
Freedom fighter raja shankar shah son raghunath shah: कविताओं से जगा दी क्रांति (AI Creative)
Raja Shankar Shah Raghunath Shah: भारत की स्वतंत्रता के 79 साल पूरे हो चुके हैं। 2026 में हम 80वें स्वतंत्रता दिवस का स्वागत करेंगे। इस खास मौके पर एमपी के गुमनाम क्रांतिवीरों की अनसुनी कहानियों में जानिए एमपी के एक राजा का दर्दनाक किस्सा, जिन्हें उसके बेटे के साथ तोप के मुंह पर बांधा गया और बारूद के गोले से उड़ा दिया गया। अंग्रेजी हुकूमत की ऐसी ही क्रूरता के किस्से भारतीयों को विद्रोह से भर चुके थे।
गोंडवाना साम्राज्य, कभी मध्य भारत का एक विशाल हिस्सा, अब सिमटकर जबलपुर के आसपास का इलाका। यहां के राजा शंकर शाह सिर्फ शासक नहीं थे, एक अच्छे कवि भी थे। और उनका बेटा रघुनाथ शाह भी पिता की तरह ही तलवार और कलम, दोनों में माहिर।
1857 का साल, जबलपुर में तैनात अंग्रेजी सेना की 52वीं रेजिमेंट का कमांडर था, लेफ्टिनेंट क्लार्क। कहा जाता है कि वह बेहद क्रूर आदमी था। छोटे-छोटे राजाओं और आम जनता पर इतना जुल्म कि चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची थी। राजा शंकर शाह से यह देखा नहीं गया। उन्होंने आसपास के जमींदारों और जनता को साथ लेकर क्लार्क के जुल्म के खिलाफ विद्रोह की तैयारी शुरू की। हथियार भी जुटाए, पर सबसे तेज हथियार थी उनकी कलम।
राजा और राजकुमार, दोनों ने मिलकर विद्रोह जगाने वाली कविताएं लिखीं। ये ऐसे गीत बन गए जो जनता के दिलों में अंग्रेजों के खिलाफ आग भर दें। उन कविताओं की हस्तलिपियां और विद्रोह के आमंत्रण-पत्र जनता में गुप्त रूप से बांटे जाते। लेकिन अंग्रेजों के जासूस हर जगह थे।
क्लार्क को खबर लग गई कि गोंडवाना का राजा बगावत की तैयारी में है। एक रात, छल से राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके महल की तलाशी में वही कविताएं और आमंत्रण-पत्र बरामद किए गए और यही उनका 'सबूत' बन गया।
अंग्रेजी न्याय आयोग ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई। लेकिन राजा शंकर शाह ने इसे ठुकरा दिया। 'हम ठग नहीं, लुटेरे नहीं, हत्यारे नहीं हैं कि हमें फांसी पर लटकाया जाए। हम गोंडवाना के राजा हैं। हमें तोप के मुंह से उड़ाया जाए, जैसा एक राजा के साथ होना चाहिए।'
यह सुनकर अंग्रेज अफसर हैरान रह गए। मौत खुद मांगने वाला यह कैसा कैदी है! पर उन्होंने सोचा, तोप से उड़ाना जनता में और ज्यादा दहशत फैलाएगा, तो यही सजा दी जाए।
जबलपुर के बीचोंबीच भरे बाजार में दो अलग-अलग तोपें तैयार की गईं। एक पर पिता को बांधा गया, दूसरी पर पुत्र को। चारों तरफ जनता खड़ी थी। सांस रोके, आंखों में आंसू लिए। मृत्यु से ठीक पहले, राजा ने अपनी प्रजा को आखिरी बार संबोधित किया। एक छंद सुनाया, विद्रोह और साहस का। फिर बारी आई बेटे रघुनाथ शाह की, उसने भी अपने पिता की कविता को आगे बढ़ाते हुए एक छंद सुनाया। छंद पूरा होते ही भीड़ से 'राजा की जय!' के नारे गूंज उठे। फिर तोप के गोले दाग दिए गए।
पिता और पुत्र, दोनों का शरीर क्षण भर में छिन्न-भिन्न हो गया। पूरे भारत में किसी राजघराने की तरफ से यह पहला ऐसा बलिदान था। लेकिन इतिहास की किताबों में यह घटना कहीं गुम-सी है, लेकिन जबलपुर आज भी उस जगह को याद करता है, जहां पिता-पुत्र को बंदी बनाकर रखा गया था। अब वहां वन विभाग का दफ्तर है। हर साल 18 सितंबर को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है। यही वो राजा था, जिसने तलवार से नहीं, कविता से क्रांति जगाई और मौत को भी अपनी शर्तों पर गले लगाया।
Updated on:
19 Aug 2026 03:11 pm
Published on:
12 Aug 2026 02:51 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
