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भारत में कितने गांव अब भी पक्की सड़क से नहीं जुड़े? जानिए जमीनी हकीकत

Unconnected Villages in India : जानिए आजादी के 80 साल बाद भी भारत में कितने गांव और बस्तियां पक्की सड़क से वंचित हैं? जानिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के आंकड़े और जमीनी हकीकत।
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अब तक किन गांवों में नहीं पहुंची सड़क, PC- Chatgpt

जब शहरों में एक्सप्रेस-वे, फ्लाईओवर और मेट्रो की चर्चा होती है, तब भारत के कुछ गांव आज भी ऐसी सड़क का इंतजार कर रहे हैं जिस पर हर मौसम में आसानी से चला जा सके। बरसात में कीचड़, गर्मियों में धूल और आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने की परेशानी आज भी लाखों ग्रामीणों की हकीकत है।

सवाल यह है कि आखिर आजादी के करीब 80 साल बाद भी क्या भारत के सभी गांव सड़क से जुड़ पाए हैं? अगर नहीं, तो कितने गांव अब भी पीछे हैं और सरकार की सबसे बड़ी ग्रामीण सड़क योजना इस मोर्चे पर कहां तक पहुंची है?

जब गांव तक सड़क पहुंचाना एक राष्ट्रीय मिशन बना

साल 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) शुरू की। उस समय देश के लाखों गांव ऐसे थे जहां तक हर मौसम में चलने लायक सड़क नहीं पहुंचती थी। सरकार का लक्ष्य साफ था। गांव को सड़क से जोड़ो, ताकि वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार की पहुंच बेहतर हो सके।

पिछले 25 वर्षों में इस योजना ने ग्रामीण भारत की तस्वीर काफी हद तक बदल दी है। दिसंबर 2025 तक PMGSY के तहत 8.25 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों को मंजूरी दी जा चुकी है और इनमें से करीब 7.88 लाख किलोमीटर सड़कें बन भी चुकी हैं। यानी योजना की भौतिक प्रगति लगभग 95 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

क्या अब भी कुछ गांव सड़क से वंचित हैं?

सीधा जवाब है - हां। सरकार का दावा है कि योजना के तहत आने वाली 99 प्रतिशत से अधिक पात्र बस्तियों को सड़क से जोड़ा जा चुका है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि देश का हर गांव या हर बसाहट सड़क से जुड़ गई है। असल में PMGSY के अपने मानदंड हैं। मैदानी क्षेत्रों में 500 या उससे अधिक आबादी वाली बस्तियां और पहाड़ी, आदिवासी तथा पूर्वोत्तर क्षेत्रों में 250 या उससे अधिक आबादी वाली बस्तियां योजना के दायरे में आती हैं। इससे छोटी बसाहटें, टोले, मजरे और ढाणियां अक्सर सरकारी आंकड़ों में शामिल ही नहीं होतीं।

यही वजह है कि कागजों पर कनेक्टिविटी लगभग पूरी दिखती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई छोटी आबादियां अब भी सड़क का इंतजार कर रही हैं।

सरकार अब किस लक्ष्य पर काम कर रही है?

फिलहाल योजना का चौथा चरण PMGSY-IV (2024-29) चल रहा है। इस चरण का लक्ष्य करीब 25 हजार बची हुई संपर्क-विहीन बस्तियों को जोड़ना है। इसके लिए लगभग 62,500 किलोमीटर नई सड़कें बनाई जानी हैं और सरकार ने इसके लिए 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया है। यानी सरकार खुद मानती है कि अभी भी हजारों बस्तियां ऐसी हैं जहां सड़क पहुंचाना बाकी है।

कौन से इलाके सबसे ज्यादा पीछे हैं?

देश के सभी राज्यों में सड़क निर्माण की रफ्तार एक जैसी नहीं रही। कैग (CAG) की रिपोर्टों में सामने आया है कि बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और ओडिशा समेत कई राज्यों में परियोजनाएं तय गति से आगे नहीं बढ़ सकीं। इसके अलावा कुछ विशेष क्षेत्र लगातार चुनौती बने हुए हैं।

वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित इलाके : छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा के कुछ हिस्सों में सुरक्षा कारणों से सड़क निर्माण अक्सर प्रभावित होता है।

पूर्वोत्तर राज्य : असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में घने जंगल, पहाड़ और बिखरी हुई आबादी सड़क निर्माण को मुश्किल बना देती है।

पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्र : उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और आदिवासी बहुल इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियां सड़क निर्माण की लागत और समय दोनों बढ़ा देती हैं।

सड़क न होने से गांव पर क्या असर पड़ता है? : सड़क सिर्फ आने-जाने का साधन नहीं होती, बल्कि विकास की पहली सीढ़ी मानी जाती है।

शिक्षा पर असर : जब गांव से स्कूल तक पहुंचने का रास्ता खराब हो, तो बच्चों की पढ़ाई सबसे पहले प्रभावित होती है। बरसात में कई बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं। इसका असर खासकर लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा पड़ता है।

स्वास्थ्य पर असर : कई ग्रामीण इलाकों में आज भी मरीजों को चारपाई या निजी वाहन से अस्पताल ले जाना पड़ता है। एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती। प्रसव, दुर्घटना या गंभीर बीमारी की स्थिति में यह देरी जानलेवा भी साबित हो सकती है।

रोजगार और आय पर असर : किसानों को अपनी फसल मंडी तक पहुंचाने में अधिक समय और पैसा खर्च करना पड़ता है। खराब सड़कें परिवहन लागत बढ़ाती हैं और किसानों का मुनाफा घटाती हैं। साथ ही निवेश और छोटे उद्योग भी ऐसे इलाकों में कम आते हैं।

पलायन बढ़ता है : जब गांव में सड़क, बाजार और रोजगार की सुविधा नहीं होती, तो लोग बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगते हैं।

क्या 100% सड़क कनेक्टिविटी का लक्ष्य पूरा हो गया?

  • सरकारी आंकड़ों को देखें तो भारत इस लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच चुका है।
  • '100 प्रतिशत कनेक्टिविटी' का दावा करते समय दो बातें याद रखनी चाहिए।
  • पहली, PMGSY-IV अभी भी हजारों बस्तियों को जोड़ने के लिए काम कर रहा है।
  • दूसरी, सरकारी आंकड़े केवल पात्र बस्तियों को गिनते हैं। कई छोटी बसाहटें अब भी इन आंकड़ों से बाहर हैं।

इसलिए तकनीकी रूप से भारत पूर्ण कनेक्टिविटी के करीब जरूर है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कुछ दूरी तय करना बाकी है।

आंकड़ों पर कितना भरोसा किया जा सकता है?

यहीं कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। सरकार के पास PMGSY और OMMAS पोर्टल के जरिए विस्तृत डेटा मौजूद है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं।

  • अधिकांश आंकड़े 2001 और 2011 की जनगणना पर आधारित हैं।
  • कई नई बसाहटें बाद में विकसित हुई हैं, जो पुराने रिकॉर्ड में नहीं हैं।
  • कई जगह सड़क गांव की सीमा तक पहुंची है, लेकिन भीतर के टोले अब भी कच्चे रास्तों पर निर्भर हैं।
  • संसदीय समितियों ने यह भी पाया कि बनी हुई कुछ सड़कों का रखरखाव संतोषजनक नहीं है।
मुद्दास्थिति
योजना की शुरुआत25 दिसंबर 2000 (अटल बिहारी वाजपेयी)
कुल सैंक्शन सड़क (दिसंबर 2025 तक)8,25,114 किमी
कुल निर्मित सड़क7,87,520 किमी (~95% प्रगति)
मौजूदा चरणPMGSY-IV (2024-29), 25,000 बचीं बस्तियों का लक्ष्य
पीछे रहने वाले प्रमुख राज्यबिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, ओडिशा (कुल 9 राज्य, CAG ऑडिट)
सबसे बड़ी चुनौती वाले क्षेत्रLWE-प्रभावित इलाके, पूर्वोत्तर व पहाड़ी राज्य
पात्र बस्तियां जुड़ीं99%+ (सरकारी दावा)
डेटा का आधार2001/2011 जनगणना (पुराना)
रखरखाव की समस्या~21% सड़कों में मेंटेनेंस अधूरा (संसदीय समिति)
प्रामाणिक/अद्यतन डेटाआंशिक रूप से उपलब्ध, कई सीमाओं के साथ