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अदब, संगीत और नवाबी रसोई का जायका यहां, जानिए क्यों हर foodie को एक बार रामपुर जरूर जाना चाहिए?

Visit Rampur Bharat ke Nawabi Shahar: एक समय रामपुर नवाबों की शान और सांस्कृतिक समृद्धि का गढ़ था? यहां की हवेलियों से लेकर स्वादिष्ट व्यंजनों तक, हर कोना एक कहानी बुनता है। patrika.com पर भारत के नवाबी शहर सीरीज में आइए चलते हैं रामपुर की सैर पर...
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Sanjana Kumar

Sep 12, 2026

Visit Rampur bharat ke nawabi shahar

Visit Rampur bharat ke nawabi shahar: AI Image

Visit Rampur Bharat ke Nawabi Shahar: रामपुर का नाम लेते ही जेहन में किसी नवाबी शहर की तस्वीर उभरती है, ऊंचे दरवाजे, शाही इमारतें, महफिलों की रौनक और मेहमाननवाजी का सलीका। लेकिन रामपुर की कहानी सिर्फ नवाबों की सल्तनत या बीते हुए शाही दौर की दास्तान कतई नहीं है। यह वह शहर है, जहां सत्ता के साथ-साथ इल्म ने भी अपनी जगह बनाई, जहां किताबें विरासत बनीं, शायरी ने दरबारों को सजाया, संगीत ने पीढ़ियों का सफर तय किया और रसोई ने ऐसे जायके गढ़े, जिनमें आज भी नवाबी दौर की खुशबू ली जा सकती है।

1774 में नवाब फैजुल्लाह खान ने रखी रामपुर की नींव

1774 में नवाब फैजुल्लाह खान के नेतृत्व में रोहिल्ला पठानों ने रामपुर रियासत की नींव रखी थी। और अगले डेढ़ सौ से ज्यादा वर्षों में इस छोटे से रियासती शहर ने अपनी एक अलग सांस्कृतिक पहचान गढ़ी। रजा लाइब्रेरी से लेकर कभी दरबार में गूंजती शायरी और शास्त्रीय संगीत की महफिलें, कभी शाही दस्तरख्वान पर सजे खास पकवान और कभी मुगल तथा यूरोपीय स्थापत्य की मिली-जुली छाप लिए इमारतें इसे अलग पहचान देती हैं। यही कारण है कि रामपुर को समझना दरअसल उस तहजीब को समझना है, जिसमें नफासत जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थी। आज नवाबी हुकूमत इतिहास का हिस्सा है, लेकिन रामपुर की गलियों, इमारतों, संगीत, दस्तकारी और खान-पान में उस दौर की रवानी आज भी बनी हुई है।।

मुगल भवनों में यूरोपीय स्थापत्य कला की झलक

यहां की रजा लाइब्रेरी, जिसे नवाब फैजुल्लाह खान ने ही स्थापित किया था आज भी एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मौजूद है। इस लाइब्रेरी में दुर्लभ पांडुलिपियों से लेकर चित्रकला और सुलेख तक का ऐसा संसार है, जो बताता है कि रामपुर के नवाबों की दिलचस्पी सिर्फ हुकूमत में नहीं, इल्म और फन में भी थी। लाइब्रेरी का यह भवन मुगल और यूरोपीय स्थापत्य का सुंदर मिश्रण है। किला, इमामबाड़ा और जामा मस्जिद जैसे स्मारक नवाबी वास्तुकला की मिसाल हैं। खास बाग पैलेस, जो 1930 में पूरा हुआ, यूरोपीय और इस्लामी शैली का संगम है।

संगीत और संगीत घरानों की दुनिया भी

रामपुर-सहासवान घराना हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक प्रमुख घराना है, जिसकी शुरुआत नवाबी दरबार में हुई थी। उस्ताद मेहबूब खान और उनके पुत्र उस्ताद इनायत हुसैन खान ने इस घराने की नींव रखी। उस्ताद मुश्ताक हुसैन खान ऐसी शख्सियत थे, जिन्हें नवाब ने 'रतन' की उपाधि दी। वे इस घराने के प्रमुख संगीतकार थे और शास्त्रीय संगीत में पद्म भूषण से सम्मानित पहले व्यक्ति भी कहलाए। 1857 की क्रांति के बाद लखनऊ से कलाकारों का पलायन रामपुर की सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ा गया।

खान-पान और नवाबी रसोई का जादू आज भी

रामपुरी व्यंजन मुगल, अवधी, कश्मीरी और अफगानी स्वादों का संगम हैं। 1857 के बाद मुगल दरबारों से आए खानसामों ने यहां की रसोई को समृद्ध किया। नवाब हामिद अली खान ने इन व्यंजनों को 'हेरिटेज' के रूप में स्थापित किया। जटिल व्यंजनों में शबदेघ, डम्पुख्त पुलाव, उरुस-ए-बहरी, दर-ए-बहिश्त, मुजफर और नान-ए-संतरा शामिल थे। रसोई की खासियत यह थी कि नवाब खुद स्वाद और प्रस्तुति के मानक तय करते थे।

हस्तशिल्प और चाकू कला का हुनर शहर को बनाता है खास

रामपुर अपने हुनर के लिए भी जाना जाता है। यहां जरी-जरदोजी कढ़ाई आज भी प्रसिद्ध हैं। पतंग बनाने की कला भी यहां की पुरानी हस्तकला है। रामपुरी चाकू की परंपरा लगभग 125 साल पुरानी है। 1980 के दशक में यह उद्योग कमजोर हुआ।

आज की स्थिति और आगे का रास्ता

रामपुर की नवाबी विरासत आज भी जीवंत है, रजा लाइब्रेरी, संगीत घराना, हस्तशिल्प और खान-पान की परंपराएं वक्त के साथ बढ़ीं और कायम भी हैं। हालांकि उस दौर के कुछ खास व्यंजन और कला अब केवल यादों में बचे हैं। यह समय है कि हम इन विरासतों को दस्कतावेजी रूप में फिर से संजोए। स्थानीय उत्सवों, कार्यशालाओं और सांस्कृतिक पर्यटन के माध्यम से उन्हें पुनर्जीवित करें।

रामपुर की नवाबी संस्कृति सिर्फ अतीत की कहानी नहीं, बल्कि आज की पहचान भी है। जब हम इन विरासतों को संजोते हैं, तो हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत करते हैं। रामपुर खास तौर पर उन्हें पसंद आएगा जो खाने के शौकीन, जो इतिहास को जीना जानते हैं या फिर स्थानीय कलाएं जिन्हें आकर्षित करती हैं। तो क्या आप तैयार हैं, रामपुर का नवाबी दौर जीने के लिए!