21 अगस्त 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

देश के तटीय इलाकों पर मंडराया गंभीर खतरा; समुद्र में समा रहा किनारा, NCCR रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च (NCCR) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा धीरे-धीरे घट रही है। इस कटाव की वजह से तटीय इलाको में रहने वालों की आजीबिका पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
4 min read
Google source verification

भारत

image

Vinay Shakya

Aug 21, 2026

sea coastline is retreating

सांकेतिक इमेज (सोर्स-ChatGpt)

भारत की करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा, जो कभी मछुआरा बस्तियों, बंदरगाहों और पर्यटन स्थलों की समृद्धि का प्रतीक थी। अब यह तटरेखा धीरे-धीरे समुद्र में समाती जा रही है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च (NCCR) की रिपोर्ट ने देश के तटीय राज्यों में तेजी से बढ़ रहे कटाव को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। NCCR की रिपोर्ट बताती है कि जिन इलाकों को कभी सुरक्षित माना जाता था। वहां अब जमीन खिसकने और बस्तियां उजड़ने का खतरा वास्तविक होता जा रहा है।

NCCR रिपोर्ट के आंकड़े

एनसीसीआर ने सैटेलाइट तस्वीरों और फील्ड सर्वे के आधार पर 1990 से 2018 के बीच देश के मुख्य भूमि के करीब 6,907 किलोमीटर तटीय क्षेत्र का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में देश की करीब 33.6 प्रतिशत तटरेखा किसी न किसी स्तर के कटाव की चपेट में रही, जबकि 26.9 प्रतिशत हिस्से में नई तलछट जमा होने से जमीन बढ़ी (एक्रीशन) और बाकी करीब 39.5 प्रतिशत तटरेखा स्थिर पाई गई।

राज्यवार आंकड़ों की स्थिति चिंताजनक

देश में राज्यवार आंकड़े और भी चिंताजनक हैं। पश्चिम बंगाल में तटरेखा का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा कटाव की चपेट में है। यह हिस्सा देश में सबसे अधिक प्रभावित राज्यों की लिस्ट में है। पश्चिम बंगाल के बाद पुद्दुचेरी में करीब 56 प्रतिशत, केरल में करीब 46 प्रतिशत और तमिलनाडु में करीब 42 प्रतिशत तट कटाव से प्रभावित पाया गया। इसके उलट ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटों पर सबसे ज्यादा भूमि-वृद्धि (एक्रीशन) दर्ज हुई, जबकि गोवा और महाराष्ट्र की तटरेखा अपेक्षाकृत सबसे स्थिर मानी गई। NCCR रिपोर्ट यह भी बताती है कि पश्चिमी तट के मुकाबले पूर्वी तट, यानी बंगाल की खाड़ी से सटे इलाकों में कटाव कहीं ज्यादा तेज है, क्योंकि यह क्षेत्र लगातार चक्रवाती गतिविधियों और भारी बारिश की जद में रहता है।

प्रभावित बस्तियों की जिंदगी पर असर

सर्वे के आंकड़ों की तुलना में जमीनी हकीकत और भी डरावनी है। ओडिशा के गंजाम जिले में इसी साल सामने आया एक मामला इसका उदाहरण है, जहां समुद्र के लगातार आगे बढ़ने से पालिबंधा और रामगड़ा ग्राम पंचायतों के 17 गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। यहां पोड़मपेटा गांव में कभी करीब 500 घर हुआ करते थे। अब वे सिमटकर कुछ ही मकानों तक रह गए हैं। इस गांव में हाल ही में एक पक्का मकान सीधे समुद्र में समा गया। तटीय इलाके में कटाव की स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय विधायक ने राज्य सरकार से तत्काल विशेष पैकेज और स्थायी तटीय सुरक्षा परियोजनाओं की मांग की है।

पश्चिम बंगाल मछुआरों पर संकट

पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले में भी मछुआरा समुदायों की आजीविका पर संकट गहरा गया है। जलवायु परिवर्तन से बढ़े कटाव के साथ-साथ तटीय सड़क जैसी विकास परियोजनाओं ने भी हालात बिगाड़े हैं। जिससे कई परिवार मछली पकड़ने की जगह खेती जैसे वैकल्पिक पेशों की ओर रुख करने को मजबूर हुए हैं। बिहार में कोसी नदी के किनारे बसे गांवों में भी हर मानसून में दर्जनों घर कटाव की भेंट चढ़ जाते हैं और लोगों को ऊंचे इलाकों में शरण लेनी पड़ती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि कटाव सिर्फ जमीन का नुकसान नहीं है, बल्कि यह मछुआरों की नाव खड़ी करने और जाल सुखाने की जगह भी छीन लेता है। जिसकी वजह से मछुआरा समुदाय को दूर के हार्बर पर निर्भर होना पड़ता है।

बचाव के उपाय: सरकार और समाज की भूमिका

तटीय कटाव रोकने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। तटीय क्षेत्र नियमन (CRZ) अधिसूचना, 2019 के तहत तटों के पास निर्माण को नियंत्रित किया गया है। पर्यावरण मंत्रालय ने समुद्र-स्तर वृद्धि के हिसाब से पूरे तट के लिए 'हैजार्ड लाइन' भी तय की है। केंद्र सरकार ने 2023 में 'मिष्टी' (मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटेट्स एंड टैंजिबल इनकम्स) योजना शुरू की है।

केंद्र सरकार की 'मिष्टी' योजना के तहत 9 तटीय राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव वनों की बहाली की जा रही है, क्योंकि मैंग्रोव तूफानी लहरों की ऊर्जा को सोखकर तटों की स्वाभाविक सुरक्षा करते हैं। पश्चिम बंगाल के सागर द्वीप पर भी वन विभाग ने मैंग्रोव रोपण और तटबंध ऊंचे करने जैसे कदम उठाए हैं ताकि कटाव और खारे पानी के प्रवेश को रोका जा सके। इसके अलावा सीवॉल, ग्रोयन और जियो-ट्यूब जैसी इंजीनियरिंग संरचनाएं भी कई जगह लगाई गई हैं। हालांकि विशेषज्ञ इनके इस्तेमाल को लेकर सतर्क करते हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

एनसीसीआर के निदेशक रह चुके एम.वी. रमन मूर्ति के अनुसार कटाव और भूमि-वृद्धि एक-दूसरे से जुड़ी प्रक्रियाएं है। यानी एक जगह से खिसकी रेत और तलछट किसी दूसरी जगह जमा होती है। इसलिए तटीय प्रबंधन को टुकड़ों में नहीं बल्कि समूचे तट के नजरिए से देखने की जरूरत है। नेशनल कोस्टल प्रोटेक्शन कैंपेन से जुड़े विशेषज्ञ चेताते हैं कि ग्रोयन जैसी संरचनाएं एक हिस्से में रेत रोक तो लेती हैं, लेकिन इससे सटे निचले हिस्से में तलछट की कमी होने से कटाव और तेज हो जाता है। मत्स्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी स्वीकार किया कि कई जगह सख्त इंजीनियरिंग उपायों ने कटाव को कम करने के बजाय बढ़ा दिया है।

यही वजह है कि ज्यादातर वैज्ञानिक अब सीवॉल जैसी 'हार्ड' संरचनाओं की जगह मैंग्रोव रोपण, रेत के टीलों की बहाली और तट पर प्राकृतिक वनस्पति बढ़ाने जैसे 'सॉफ्ट' उपायों को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं। 15वें वित्त आयोग ने भी सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण या गृह मंत्रालय तटीय कटाव को आपदा प्रबंधन ढांचे में शामिल कर व्यवस्थित नीति बनाए। NCCR की रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर समय रहते वैज्ञानिक और सामुदायिक स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो देश के लाखों तटीय निवासियों के लिए यह खतरा आने वाले वर्षों में और गहरा सकता है।