
सांकेतिक फोटो (सोर्स-Chatgpt)
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को 'ग्रीन एनर्जी' से पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हरित ऊर्जा के क्षेत्र में देश के लिए अगला मोर्चा है- इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बैटरियों की रिसाइक्लिंग और सस्टेनेबल एनर्जी टेक्नोलॉजी। जैसे-जैसे देश में EV की बिक्री बढ़ रही है, वैसे ही पुरानी और खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों को दोबारा उपयोग में लाने की जरूरत भी बढ़ रही है। इसी जरूरत से स्टार्टअप्स और निवेशकों के लिए एक नया अवसर उभर रहा है। इसलिए सस्टेनेबल एनर्जी सेक्टर में नए स्टार्टअप्स आ रहे हैं।
लखनऊ की बैटएक्स एनर्जीज (BatX Energies) ने हाल ही में 105 करोड़ रुपये जुटाए हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में स्थित बैटएक्स एनर्जीज के क्रिटिकल मिनरल्स रीसाइक्लिंग प्लांट का उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाना, शोध व विकास में निवेश करना और आत्मनिर्भर सप्लाई चेन तैयार करना है। इसी तरह कानपुर IIT के पूर्व छात्रों द्वारा स्थापित कूलम्ब लिटेक ने फास्ट-चार्जिंग और लंबी उम्र वाली EV बैटरी तकनीक के लिए 20 करोड़ रुपये की सीड फंडिंग हासिल की है।
बैटरी-स्वैपिंग नेटवर्क चलाने वाली कंपनी बैटरी स्मार्ट ने अपने बैटरी-ऐज-ए-सर्विस (BaaS) मॉडल के विस्तार के लिए 13 मिलियन डॉलर से अधिक की डेट फंडिंग जुटाई है। ड्रोन और रोबोटिक्स के लिए कस्टम बैटरी सिस्टम बनाने वाली एडियाबेटिक टेक्नोलॉजीज को भी 8.3 करोड़ रुपये का निवेश मिला है। सरकार भी इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
भारत और यूरोपीय संघ ने EV बैटरी रिसाइक्लिंग और क्रिटिकल मिनरल रिकवरी के लिए 169 करोड़ रुपये का साझा कार्यक्रम शुरू किया है। यह कार्यक्रम यूरोपीय संघ के 'होराइजन यूरोप' और भारत के भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित है। इसके अलावा केंद्र सरकार ने पुरानी लिथियम-आयन बैटरियों की वैज्ञानिक रिसाइक्लिंग बढ़ावा देने के लिए लगभग 1,500 करोड़ रुपये की एक नई योजना भी लॉन्च की है, ताकि बैटरी में मौजूद कीमती खनिजों को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके और आयात पर निर्भरता घटे। वहीं, हिंडाल्को ने मार्च 2025 में देश का पहला EV कॉपर फॉइल प्लांट स्थापित करने के लिए 45,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की थी, क्योंकि भारत बैटरी-ग्रेड कॉपर फॉइल की अपनी जरूरत का 80-85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।
अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) की 'नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2026' रिपोर्ट के अनुसार भारत अब स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। अब ग्रीन एनर्जी के उत्पादन में केवल चीन और अमेरिका ही भारत से आगे हैं। संसद में 22 जुलाई 2026 को दिए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की सौर ऊर्जा क्षमता बढ़कर 162.15 गीगावाट हो गई है, जो पिछले एक दशक में करीब 57 गुना बढ़ोतरी दर्शाती है।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, 31 जुलाई 2026 तक देश की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता 300 गीगावाट के पार पहुंच चुकी है, जो देश की कुल स्थापित ऊर्जा क्षमता का करीब 54 प्रतिशत है। भारत ने जून 2025 में ही 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लिया, जो तय समय-सीमा 2030 से पांच साल पहले है।
तेज रफ्तार तरक्की के बावजूद भारत के सामने गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। बैटरी निर्माण के लिए जरूरी लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए भारत लगभग 100 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। इसका बड़ा हिस्सा चीन से आता है। लिथियम आयात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले चीन से आता है। कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट के प्रसंस्करण में भी चीन का दबदबा है।
नीति आयोग के फरवरी 2026 के आकलन के अनुसार, नेट-जीरो लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत की खनिज जरूरतें आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ने वाली हैं। जिससे यह निर्भरता और गंभीर रूप ले सकती है। इसके अलावा अपतटीय (Offshore) पवन ऊर्जा परियोजनाएं भारत में अब तक जमीन पर नहीं उतर सकी हैं, जिसकी बड़ी वजह परियोजनाओं का रद्द होना और देरी है। यह वैश्विक स्तर पर भी एक समस्या है।
BT इंफ्रा समिट 2026 में केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने स्पष्ट कहा कि क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। भारत को खनन तकनीक से लेकर खोज व उपयोग तक पूरी सप्लाई चेन मजबूत करनी होगी, ताकि दूसरे देशों पर निर्भरता घटाई जा सके। समिट में विशेषज्ञों ने यह भी आगाह किया कि अब चुनौती सिर्फ ज्यादा सोलर और विंड प्रोजेक्ट लगाने की नहीं, बल्कि बिजली को स्टोर करने, आयातित उपकरणों पर निर्भरता घटाने और ग्रीन फ्यूल को बढ़ावा देने की है।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की एक रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि भारत के बिजली ग्रिड जैसे क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर साइबर हमलों का खतरा बढ़ रहा है। विशेषकर चीन की ओर से साइबर हमलों के खतरों की अधिक आशंका है। जिसके चलते चीनी उपकरणों पर निर्भरता घटाना प्राथमिकता बनाई जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत नीति सपोर्ट, बैटरी रिसाइक्लिंग इकोसिस्टम और वित्तीय इनोवेशन के मेल से ही भारत का ग्रीन मोबिलिटी लक्ष्य टिकाऊ और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बन सकता है।
Updated on:
11 Aug 2026 05:18 pm
Published on:
11 Aug 2026 05:14 pm
