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चीनी पर सरकार के दो बड़े फैसले, अब बिस्किट की कीमत पर क्या होगा असर?

क्या आप जानते हैं कि आपके पसंदीदा बिस्किट की कीमतों पर सरकार के नए फैसले का क्या असर पड़ेगा? चीनी की कीमतों में उछाल, निर्यात पर रोक और अब शुल्क-मुक्त आयात के इस खेल में, आपकी जेब की सुरक्षा किस तरह की चुनौतियों का सामना कर सकती है?
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 21, 2026

sugar and biscuits

प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

भारत सरकार ने हाल ही में चीनी के निर्यात पर रोक लगाने और शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने जैसे कदम उठाए हैं ताकि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनी रहे और कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। इस फैसले का असर सीधे तौर पर बिस्किट जैसे रोजमर्रा के पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ सकता है। आइए समझते हैं कि यह फैसला आपके बिस्किट की जेब पर क्या असर डाल सकता है।

चीनी की कीमतों में उछाल

हाल के हफ्तों में चीनी की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी देखी गई है। जुलाई के अंत में जो चीनी थोक बाजार में करीब 44-46 रुपए किलो के आसपास बिक रही थी, वह अगस्त के तीसरे हफ्ते तक खुदरा बाजार में 65 रुपए किलो के स्तर तक पहुंच गई है - यानी यह उछाल करीब तीन हफ्तों में आया, न कि महज 10 दिनों में जैसा अक्सर कहा जाता है।

इस वृद्धि के पीछे कई कारण हैं, जैसे चीनी का घटता स्टॉक, त्योहारों के मौसम में बढ़ती मांग, गन्ने की फसल पर अल नीनो और मानसून का असर, इथेनॉल उत्पादन में गन्ने के बढ़ते इस्तेमाल, और कुछ हद तक जमाखोरी।

सरकार के कदम का असर!

सरकार ने कच्ची, सफेद और रिफाइंड चीनी के निर्यात पर 13 मई 2026 से तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी थी, जो 30 सितंबर 2026 तक या अगले आदेश तक लागू रहेगी। इसका उद्देश्य घरेलू आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों में अचानक उछाल को रोकना है।

इसके अलावा, चीनी की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन (करीब 1 मिलियन टन) कच्ची चीनी के आयात को पूरी तरह शुल्क-मुक्त (ड्यूटी फ्री) कर दिया है - यह महज आयात शुल्क में कटौती नहीं, बल्कि करीब एक दशक में पहली बार पूर्ण शुल्क छूट है। साथ ही जमाखोरी रोकने के लिए बड़े थोक खरीदारों (जो महीने में 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं) के लिए स्टॉक सीमा भी घटाकर अधिकतम 15 दिनों की खपत के बराबर कर दी गई है, जो 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी।

बिस्किट उद्योग पर प्रभाव

बिस्किट उद्योग में चीनी एक अहम कच्चा माल है। हालांकि बिस्किट बनाने में चीनी की हिस्सेदारी गेहूं और तेल की तुलना में कम होती है, फिर भी इसकी कीमतों में बदलाव सीधे तौर पर लागत को प्रभावित कर सकता है। उद्योग जगत के अनुमानों के अनुसार गेहूं, खाने का तेल और कच्चा तेल बिस्किट की लागत का बड़ा हिस्सा (करीब 40-45 प्रतिशत) होते हैं, और चीनी की कीमतें भी इसमें अतिरिक्त दबाव डालती हैं।

सरकार का निर्यात प्रतिबंध और शुल्क-मुक्त आयात दोनों कदम घरेलू आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में हैं, जिससे उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में चीनी की कीमतों में कुछ स्थिरता आए। अगर आयातित चीनी समय पर बाजार में पहुंचती है और स्टॉक सीमा से जमाखोरी पर लगाम लगती है, तो बिस्किट की लागत पर दबाव कुछ कम हो सकता है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, गन्ने की अगली फसल कमजोर रहती है, या इथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ता रहता है, तो लागत बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।

सरकार आगे क्या करेगी?

अब देखना होगा कि 31 अक्टूबर के बाद आयात नीति में सरकार क्या बदलाव करती है, और क्या स्टॉक-सीमा जैसे कदमों से जमाखोरी पर वाकई लगाम लगती है। इसके अलावा, बिस्किट निर्माता अपनी लागत संरचना में बदलाव कर सकते हैं, जैसे कि पैकेजिंग या अन्य इनपुट्स में बचत, ताकि उपभोक्ताओं तक कीमतों का असर सीमित रखा जा सके।

उपभोक्ताओं के लिए संदेश

इस फैसले का असर आपके बिस्किट की थैली पर तुरंत नहीं दिखेगा, लेकिन अगर शुल्क-मुक्त आयात से सप्लाई बढ़ती है और चीनी की कीमतें स्थिर होती हैं, तो आने वाले महीनों में बिस्किट महंगे होने की रफ्तार धीमी हो सकती है। वहीं अगर वैश्विक कीमतें ऊंची रहती हैं या घरेलू उत्पादन में और गिरावट आती है, तो कीमतों में बढ़ोतरी जारी रह सकती है। ऐसे में उपभोक्ताओं, छोटे व्यापारियों और निवेशकों - सभी को यह देखना होगा कि त्योहारी सीजन के दौरान सरकार की नीति और उद्योग की प्रतिक्रिया कैसी रहती है।

यह एक ऐसा मामला है जहां नीति, वैश्विक बाजार और घरेलू मांग का संतुलन तय करेगा कि आपके बिस्किट की थैली पर क्या असर होगा।