन याद दिलाता है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अखबार, लेख, विचार और साहित्य भी संघर्ष के महत्वपूर्ण हथियार थे। दमोह के पथरिया से निकले इस पत्रकार ने अपनी कलम से उस समय सवाल उठाए, जब सवाल पूछना ही सत्ता के लिए चुनौती बन जाता था।

माधवराव सप्रे की कहानी इसलिए सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब एक पत्रकार अपनी कलम से समाज को पढ़ाता था, लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाता था और जरूरत पड़ने पर उसी लेखनी की कीमत जेल जाकर या जान देकर चुकाता था।