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12 सितंबर: सारागढ़ी में उस दिन 22 सिक्ख हुए थे शहीद, ब्रिटिश संसद तक पहुंची थी 21 सिक्ख रेजिमेंट लड़ाई की गूंज

12 September History: आज की तारीख का इतिहास बलिदान की याद दिलाता है, देशभक्ति की भावना से भर देता है। सोचिए सिर्फ 21 सिख सैनिकों ने 10,000 दुश्मनों का कैसे सामना किया होगा? सारागढ़ी की लड़ाई की इस अमर गाथा में छिपी साहस और बलिदान की अनोखी कहानी आज किस रूप में याद की जाती है, क्या जानते हैं आप? और वो 22वां सिक्ख वीर आखिर था कौन?
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Sanjana Kumar

Sep 12, 2026

12 September History

12 September History: AI Creative

सारागढ़ी की लड़ाई: वीरता की अमर गाथा

12 September History: न मोबाइल, न वायरलेस और न ही आज जैसी कोई तेज संचार व्यवस्था। फिर भी 12 सितंबर 1897 को एक छोटी-सी पहाड़ी चौकी से भेजे जा रहे संदेश लगातार दो किलों के बीच पहुंच रहे थे। संदेश भेजने वाला था सूरज की रोशनी से संकेत देने वाला एक उपकरण और उसकी जिम्मेदारी संभाल रहे थे ब्रिटिश भारतीय सेना की 36वीं सिख रेजिमेंट के 21 जवान। सामने हजारों की संख्या में हमलावर थे और सारागढ़ी की यह चौकी चारों तरफ से घिर चुकी थी। इसके बावजूद उन सैनिकों ने आखिरी सांस तक मोर्चा नहीं छोड़ा।

सारागढ़ी की लड़ाई इसलिए सिर्फ 21 सैनिकों की बहादुरी की कहानी नहीं है, बल्कि उस दौर की सैन्य तकनीक, संचार व्यवस्था और भारतीय सैनिकों की भूमिका की भी ऐसी कहानी है, जिसकी गूंज भारत से बहुत दूर ब्रिटिश संसद तक पहुंची थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर 12 सितंबर को सारागढ़ी में हुआ क्या था कि यह लड़ाई ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीति का भी हिस्सा बन गई? patrika.com पर जानिए 12 सितंबर के दिन बलिदान की कहानी और देखिए इतिहास ने किसे याद रखा किसे भूल गया?

सारागढ़ी की रणनीतिक अहमियत

सारागढ़ी एक महत्वपूर्ण संकेतक पोस्ट था, जो फोर्ट लॉकहार्ट और फोर्ट गुलिस्तान के बीच संचार का एकमात्र जरिया था। दृश्य संकेतों (heliograph) के माध्यम से संदेश भेजे जाते थे और यह पोस्ट दोनों किलों के बीच संपर्क बनाए रखता था।

असाधारण बहादुरी का दिन, आखिर हुआ क्या था

12 सितंबर 1897: सारागढ़ी में उस दिन क्या हुआ था?

12 सितंबर की सुबह सारागढ़ी की पहाड़ी चौकी पर तैनात जवानों के लिए शायद किसी और दिन जैसी ही शुरू हुई थी। यह कोई बड़ा किला नहीं था, बल्कि एक छोटी-सी संचार चौकी थी, जो फोर्ट लॉकहार्ट और फोर्ट गुलिस्तान के बीच संदेश पहुंचाने का काम करती थी। यहां तैनात सैनिक दूर स्थित किलों से संपर्क बनाए रखने के लिए हेलियोग्राफ का इस्तेमाल करते थे। यानी सूरज की रोशनी को आईने से चमकाकर संदेश भेजे जाते थे।

लेकिन उस सुबह पहाड़ियों के दूसरी तरफ कुछ और ही तैयारी चल रही थी।

करीब 10 हजार अफरीदी और ओरकजई लड़ाकों ने सारागढ़ी की ओर बढ़ना शुरू किया। चौकी पर मौजूद सैनिकों की संख्या महज 21 थी। उनका नेतृत्व हवलदार ईशर सिंह कर रहे थे। पहली नजर में मुकाबला असंभव लगता था। एक तरफ हजारों हमलावर, दूसरी तरफ एक छोटी चौकी और उसके भीतर 21 सैनिक।

फिर भी सारागढ़ी से एक के बाद एक संदेश भेजे जाने लगे। हेलियोग्राफ के जरिए फोर्ट लॉकहार्ट को बताया गया कि बड़ी संख्या में हमलावर चौकी की ओर बढ़ रहे हैं। अब सारागढ़ी सिर्फ एक चौकी नहीं रह गई थी, वह दो महत्वपूर्ण किलों के बीच आखिरी संचार कड़ी बन चुकी थी।

हमलावरों ने चौकी को घेरना शुरू किया। सैनिकों ने जवाबी फायरिंग की और उन्हें आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की। लेकिन संख्या का अंतर बहुत बड़ा था। हमलावर धीरे-धीरे चौकी की बाहरी सुरक्षा तक पहुंचने लगे। इसी दौरान सारागढ़ी से भेजे जा रहे संदेशों में लड़ाई की स्थिति लगातार बताई जा रही थी।

फोर्ट लॉकहार्ट से मदद भेजना आसान नहीं था, बीच का इलाका पहाड़ी था और चौकी तक तत्काल पहुंचना संभव नहीं था। घंटों तक सैनिकों ने मोर्चा संभाले रखा। हमलावरों ने चौकी की दीवारों को तोड़ने की कोशिश की। गोलियां चलती रहीं। सैनिक एक-एक करके कम होते गए, लेकिन प्रतिरोध खत्म नहीं हुआ।

बलिदान की यह कहानी तब और भी मार्मिक सुनाई देती है जब चौकी का बचाव लगभग असंभव हो चुका था। ईशर सिंह और उनके साथी जानते थे कि अब बाहर निकलने का रास्ता लगभग बंद हो चुका है। फिर भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। आखिरकार हमलावर चौकी के भीतर पहुंच गए और वहां मौजूद सभी 21 सैनिक मारे गए।

ब्रिटिश साम्राज्य तक गूंजा यह बलिदान

इस लड़ाई की गूंज ब्रिटिश संसद तक पहुंची और महारानी विक्टोरिया ने सैनिकों की बहादुरी की प्रशंसा की। सभी 21 सैनिकों को भारतीय मेरिट ऑर्डर (Indian Order of Merit) से सम्मानित किया गया, जो उस समय भारतीय सैनिकों के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार था।

जानिए आज किस रूप में याद किया जाता है ये दिन

सरकार ने सारागढ़ी साइट पर एक स्मारक (obelisk) बनाया, जिसमें चौकी की ईंटों का इस्तेमाल किया गया। अमृतसर और फिरोजपुर में सार्वजनिक योगदान से दो गुरुद्वारे बनाए गए, जहां शहीदों की याद में श्रद्धांजलि दी जाती है। भारतीय सेना की 4वीं बटालियन हर साल 12 सितंबर को सारागढ़ी दिवस के रूप में मनाती है।

साहस की इस कहानी में इतिहास किसे भूल गया?

आपको जानकर हैरानी होगी की सारागढ़ी सिर्फ 21 सैनिकों की कहानी नहीं थी। वहां मौजूद एक गैर-लड़ाकू व्यक्ति दाद ने भी आखिरी समय में इस लड़ाई में हिस्सा लिया था। और दाद भी इस लड़ाई में शहीद हुए, लेकिन अफसोस कि इतिहास उसे भुला चुका है। लेकिन जानकारी मिलती है कि उसे सैनिकों जैसा सम्मान भी नहीं मिला।

सारागढ़ी की लड़ाई आज भी एक प्रेरणा है

यह लड़ाई साहस, कर्तव्य और बलिदान की मिसाल बन गई है। इसे विश्व की महान अंतिम लड़ाइयों में गिना जाता है, जैसे थर्मोपाइली और अलामो। फ्रांस जैसे देशों में यह स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल है।

सारागढ़ी की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि असली वीरता केवल पद या दर्जे से नहीं, बल्कि दिल और इरादे से आती है। 21 सिख सैनिकों की बहादुरी इतिहास में अमर हैऔर यह लड़ाई आज भी प्रेरणा देती है एक ऐसी कहानी है जो आज भी देशभक्ति की भावना से भर देती है।