
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Janani)
बदलती जीवनशैली, तनाव और खानपान की आदतों के बीच दिल की सेहत पर नजर रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। 2025 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में भारतीय वयस्कों में हृदय-रक्तवाहिका रोगों की संयुक्त दर करीब 11 प्रतिशत पाई गई। इसी बीच पोर्टेबल ECG डिवाइस लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। ये घर बैठे दिल की विद्युत गतिविधि दर्ज करने की सुविधा देते हैं। हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि ये डॉक्टर की जांच का विकल्प नहीं, उसका सहायक साधन हैं।
आम तौर पर कहा जाता है कि भारत की कुल आबादी का 11 फीसदी हिस्सा हृदय रोग से प्रभावित है। यह पूरी तरह सटीक नहीं है। 11 प्रतिशत का आंकड़ा वयस्कों के लिए है, और उस अध्ययन में अनुमान की सीमा 9 से 17 प्रतिशत के बीच है। अलग-अलग अध्ययनों के नतीजे उम्र और परिभाषा के हिसाब से बदलते हैं।
45 वर्ष से ऊपर के वयस्कों पर हुए एक राष्ट्रीय सर्वे में हृदय रोगों की दर 5।2 प्रतिशत मिली। वहीं उच्च रक्तचाप को शामिल करने वाले एक अन्य अध्ययन में बुजुर्गों में स्व-घोषित दर 29।4 प्रतिशत रही। यानी आंकड़े पैमाने पर निर्भर करते हैं, पर खतरा बड़ा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब एक-चौथाई मौतों की वजह हृदय रोग है।
एक वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार, ये छोटे, जेब में रखने लायक उपकरण कुछ ही सेकंड में धड़कन और उसकी विद्युत गतिविधि रिकॉर्ड कर लेते हैं। इनमें ड्राई इलेक्ट्रोड या सेंसर लगे होते हैं। उंगलियां रखने या डिवाइस को छाती पर लगाने से ये सेंसर दिल से निकलने वाले बेहद कमजोर विद्युत संकेत पकड़ते हैं। डिवाइस के भीतर के सर्किट और एम्पलीफायर इन संकेतों को साफ करते हैं।
इसके बाद एल्गोरिदम डेटा का विश्लेषण करता है। यह एल्गोरिदम डिवाइस में या स्मार्टफोन ऐप में हो सकता है। वह शरीर की हलचल से आने वाले शोर को हटाता है और स्क्रीन पर तरंग (वेवफॉर्म) के रूप में नतीजा दिखाता है। कई डिवाइस रिपोर्ट को पीडीएफ में बदलकर ईमेल या ऑनलाइन पोर्टल से सीधे डॉक्टर तक पहुंचाने की सुविधा भी देते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि जब धड़कन तेज या अनियमित महसूस हो, तब यूजर घर पर ही रिकॉर्डिंग ले सकते हैं। यह उन मामलों में खास उपयोगी है जहां लक्षण कभी-कभार ही उभरते हैं और अस्पताल की नियमित जांच में पकड़ में नहीं आते। ऐसे डिवाइस 'एट्रियल फिब्रिलेशन' (AFIB) जैसी आम अनियमित धड़कन की पहचान में मदद कर सकते हैं।
कोई भी डिवाइस इस्तेमाल करने से पहले सावधानी जरूरी है। खबर में आम तौर पर इन्हें दिल पर 24 घंटे नजर रखने वाले उपकरण बताया जाता है, लेकिन यह भी सही नहीं है। ज्यादातर हैंडहेल्ड डिवाइस तभी रिकॉर्ड करते हैं, जब आप उन्हें इस्तेमाल करें। लगातार निगरानी के लिए होल्टर या पैच मॉनिटर जैसे उपकरण अलग से होते हैं, जो डॉक्टर की सलाह पर लगाए जाते हैं।
अध्ययन भी मिश्रित तस्वीर दिखाते हैं। एक मेटा-विश्लेषण में स्मार्टवॉच आधारित एएफआईबी पहचान की संवेदनशीलता 95 और विशिष्टता 94 प्रतिशत पाई गई। लेकिन एक बहु-केंद्र अध्ययन में एक स्मार्टवॉच ईसीजी डिवाइस की सटीकता 12-लीड ईसीजी की तुलना में सिर्फ मध्यम रही।
एक अन्य शोध में एप्पल वॉच ने 78 प्रतिशत एएफआईबी मरीजों को सही पकड़ा, जबकि हर पांच में से एक रीडिंग का स्वचालित नतीजा नहीं आया। ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने कहा कि हृदय रोगियों में सिंगल-लीड ईसीजी की सटीकता पहले बताई गई से कम हो सकती है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि एट्रियल टैकीकार्डिया और फ्लटर की पहचान में ऐसे ईसीजी कमजोर रहे।
विशेषज्ञ चेताते हैं कि सभी डिवाइस एक जैसे नहीं होते। कुछ पहनने योग्य उपकरण केवल हृदय गति मापते हैं, जबकि कुछ दिल की विद्युत गतिविधि दर्ज करते हैं। ये दोनों अलग चीजें हैं। शोध में फिटबिट और एप्पल वॉच जैसे उपकरण एएफआईबी के दौरान हृदय गति को कम आंकते पाए गए, खासकर जब गति 80 से ऊपर थी। इसलिए सभी डिवाइस क्लिनिकल जांच के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
डिवाइस खरीदते समय देखें कि वह ECG दर्ज करता है या सिर्फ हृदय गति। रिकॉर्डिंग सहेजकर डॉक्टर को दिखाएं। सीने में दर्द, चक्कर या सांस फूलने जैसे लक्षण हों तो रीडिंग सामान्य आने पर भी देरी न करें और तुरंत चिकित्सक से मिलें।
(डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी जागरुकता के लिए है, यह व्यक्तिगत सलाह नहीं है। हृदय संबंधी कोई समस्या होने पर पेशेवर डॉक्टर से सलाह अवश्य लें)
Updated on:
24 Oct 2026, 4:32 PM IST
Published on:
24 Oct 2026, 4:32 PM IST
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