
Sikkim Tunnel Accident : हिमालयी क्षेत्र में क्यों होते हैं हादसे, PC- Patrika
20 जुलाई को दोपहर में सिक्किम के नामची जिले में समरडुंग (झोलुंगे) इलाके में एक भीषण हादसा हुआ। NHPC की तीस्ता स्टेज-VI जलविद्युत परियोजना के लिए बन रही सुरंग के अंदर मीथेन गैस विस्फोट के बाद भूस्खलन हुआ, जिससे सुरंग का प्रवेश द्वार मलबे से बंद हो गया। करीब 27 मजदूर अंदर फंस गए। अब तक 8 मौतों की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है, जबकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में मृतकों की संख्या और ज्यादा होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इसकी पुष्टि प्रशासन ने अभी नहीं की है। बचाव अभियान जहरीली गैस और मलबे की वजह से बेहद मुश्किल बना हुआ है।
यह हादसा अकेला नहीं है। पिछले तीन वर्षों में हिमालयी राज्यों में सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े कई बड़े हादसे हो चुके हैं। सवाल यह है कि क्या ये महज दुर्घटनाएं हैं, या पहाड़ों में तेज गति से चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और सुरक्षा मानकों के बीच का फासला हर बार सामने आ रहा है?
तीस्ता स्टेज-VI एक 500 मेगावाट की रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजना है, जिसे भारत सरकार की प्रमुख जलविद्युत कंपनी NHPC विकसित कर रही है। यह परियोजना दो दशकों से भी ज्यादा समय से निर्माणाधीन है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 21 साल पहले शुरू हुई इस परियोजना पर अब तक लगभग 8,449 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन यह अब भी अधूरी है।
हादसे की वजह शुरुआती जांच में भूमिगत मीथेन गैस का रिसाव और उसके बाद हुआ विस्फोट बताई जा रही है, जिसने सुरंग के अंदर भूस्खलन को ट्रिगर किया। मीथेन जैसी ज्वलनशील गैसें हिमालयी क्षेत्र की कमजोर और तलछटी चट्टानों में अक्सर पॉकेट्स के रूप में फंसी होती हैं। अगर खुदाई के दौरान इनका पूर्वानुमान और निगरानी न हो, तो ये बेहद खतरनाक साबित होती हैं।
सिल्क्यारा टनल, उत्तरकाशी (उत्तराखंड) : चारधाम ऑल-वेदर रोड परियोजना के तहत बन रही सिल्क्यारा-बड़कोट सुरंग नवंबर 2023 में दुनिया भर में सुर्खियों में आई थी, जब भूस्खलन के कारण उसका एक हिस्सा ढह गया और 41 मजदूर 17 दिनों तक अंदर फंसे रहे। भारत के सबसे बड़े और चुनौतीपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशनों में गिना जाने वाला यह अभियान 28 नवंबर 2023 को सफल रहा, और सरकार ने भविष्य में सुरंगों में सुरक्षा मानकों को सख्त करने की घोषणा की थी।
लेकिन जुलाई 2026 में, यानी करीब ढाई साल बाद, इसी सिल्क्यारा टनल में एक और हादसा हुआ — कंक्रीट (शॉटक्रीट) लाइनिंग का एक भारी हिस्सा टूटकर गिरने से झारखंड के एक 21 वर्षीय मजदूर की मौके पर ही मौत हो गई। जिलाधिकारी ने घटना की जांच के आदेश दिए और यह पता लगाने को कहा कि निर्माण एजेंसी ने तय सुरक्षा मानकों का पालन किया था या नहीं। परियोजना की क्रियान्वयन एजेंसी NHIDCL (नेशनल हाईवे एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) ने भी अलग से जांच के आदेश दिए।
यानी जिस सुरंग में 2023 की भारी घटना के बाद कड़े सुरक्षा उपायों का वादा किया गया था, वहीं ढाई साल बाद फिर एक मजदूर की जान चली गई।
सिक्किम में यह पहली बार नहीं है जब जलविद्युत ढांचा तबाही का शिकार बना हो। 3-4 अक्टूबर 2023 की रात उत्तरी सिक्किम की साउथ ल्होनक ग्लेशियल झील के फटने (GLOF-Glacial Lake Outburst Flood) से आई भीषण बाढ़ ने तीस्ता-III परियोजना के 1,200 मेगावाट क्षमता वाले बांध को बहा दिया था। यह सिक्किम की सबसे बड़ी और सबसे प्रतिष्ठित परियोजनाओं में से एक थी। विशेषज्ञों ने लंबे समय से चेतावनी दी थी कि हिमालय की ऊंची ग्लेशियल झीलों के पास बड़े बांध बनाना जोखिम भरा है, क्योंकि गर्म होते ग्लेशियर इन झीलों को अस्थिर बना रहे हैं। सिक्किम में अकेले 42 ऐसी ग्लेशियल झीलें हैं, जिनमें से 16 को उच्च जोखिम वाला माना गया है।
घटना के बाद पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति ने तबाह हुए बांध की जगह लगभग दोगुनी ऊंचाई 118.64 मीटर का नया कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, जिस पर पर्यावरणविदों ने फिर सवाल उठाए हैं।
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण नागपुर के भू-गर्भ वैज्ञानिक अवनीश कुमार अवस्थी बताते हैं कि सुरंग के भीतर मीथेन गैस का विस्फोट, उसके बाद चट्टानों का धंसना और मजदूरों का मलबे में फंस जाना यह केवल एक हादसा नहीं है। यह हिमालय की एक चेतावनी है।
उनका कहना है कि जब भी ऐसी कोई घटना होती है, सबसे पहले हमारी संवेदनाएं उन श्रमिकों और उनके परिवारों के साथ होती हैं, जो रोजी-रोटी के लिए धरती के भीतर उतरते हैं। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि आखिर हिमालय बार-बार हमें यही संदेश क्यों दे रहा है…।
वह बताते हैं कि, मैं पिछले कई वर्षों से चट्टानों, संरचनाओं और भूगर्भीय प्रक्रियाओं का अध्ययन कर रहा हूं। जितना अधिक मैं हिमालय को समझने की कोशिश करता हूं, उतना ही महसूस होता है कि यह पर्वतमाला आज भी 'बन रही है'। दुनिया की अधिकांश पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं की तुलना में हिमालय भूवैज्ञानिक दृष्टि से बहुत युवा है। भारतीय प्लेट आज भी यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। यही कारण है कि यहां की चट्टानें पूरी तरह स्थिर नहीं हैं। उनमें दरारें हैं, भ्रंश (Faults) हैं, शीयर जोन हैं और लगातार तनाव (Stress) मौजूद है।
सिक्किम की इस घटना में मीथेन गैस की चर्चा हो रही है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह कोई असामान्य बात नहीं है। कुछ प्रकार की अवसादी चट्टानों तथा कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध भूस्तरों में मीथेन जैसी गैसें प्राकृतिक रूप से छोटे-छोटे पॉकेट्स में फंसी रहती हैं। यदि सुरंग निर्माण से पहले इनकी पहचान न हो या खुदाई के दौरान रियल-टाइम गैस मॉनिटरिंग न की जाए, तो एक छोटी-सी चिंगारी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। लेकिन केवल मीथेन ही समस्या नहीं है। हिमालय की सबसे बड़ी चुनौती उसकी भूगर्भीय अनिश्चितता (Geological Uncertainty) है।
कमजोर और तलछटी चट्टानें - जो खुदाई के दौरान आसानी से टूटती और धंसती हैं।
भूमिगत गैस पॉकेट्स - मीथेन जैसी ज्वलनशील गैसें बिना पूर्व चेतावनी के रिसाव कर सकती हैं।
ग्लेशियल झीलों का खतरा (GLOF) - जलवायु परिवर्तन से पिघलते ग्लेशियर ऊंचाई पर बनी झीलों को अस्थिर बना रहे हैं।
भूकंपीय संवेदनशीलता - पूरा हिमालयी बेल्ट भूकंप के हाई-रिस्क ज़ोन में आता है।
भारी और अनिश्चित वर्षा - मानसून के दौरान अचानक भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
भारत में आपदा प्रबंधन की नीति और दिशा-निर्देश बनाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की है, जो 2005 के आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत गठित है। लेकिन सुरंग निर्माण जैसी परियोजनाओं में दिन-प्रतिदिन की सुरक्षा जिम्मेदारी बंटी हुई होती है-
सिल्क्यारा और सिक्किम, दोनों ही मामलों में हादसे के बाद प्रशासन ने जांच के आदेश तो दिए, लेकिन यह पैटर्न बार-बार दोहराया गया है कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने और ठोस जवाबदेही तय होने में लंबा समय लगता है और तब तक अगला प्रोजेक्ट, अगली सुरंग शुरू हो चुकी होती है।
विशेषज्ञ लंबे समय से जिन सुधारों की मांग कर रहे हैं, वे कमोबेश हर हादसे के बाद दोहराए जाते हैं।
Updated on:
24 Jul 2026 01:19 pm
Published on:
24 Jul 2026 01:14 pm
