
एक खुशखबरी है कि नालंदा की ‘बावन बूटी’ को GI टैग मिला है। ( विजुअल: Google Gamini AI.)
नालंदा की पारंपरिक 'बावन बूटी' हस्तशिल्प को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिलने के बाद अब इसे एक साधारण स्थानीय विरासत के बजाय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त ब्रांड का दर्जा मिल गया है। यह उपलब्धि न केवल सदियों पुरानी बुनाई कला को कानूनी संरक्षण प्रदान करती है, बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता की दिशा में बुनकर समुदाय के लिए नए रास्ते भी तैयार करती है।
नालंदा जिले की प्रतिष्ठित ‘बावन बूटी’ साड़ी और कपड़े को जून 2026 में चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री द्वारा आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक प्रदान किया गया। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि के पीछे राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) तथा बिहार सरकार की साझा और सतत कोशिशें रही हैं। इस अवसर पर गया के ऐतिहासिक पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पारंपरिक पिड़िया पेंटिंग को भी यह विशिष्ट जीआई दर्जा दिया गया।
हथकरघा बुनाई की इस अनूठी शैली में कपड़े के धरातल पर सटीक रूप से 52 पारंपरिक बूटियां या आकृतियां हाथ से उकेरी जाती हैं। इनमें बौद्ध और भारतीय सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े प्रतीक जैसे कमल, बोधि वृक्ष, मछली, शंख, मोर और चांद-तारा प्रमुखता से शामिल होते हैं। यह ऐतिहासिक बुनाई कला मुख्य रूप से नालंदा के बसवन बिगहा और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में पीढ़ियों से सहेजकर रखी गई है।
भौगोलिक संकेतक मिलने के पश्चात अब 'बावन बूटी' नाम का उपयोग केवल उन्हीं प्रामाणिक उत्पादों के लिए किया जा सकेगा, जिनका निर्माण वास्तविक रूप से नालंदा क्षेत्र में होता है। इस वैधानिक व्यवस्था से पावर-लूम पर बने घटिया या नकली सामान की बिक्री पर लगाम लगेगी। यह कानूनी कवच सीधे तौर पर स्थानीय बुनकरों के श्रम और उनके अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करता है।
नाबार्ड (बिहार) के मुख्य महाप्रबंधक गौतम कुमार सिंह के अनुसार, जीआई टैग मिलना महज एक औपचारिक सम्मान नहीं
है, बल्कि यह एक बड़े व्यापारिक सफर का आगाज़ है। अब इस कलात्मक उत्पाद को बाजार में बेहतर ढंग से उतारने, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, गुणवत्ता में निरंतर सुधार और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए योजनाबद्ध कदम उठाए जाएंगे। इसके साथ ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इसे “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” के संकल्प को धरातल पर उतारने वाली एक बड़ी सफलता बताया।
इस प्रतिष्ठित टैग के कारण वैश्विक बाजार में मांग बढ़ने से बुनकर परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है। इससे नई पीढ़ी के युवाओं में भी अपनी पारंपरिक धरोहर से जुड़ने और इसे रोजगार के रूप में अपनाने का उत्साह जागेगा। राज्य के मंत्री श्रवण कुमार ने बुनकर समुदाय से व्यक्तिगत मुलाकात कर बधाई दी और भरोसा जताया कि अब उनकी मेहनत को देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में विशिष्ट सम्मान मिलेगा।
जीआई टैग के माध्यम से बावन बूटी फैब्रिक अब अंतरराष्ट्रीय वस्त्र बाजार में अपनी मजबूत पैठ बनाने में सक्षम होगा। विदेशी खरीदारों और निर्यातकों के लिए यह टैग उत्पाद की प्रामाणिकता और विशिष्टता का सबसे बड़ा सबूत होता है। इसके परिणामस्वरूप निर्यात के नए मार्ग प्रशस्त होंगे, जिससे बिहार की लोक-कला और हस्तशिल्प को वैश्विक पटल पर एक अमूल्य पहचान मिलेगी।
भारत में पूर्व में भी कई कृषि और हस्तशिल्प उत्पादों को जीआई दर्जा दिया जा चुका है-जैसे बनारसी साड़ी, दरभंगा का मखाना और मिथिला पेंटिंग। इन उत्पादों ने जीआई टैग के बल पर न केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी साख बनाई है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की है। बावन बूटी का इस सूची में शामिल होना बिहार के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ता है।
बहरहाल, नालंदा की बावन बूटी को जीआई टैग मिलना इस बात का प्रमाण है कि यदि हमारी पारंपरिक कलाओं को सही दिशा और संरक्षण मिले, तो वे वैश्विक मंच पर अपनी अमिट छाप छोड़ सकती हैं। यह सम्मान बुनकरों की लगन को मिला एक कानूनी सुरक्षा चक्र है, जो उनके आर्थिक सशक्तिकरण की नींव रखता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी तंत्र और बुनकर समूह मिलकर इस अवसर को किस तरह एक सफल और टिकाऊ वैश्विक ब्रांड में बदलते हैं।
Updated on:
08 Aug 2026 01:07 pm
Published on:
08 Aug 2026 01:07 pm
