
जेल की यातनाएं भी नहीं तोड़ सकीं प्रताप सिंह बारहठ का देशप्रेम। ( विजुअल: AI)
राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल आंदोलनों और राजनीतिक सभाओं तक सीमित नहीं है। इसके पन्नों में ऐसे युवा क्रांतिकारियों की कहानियां भी दर्ज हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने के बजाय अपना जीवन देश के नाम कर दिया। कुंवर प्रताप सिंह बारहठ इसी परंपरा के ऐसे क्रांतिकारी थे, जिनका जीवन महज 25 वर्षों का रहा, लेकिन उनका साहस आज भी राजस्थान के स्वतंत्रता इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
राजस्थान सरकार के राजस्थान फाउंडेशन ने प्रताप सिंह बारहठ को ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन का प्रमुख चेहरा बताया है। सरकारी विवरण के अनुसार, वे बनारस षड्यंत्र मामले में गिरफ्तार हुए, उन्हें पांच वर्ष के कारावास की सजा मिली और बरेली सेंट्रल जेल में अंग्रेजों की यातनाओं के बावजूद उन्होंने अपने साथियों की जानकारी देने से इनकार किया। 24 मई 1918 को जेल में उनकी मृत्यु हुई।
प्रताप सिंह बारहठ का जन्म 1893 में हुआ। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस में प्रकाशित इतिहासकार डॉ. पीयूष भादविया के शोध के अनुसार उनका जन्म उदयपुर में हुआ था और उनका बचपन कोटा में बीता। उनके पिता ठाकुर केसरी सिंह बारहठ स्वयं क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे।
केसरी सिंह बारहठ की राष्ट्रवादी सोच का प्रभाव प्रताप सिंह पर बचपन से पड़ा। आगे चलकर वे जयपुर में अर्जुनलाल सेठी से जुड़े। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के शोध-पत्र के अनुसार, बाद में उन्हें दिल्ली के क्रांतिकारी मास्टर अमीरचंद से भी प्रशिक्षण मिला। यहां उन्होंने गुप्त संगठन चलाने, क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित करने और भूमिगत गतिविधियों से जुड़ी कई बातें सीखीं। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव से जुड़े डिजिटल जिला अभिलेख में भी प्रताप सिंह को केसरी सिंह बारहठ का पुत्र और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय बताते हुए उनकी शहादत का उल्लेख किया गया है।
इतिहास के अनुसार युवा अवस्था में प्रताप सिंह का संपर्क रासबिहारी बोस और सचिंद्रनाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारियों से हुआ। उनका उद्देश्य राजस्थान सहित उत्तर भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों को मजबूत करना था।
राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस में प्रकाशित शोध के अनुसार, प्रताप सिंह ने राजस्थान के युवाओं को क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए तैयार करने और सैनिक छावनियों से संपर्क बनाने का प्रयास किया। उस दौर में क्रांतिकारी संगठन अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों को भी संभावित सशस्त्र विद्रोह से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
प्रताप सिंह बारहठ का नाम 1912 के दिल्ली षड्यंत्र से भी जुड़ा मिलता है। राजस्थान सरकार के आधिकारिक विवरण के अनुसार, 3 दिसंबर 1912 को वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए क्रांतिकारी हमले की योजना में उनकी अहम भूमिका थी।
इसके बाद क्रांतिकारी गतिविधियों का दायरा और बढ़ा। सन 1915 के प्रस्तावित सशस्त्र विद्रोह और बनारस षड्यंत्र से प्रताप सिंह जुड़े। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के शोध के अनुसार, वे सचिंद्रनाथ सान्याल के साथ काम कर रहे थे और राजस्थान तथा उत्तर भारत की सैन्य छावनियों में क्रांतिकारी संपर्क मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे।
बनारस षड्यंत्र मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया। फरवरी 1916 में अदालत ने उन्हें पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद उन्हें बरेली सेंट्रल जेल भेजा गया। राजस्थान सरकार का विवरण भी इसी सजा और बरेली जेल में कैद की पुष्टि करता है।
प्रताप सिंह की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बरेली जेल से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजी अधिकारियों को उम्मीद थी कि जेल में दबाव डालकर उनसे क्रांतिकारी संगठन, साथियों और योजनाओं की जानकारी हासिल की जा सकती है। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस में प्रकाशित शोध के अनुसार, उनसे उनके साथियों के नाम बताने के लिए लगातार दबाव डाला गया, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया।
उनसे जुड़े ऐतिहासिक विवरणों में यह भी मिलता है कि अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें कई तरह के प्रलोभन दिए। परिवार से जुड़ी रियायतों और सुविधाओं का लालच देकर भी उन्हें तोड़ने की कोशिश की गई। लेकिन प्रताप सिंह अपने फैसले से पीछे नहीं हटे।
उनसे उनकी मां के दुख का हवाला देकर भी जानकारी देने के लिए कहा गया। इसके जवाब में उनका कथित कथन स्वतंत्रता आंदोलन की लोक-स्मृति में अमर हो गया-वे अपनी मां के दुख को सहने के लिए तैयार थे, लेकिन ऐसा करके वे अनेक क्रांतिकारियों की माताओं को दुखी नहीं करना चाहते थे। इस प्रसंग का अलग-अलग स्रोतों में अलग उल्लेख मिलता है, इसलिए इसे शाब्दिक उद्धरण के बजाय उनके त्याग और दृढ़ता के प्रतीक के रूप में देखना अधिक उचित है। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के शोध-पत्र में भी उनके इसी रुख का उल्लेख है।
बरेली सेंट्रल जेल में प्रताप सिंह को शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। राजस्थान फाउंडेशन के आधिकारिक विवरण में लिखा है कि अंग्रेजों ने उनके साथियों के नाम जानने के लिए उन्हें क्रूर यातनाएं दीं, लेकिन उन्होंने जानकारी देने से इनकार कर दिया।
राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के शोध के अनुसार, वे एकांत कारावास में भी रहे और लगातार यातनाएं सहते रहे। इसके बावजूद उन्होंने क्रांतिकारी साथियों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।
क्रांतिवीर प्रताप सिंह बारहठ की 24 मई 1918 को बरेली सेंट्रल जेल में मृत्यु हो गई। राजस्थान सरकार का आधिकारिक विवरण यही तारीख दर्ज करता है। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के शोध-पत्र के अनुसार उनकी मृत्यु के समय उनकी उम्र 25 वर्ष थी। यानी जिस उम्र में आज का युवा अपना भविष्य बनाने की शुरुआत करता है, उस उम्र में प्रताप सिंह ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समाप्त कर दिया। उनकी मृत्यु अंग्रेजों से कोई रहस्य हासिल किए बिना हुई। यही उनकी शहादत की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
प्रताप सिंह की कहानी को उनके परिवार से अलग करके देखना मुश्किल है। उनके पिता केसरी सिंह बारहठ और चाचा जोरावर सिंह बारहठ भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे। राजस्थान सरकार ने केसरी सिंह और प्रताप सिंह दोनों को राजस्थान के स्वतंत्रता संघर्ष के प्रमुख सेनानियों में शामिल किया है।
शाहपुरा में बारहठ परिवार की विरासत आज भी स्मृति का हिस्सा है। राजस्थान पर्यटन विभाग ने भी शाहपुरा के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में बारहठ परिवार से जुड़े स्मारकों का उल्लेख किया है और केसरी सिंह, जोरावर सिंह व प्रताप सिंह बारहठ को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ कर बताया है।
प्रताप सिंह के नाम पर शाहपुरा में सरकारी महाविद्यालय भी है, जो उनके ऐतिहासिक योगदान की सार्वजनिक स्मृति का एक उदाहरण है। राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के दस्तावेज में संस्थान का नाम श्री प्रताप सिंह बारहठ राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय दर्ज है।
प्रताप सिंह बारहठ का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे एक क्रांतिकारी थे। उनकी कहानी यह बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिगत क्रांतिकारी नेटवर्क, युवाओं की भूमिका और व्यक्तिगत त्याग कितने महत्वपूर्ण थे।
राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के शोध में उनके योगदान को राजस्थान के क्रांतिकारी आंदोलन के व्यापक संदर्भ में रखा गया है। शोधकर्ता डॉ. पीयूष भादविया ने उनके जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका पर अलग शोध-पत्र प्रकाशित किया है।
प्रताप सिंह बारहठ का जीवन छोटा था, लेकिन उनके सामने मौजूद लक्ष्य बड़ा था। उन्होंने जेल, यातना और मौत के खतरे के बावजूद अपने साथियों का भेद नहीं खोला। उनकी कहानी का सबसे मजबूत संदेश यही है कि स्वतंत्रता आंदोलन में बलिदान केवल रणभूमि में नहीं हुआ। जेल की कोठरियों में भी अनेक युवाओं ने यातनाएं सहीं, अपने परिवारों से दूर रहे और अपनी जान देकर आंदोलन के रहस्यों की रक्षा की।
बहरहाल, प्रताप सिंह बारहठ की शहादत राजस्थान के इतिहास में इसी अडिग संकल्प की मिसाल है। 25 वर्ष की उम्र में बरेली जेल में उनका जीवन समाप्त हुआ, लेकिन उनका नाम राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम की उस परंपरा में दर्ज हो गया, जहां देश के लिए व्यक्तिगत सुख, परिवार और जीवन तक का त्याग करने की तैयारी थी।
Updated on:
10 Aug 2026 08:47 pm
Published on:
10 Aug 2026 08:47 pm
