
केन-बेतवा परियोजना से क्या होगा फायदा और नुकसान? (Photo: AI Generated)
Ken-Betwa River Linking Project : भारत में पानी की उपलब्धता हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। देश के कुछ हिस्से हर साल बाढ़ से जूझते हैं तो कई क्षेत्र भीषण सूखे का सामना करते हैं। इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से दशकों पहले नदी जोड़ो (River Interlinking) की अवधारणा सामने आई थी। इसी दिशा में देश की पहली बड़ी परियोजना केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना है, जिसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना माना जाता है। केंद्र सरकार का दावा है कि इससे बुंदेलखंड जैसे सूखा-प्रभावित क्षेत्र की तस्वीर बदल जाएगी, वहीं पर्यावरणविदों और जल विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इसे प्राकृतिक पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा मानता है।
केन-बेतवा परियोजना (Ken-Betwa Link Project) भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना है, जिसके तहत मध्य प्रदेश की केन नदी का अतिरिक्त पानी उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जाएगा।
यह परियोजना राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम (National River Linking Project) का हिस्सा है और इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों तक पानी पहुंचाना है जहां पानी की कमी रहती है। परियोजना का संचालन राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA) के माध्यम से किया जा रहा है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 8 दिसंबर 2021 को इस परियोजना को ₹44,605 करोड़ की अनुमानित लागत के साथ मंजूरी दी थी। इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है, जिसके तहत केंद्र सरकार लगभग 90% लागत वहन करेगी, जबकि शेष 10% लागत मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश साझा करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसंबर 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर मध्य प्रदेश के छतरपुर (खजुराहो के निकट) में परियोजना की आधारशिला रखी। परियोजना को आठ वर्षों में पूरा किए जाने का लक्ष्य है।
इस परियोजना से मुख्य रूप से दो राज्यों को लाभ मिलने का दावा किया गया है - मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश। सबसे अधिक फायदा बुंदेलखंड क्षेत्र के जिलों को मिलने की बात कही गई है।
केन नदी
बेतवा नदी
भारत में नदियों को जोड़ने का विचार नया नहीं है।
भारत में राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम के तहत कुल 30 से अधिक लिंक परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा गया है, जिनमें हिमालयी और प्रायद्वीपीय दोनों क्षेत्रों की नदियां शामिल हैं।
दुनिया में बड़े पैमाने पर नदियों के जल हस्तांतरण (Inter-Basin Water Transfer) की कई परियोजनाएं लागू की गई हैं। इनसे जल उपलब्धता तो बढ़ी, लेकिन कई स्थानों पर गंभीर पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी सामने आए। सबसे चर्चित उदाहरण चीन की South-to-North Water Transfer Project है। शोधों के अनुसार, इस परियोजना से जल प्राप्त करने वाले क्षेत्रों में पानी की कमी दूर हुई, लेकिन जल देने वाले नदी बेसिनों में नदी प्रवाह घटा, पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ, जल गुणवत्ता और जैव विविधता पर दबाव बढ़ा तथा पर्यावरणीय निगरानी और मुआवजा व्यवस्था की नई चुनौतियां पैदा हुईं।
इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के मरे-डार्लिंग बेसिन में दशकों तक बांधों और बड़े पैमाने पर जल मोड़ (Water Diversion) के कारण कुछ हिस्सों में नदी का प्राकृतिक प्रवाह 50 प्रतिशत से अधिक घट गया। इसके परिणामस्वरूप बाढ़ के मैदानों (Floodplains) तक पानी पहुंचना कम हुआ, आर्द्रभूमियों (Wetlands) का क्षरण हुआ और कई जलपक्षियों व जलीय जीवों के आवास प्रभावित हुए। शोधकर्ताओं ने इसे नदी पारिस्थितिकी पर दीर्घकालिक दबाव का उदाहरण बताया है।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि नदी जोड़ो या जल हस्तांतरण परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल सिंचाई और पेयजल लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक पर्यावरणीय, सामाजिक और पारिस्थितिक प्रभावों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
सरकार इसे विकास की परियोजना मानती है, लेकिन वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ कई गंभीर चिंताएं भी सामने रखते हैं।
पर्यावरणविदों और जल विशेषज्ञों के विचार पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ कुछ साझा चिंताएं व्यक्त करते हैं।
क्या कह रहे हैं आलोचक ?
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना भारत की जल नीति का एक ऐतिहासिक और महत्वाकांक्षी प्रयोग है। यदि यह अपने घोषित उद्देश्यों के अनुरूप सफल होती है, तो बुंदेलखंड जैसे सूखा-प्रभावित क्षेत्र को सिंचाई, पेयजल और आर्थिक विकास के नए अवसर मिल सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, वन्यजीवों के आवास, स्थानीय समुदायों के विस्थापन और नदी पारिस्थितिकी जैसे गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट का समाधान केवल बड़ी इंजीनियरिंग परियोजनाओं में नहीं, बल्कि स्थानीय जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल संचयन और नदी बेसिन आधारित समग्र जल प्रबंधन में भी निहित है। इसलिए केन-बेतवा जैसी परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि पर्यावरणीय, सामाजिक और दीर्घकालिक जल सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। यही संतुलित दृष्टि भविष्य में भारत की जल नीति को अधिक टिकाऊ और प्रभावी बना सकती है।
Updated on:
24 Jul 2026 12:35 pm
Published on:
24 Jul 2026 12:16 pm
