
waste management in india : आखिर डंपिंग ग्राउंड से कूड़ा कहां जाता है, PC- Chatgpt
शहर में सुबह सफाई कर्मचारी घरों और सड़कों से कचरा उठाते हैं। इसके बाद कूड़े से भरी गाड़ियां शहर से बाहर निकल जाती हैं। लेकिन उसके बाद यह कचरा कहां जाता है? क्या वह पूरी तरह खत्म हो जाता है या किसी दूसरी जगह जाकर जमा होता रहता है? यही सवाल भारत के तेजी से बढ़ते शहरों के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक बन चुका है।
शहरों में निकलने वाला हर कचरा एक जैसा नहीं होता। इसमें गीला कचरा, प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच, कपड़े और कई दूसरी चीजें शामिल होती हैं। अगर इसे घर से ही अलग-अलग कर दिया जाए तो काफी हिस्सा खाद, रीसाइक्लिंग या दूसरे उपयोग में जा सकता है। लेकिन जब अलग-अलग तरह का कचरा एक साथ मिला दिया जाता है, तो उसका प्रबंधन मुश्किल हो जाता है और बड़ी मात्रा में कचरा डंपिंग साइट या लैंडफिल तक पहुंचता है।
आम तौर पर शहर से निकलने वाला कचरा कई चरणों से गुजरता है।
घर/दुकान → कलेक्शन → ट्रांसफर स्टेशन → प्रोसेसिंग/रीसाइक्लिंग → लैंडफिल
हर शहर में यह व्यवस्था एक जैसी नहीं है। जहां कचरे का बेहतर प्रबंधन है, वहां गीले कचरे से कंपोस्ट या बायोगैस बनाई जा सकती है, जबकि सूखे कचरे में से कागज, प्लास्टिक, धातु और दूसरी चीजें अलग करके रीसाइक्लिंग के लिए भेजी जाती हैं। जो कचरा उपयोग या प्रोसेसिंग के लायक नहीं बचता, उसे वैज्ञानिक लैंडफिल में भेजा जाना चाहिए। लेकिन कई शहरों में पुराना जमा कचरा अभी भी खुले डंपसाइट के रूप में मौजूद है। यही पुराने कचरे के ढेर समय के साथ 'कचरे के पहाड़' का रूप ले लेते हैं।
दोनों शब्द अक्सर एक ही अर्थ में इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन इनके बीच बड़ा अंतर है। डंपिंग ग्राउंड में कचरा लंबे समय तक खुले में जमा होता रहता है। यहां कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण नहीं होने पर आग, बदबू, धुआं और प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
वहीं सैनिटरी लैंडफिल एक इंजीनियर्ड व्यवस्था होती है, जहां कचरे को निर्धारित तरीके से रखा जाता है और लीचेट यानी कचरे से निकलने वाले प्रदूषित तरल तथा गैसों को नियंत्रित करने की व्यवस्था होती है। CPCB के अनुसार पुराने और अनियंत्रित डंपसाइट भूजल प्रदूषण और वायु प्रदूषण का स्रोत बन सकते हैं।
सबसे बड़ी समस्या Legacy Waste यानी वर्षों से जमा पुराने कचरे की है। किसी डंपसाइट पर रोज नया कचरा आता रहे और पुराने कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण न हो, तो कुछ सालों में उसकी ऊंचाई कई मीटर तक पहुंच सकती है। शहरों के बाहर बने ऐसे कचरे के पहाड़ सिर्फ बदसूरत नहीं दिखते, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों के लिए पर्यावरणीय जोखिम भी पैदा करते हैं।
CPCB के अनुसार लैंडफिल में जैविक कचरे के ऑक्सीजन-रहित अपघटन से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें बनती हैं। यदि इन गैसों का प्रबंधन ठीक से न हो तो पर्यावरणीय खतरा बढ़ सकता है।
समस्या अक्सर कचरा पैदा होने के बाद नहीं, बल्कि घर से निकलते समय शुरू हो जाती है। जब गीला और सूखा कचरा एक ही डिब्बे में डाल दिया जाता है, तो दोनों आपस में मिल जाते हैं। इससे रिसाइकिल होने वाली चीजें भी गंदी हो जाती हैं और गीले कचरे से निकलने वाला तरल बाकी कचरे को भी खराब कर देता है।
गीला कचरा → कंपोस्ट/बायोगैस
कागज और कार्डबोर्ड → रीसाइक्लिंग
धातु और कांच → रीसाइक्लिंग
प्लास्टिक → रीसाइक्लिंग/अन्य उपयोग
बाकी अनुपयोगी कचरा → वैज्ञानिक लैंडफिल
यानी कचरे का सबसे अच्छा समाधान उसे शहर से बाहर फेंकना नहीं, बल्कि शुरुआत में ही अलग-अलग करना है।
अब कई शहरों में पुराने कचरे के ढेर को हटाने के लिए बायो-माइनिंग और बायो-रीमेडिएशन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें पुराने कचरे को खोदकर अलग-अलग सामग्री में बांटा जाता है। मिट्टी जैसे हिस्से को अलग किया जा सकता है, जबकि प्लास्टिक और दूसरी उपयोगी सामग्री को रिकवर किया जाता है। कुछ हिस्सों को RDF यानी Refuse Derived Fuel के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
CPCB की राष्ट्रीय कार्ययोजना में पुराने नगरपालिका डंपसाइट के बायो-माइनिंग और कैपिंग पर जोर दिया गया है।
नहीं। आदर्श व्यवस्था में कचरे का बड़ा हिस्सा पहले ही प्रोसेस, कंपोस्ट या रीसाइकिल किया जाना चाहिए। लैंडफिल में सिर्फ ऐसा कचरा जाना चाहिए जिसे किसी अन्य तरीके से उपयोग या प्रोसेस नहीं किया जा सकता।
लेकिन वास्तविक स्थिति शहर-दर-शहर अलग है। CPCB के पुराने राष्ट्रीय आंकड़ों में भी कचरा संग्रह, उपचार और लैंडफिल के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता रहा है। उदाहरण के लिए 2018-19 के उपलब्ध आंकड़ों में 1.52 लाख टन प्रतिदिन नगरपालिका ठोस कचरा उत्पादन के मुकाबले लगभग 50 हजार टन प्रतिदिन लैंडफिल में जाने की सूचना थी।
इसलिए किसी शहर का सिर्फ यह दावा कि 'कचरा रोज उठ रहा है', यह साबित नहीं करता कि उसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण भी हो रहा है।
खुले में कचरा जलाना समाधान नहीं है। खासकर प्लास्टिक और मिश्रित कचरा जलने पर वायु प्रदूषण और जहरीले उत्सर्जन की समस्या पैदा हो सकती है। इसी तरह लैंडफिल में लगी आग को भी सिर्फ आग बुझाकर खत्म नहीं माना जा सकता, क्योंकि अंदर मौजूद जैविक कचरा और गैसें दोबारा आग पकड़ सकती हैं।
इसलिए वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन का उद्देश्य है 'कचरा कम पैदा हो, स्रोत पर अलग हो, ज्यादा से ज्यादा सामग्री दोबारा उपयोग या रीसाइकिल हो और केवल अंतिम अवशेष ही लैंडफिल पहुंचे।'
शहरों के कचरे की समस्या का समाधान सिर्फ नए डंपिंग ग्राउंड बनाने से नहीं होगा। जैसे-जैसे शहर बढ़ेंगे, वैसे-वैसे कचरा भी बढ़ेगा। इसलिए पूरी व्यवस्था को बदलना जरूरी है।
Updated on:
09 Aug 2026 06:30 pm
Published on:
09 Aug 2026 06:20 pm
