नैनोमीटर 0.42 की परमाणु-स्तर की तकनीक से भविष्य की छोटी और तेज चिप्स का रास्ता साफ हुआ। ( विजुअल: AI)
ग्लोबल सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में एक नए युग का आग़ाज़ हो गया है। सिलिकॉन चिप्स की भौतिक सीमाओं से आगे बढ़ते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसी अभूतपूर्व सफलता हासिल की है, जो भविष्य के कंप्यूटरों, स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोसेसर की गति को कई गुना बढ़ा देगी। ताइवान की प्रमुख शोध संस्था नेशनल यांग मिंग चियाओ तुंग यूनिवर्सिटी (NYCU) और दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता कंपनी TSMC (ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी) कॉर्पोरेट रिसर्च के शोधकर्ताओं ने परमाणु स्तर (Atomic Level) पर 0.42 नैनोमीटर का एक ऐसा 'इंजीनियरड बफर इंटरफ़ेस' तैयार किया है, जिसने ट्रांजिस्टर निर्माण की वर्षों पुरानी सबसे बड़ी बाधा को दूर कर दिया है।
प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका 'नेचर इलेक्ट्रॉनिक्स' (Nature Electronics) में प्रकाशित इस ऐतिहासिक अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर वेन-हाओ चांग और प्रोफेसर त्सुंग-एन ली की संयुक्त वैज्ञानिक टीम ने किया है। इस ब्रेक थ्रू से अब सिलिकॉन के बजाय परमाणु स्तर पर पतले 2D (टू-डायमेंशनल) पदार्थों से सुपर-इफिशिएंट ट्रांजिस्टर बनाना संभव हो सकेगा।
पिछले कई दशकों से पूरी दुनिया के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद सिलिकॉन आधारित चिप्स पर निर्भर रहे हैं। हालांकि, जैसे-जैसे उपकरणों को छोटा, तेज और अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने की होड़ बढ़ी है, सिलिकॉन अपनी भौतिक सीमाओं के करीब पहुँच चुका है। इस समस्या से निपटने के लिए पिछले एक दशक से वैज्ञानिक द्वि-आयामी (2D) सेमीकंडक्टर पदार्थों पर प्रयोग कर रहे थे। ये सामग्रियां मात्र एक परमाणु जितनी पतली (Monolayer) होती हैं। सिद्धांत रूप में, इनसे बने ट्रांजिस्टर आज के सिलिकॉन चिप्स की तुलना में कई गुना छोटे, बहुत तेज और न्यूनतम बिजली खपत वाले हो सकते हैं। लेकिन 2D सेमीकंडक्टर के साथ एक जटिल तकनीकी समस्या बनी हुई थी।
एक कार्यशील ट्रांजिस्टर में इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सेमीकंडक्टर के ऊपर 'गेट डाइइलेक्ट्रिक' नामक एक अत्यंत पतली इन्सुलेटिंग (अचालक) परत की आवश्यकता होती है।
ट्रांजिस्टर को छोटा करने के लिए जब इस इन्सुलेटिंग परत को पतला किया जाता था, तो 2D सेमीकंडक्टर और इन्सुलेटर के बीच का नाजुक परमाणु संपर्क (Interface) क्षतिग्रस्त हो जाता था।
इस क्षति के कारण इलेक्ट्रॉन अपनी राह से भटकने (Scattering) लगते थे, जिससे चिप की गति और प्रदर्शन गिर जाते थे।
तब बर्षों से दुनिया भर के इंजीनियरों के सामने यह दुविधा थी कि वे या तो ट्रांजिस्टर के विद्युत नियंत्रण को मजबूत रख सकते थे, या फिर इलेक्ट्रॉनों की गति (Carrier Mobility) को बचा सकते थे। दोनों को एक साथ हासिल करना असंभव माना जा रहा था।
NYCU और TSMC के वैज्ञानिकों ने पूरी तरह से किसी नए पदार्थ की खोज करने के बजाय, उस बारीक सीमा पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जहां दो अलग-अलग तरह की सामग्री आपस में मिलती हैं—यानि 'एटॉमिक इंटरफ़ेस'।
शोधकर्ताओं ने मोनोलेयर मोलिब्डेनम डाइसल्फाइड (MoS 2 ) नामक 2D सेमीकंडक्टर पदार्थ का उपयोग किया। इसके ऊपर सीधे इन्सुलेटर उगाने के बजाय, वैज्ञानिकों ने एक बहुस्तरीय प्रक्रिया अपनाई:
सटीक एल्युमिनियम जमाव: सबसे पहले MoS2 की सतह पर एल्यूमीनियम की एक अति-पतली परत बिछाई गई।
नियंत्रित ऑक्सीकरण (Oxidation): इसके बाद एल्यूमीनियम को सावधानीपूर्वक ऑक्सीडाइज किया गया, जिससे मात्र 0.42 नैनोमीटर मोटी एल्यूमीनियम ऑक्साइड (AlO x ) की एक समान परत बनकर तैयार हुई।
हैफ़नियम ऑक्साइड की कोटिंग: इस बफर के ऊपर उच्च क्षमता वाला हैफ़नियम ऑक्साइड (HfO 2) डाइइलेक्ट्रिक जोड़ा गया।
महज नैनोमीटर के एक अंश जितनी मोटाई वाली यह 0.42nm परत दो क्रांतिकारी काम करती है। पहला, यह एक बहुत चिकनी सतह प्रदान करती है जिससे हैफ़नियम ऑक्साइड समान रूप से जम पाता है। दूसरा, यह एक 'एटॉमिक बफर' के रूप में काम करते हुए इलेक्ट्रॉनों को बिना किसी अवांछित रुकावट के ट्रांजिस्टर चैनल में तेजी से प्रवाहित होने देती है।
"कई वर्षों से 2D ट्रांजिस्टरों को बेहतर बनाने का प्रयास केवल नई सेमीकंडक्टर सामग्री खोजने तक सीमित था। हमारे रिसर्च ने साबित किया है कि दो पदार्थों के बीच का परमाणु इंटरफ़ेस भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उस सीमा को परमाणु सूक्ष्मता के साथ इंजीनियर करके हमने उस मूलभूत तकनीकी कमी को दूर कर दिया है जो वर्षों से इस क्षेत्र को रोके हुए थी।"
-प्रोफेसर वेन-हाओ चांग, अध्ययन के प्रमुख लेखक।
"जब ट्रांजिस्टर के घटक केवल कुछ परमाणु परतों जितने पतले हो जाते हैं, तो इंटरफ़ेस केवल दो सामग्रियों के बीच की सीमा रेखा नहीं रह जाता, बल्कि वह खुद उपकरण का एक सक्रिय और कार्यात्मक हिस्सा बन जाता है। यह तकनीक भविष्य के सेमीकंडक्टर डिजाइन करने के नए रास्ते खोलती है।"
-प्रोफेसर त्सुंग-एन ली,अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता।
नए इंटरफ़ेस डिज़ाइन से बनाए गए शॉर्ट-चैनल ट्रांजिस्टरों ने परीक्षण के दौरान असाधारण प्रदर्शन दिखाया है:
बहुत कम लीकेज करेंट: यह ट्रांजिस्टर बंद स्थिति में बिजली की बर्बादी को लगभग शून्य कर देता है।
असाधारण ट्रांसकंडक्टेंस: इन उपकरणों ने 0.45 mSμm −1 का हाई ट्रांसकंडक्टेंस दर्ज किया, जो इलेक्ट्रॉनों के बेजोड़ प्रवाह दर्शाता है।
समतुल्य ऑक्साइड मोटाई (EOT): लगभग 1 नैनोमीटर की EOT हासिल करके वैज्ञानिकों ने मजबूत इलेक्ट्रोस्टैटिक कंट्रोल और हाई इलेक्ट्रॉन गतिशीलता को एक साथ संभव कर दिखाया।
इस रिसर्च की सबसे खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने इसके लिए किसी दुर्लभ या केवल प्रयोगशाला में बनने वाले एक्सफोलिएटेड फ्लेक्स का उपयोग नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने CVD (कैमिकल वेपर डिपॉजिशन) तकनीक से विकसित मोनोलेयर MoS 2 का इस्तेमाल किया।
गौरतलब है कि CVD वही प्रक्रिया है जिसका उपयोग वर्तमान में सेमीकंडक्टर उद्योग में बड़े पैमाने पर वेफर-लेवल विनिर्माण (Wafer-scale Manufacturing) के लिए किया जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि इस तकनीक को आसानी से व्यावसायिक उत्पादन लाइनों में अपनाया जा सकता है।
बहरहाल,जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सुपरकंप्यूटिंग और 6G नेटवर्क की मांग बढ़ रही है, दुनिया को ऐसे चिप्स की जरूरत है जो कम बिजली खर्च करके भारी डाटा प्रोसेस कर सकें। NYCU और TSMC का यह 0.42 नैनोमीटर इंटरफ़ेस ब्रेकथ्रू सिलिकॉन-उत्तर (Post-Silicon) युग की नींव रख चुका है। आने वाले वर्षों में, जब यह तकनीक व्यावसायिक रूप से बाजार में आएगी, तो स्मार्टफोन की बैटरी लाइफ कई दिनों तक चलेगी और सुपरकंप्यूटर आज के मुकाबले आधे से भी कम आकार में दस गुना अधिक गति प्रदान करने में सक्षम होंगे।
Updated on:
09 Aug 2026 01:17 pm
Published on:
09 Aug 2026 01:17 pm
