24 जुलाई 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

क्या होती हैं पैलेट गन, देश में कब और कहां हुआ इनका पहली बार प्रयोग, जानें कितनी खतरनाक हैं यह

Pellet gun controversy : जानिए क्या है पैलेट गन, यह कैसे काम करती है और भारत में इसका इस्तेमाल कब शुरू हुआ। जम्मू-कश्मीर से लेकर दिल्ली के हालिया विवादों तक, जानिए भीड़ नियंत्रण के इस 'कम घातक' हथियार पर उठते सवालों के जवाब।
5 min read
Google source verification
Pellet gun controversy

Pellet gun controversy : भारत में पहली बार कब हुआ था पैलेट गन का प्रयोग, PC- Patrika

Pellet Gun Controversy : जब भी कश्मीर हो या हाल की दिल्ली की घटनाएं, एक हथियार बार-बार सुर्खियों में आता है 'पैलेट गन'। सुरक्षा एजेंसियां इसे 'कम घातक' (Less-Lethal) विकल्प मानती हैं, लेकिन इसके इस्तेमाल से हजारों लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं और सैकड़ों ने अपनी आंखों की रोशनी तक खो दी है। आखिर यह हथियार है क्या, यह कैसे काम करता है, और भारत में इसका इस्तेमाल कब और क्यों शुरू हुआ, आइए विस्तार से समझते हैं।

पैलेट गन क्या है?

पैलेट गन मूल रूप से एक 12-बोर पंप-एक्शन शॉटगन है, जिसे अक्सर PAG (Pump Action Gun) भी कहा जाता है। यह किसी एक गोली की जगह एक कारतूस में भरे सैकड़ों छोटे-छोटे धातु के छर्रे (Pellets) दागती है। कश्मीर में मुख्यतः दो तरह के कारतूस इस्तेमाल होते रहे हैं No-6 कारतूस, जिसमें करीब 2.79mm आकार के 300 पैलेट होते हैं, और No-9 कारतूस, जिसमें करीब 2.30mm आकार के 600 पैलेट भरे होते हैं। ट्रिगर दबाते ही ये छर्रे कारतूस से निकलकर तेजी से फैल जाते हैं और एक बड़े दायरे को कवर कर लेते हैं।

यह काम कैसे करती है?

पैलेट गन शॉटगन सिद्धांत पर काम करती है, जो मूल रूप से पक्षी-शिकार की तकनीक से आया है। जहां एक साथ कई छोटे छर्रे दागकर तेज गति से उड़ते लक्ष्य को निशाना बनाया जाता है। भीड़ नियंत्रण में इसका मकसद किसी एक व्यक्ति को सटीक निशाना बनाना नहीं, बल्कि पूरी भीड़ को तितर-बितर करना होता है।

गन से जितनी दूरी बढ़ती है, छर्रों का फैलाव उतना ही ज्यादा और अनियंत्रित होता जाता है। यही वजह है कि तय प्रोटोकॉल के मुताबिक इसे 50 मीटर से ज्यादा दूरी से ही चलाने और कमर के नीचे निशाना लगाने का निर्देश दिया जाता है। लेकिन भीड़ वाली अफरा-तफरी की स्थिति में यह सावधानी अक्सर पालन नहीं हो पाती, जिससे छर्रे शरीर के किसी भी हिस्से — यहां तक कि चेहरे और आंखों तक जा पहुंचते हैं।

इसकी शुरुआत कहां से हुई?

पैलेट गन के इतिहास को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है, क्योंकि 'कम घातक' भीड़-नियंत्रण हथियारों का सफर पैलेट गन से पहले शुरू हो चुका था।

1970 का दशक, उत्तरी आयरलैंड : ब्रिटिश सेना ने वहां चल रही नागरिक अशांति (The Troubles) के दौरान रबर बुलेट और बैटन राउंड जैसे प्रोजेक्टाइल पेश किए थे। इनका मकसद जानलेवा गोलियों का विकल्प देना था। भारतीय चिकित्सा साहित्य में अक्सर इसी दौर को 'कम घातक हथियारों' की शुरुआत के तौर पर याद किया जाता है, जिससे आगे चलकर पैलेट-आधारित तकनीकों को भी प्रेरणा मिली।

1987-1993, इजरायल: फिलिस्तीनी प्रदर्शनों के दौरान इजरायली सुरक्षा बलों ने रबर और प्लास्टिक बुलेट का इस्तेमाल किया।

2010, जम्मू-कश्मीर, भारत: असली शॉटगन-आधारित पैलेट गन का पहला बड़ा इस्तेमाल यहीं हुआ। 2010 में कश्मीर घाटी में हफ्तों तक चले हिंसक प्रदर्शनों में करीब 120 लोगों की पुलिस फायरिंग में मौत हो गई थी। इसी के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने जानलेवा गोलियों के विकल्प के तौर पर पैलेट गन को पेश किया। 2012 में पश्चिम बंगाल के इशापुर स्थित आयुध निर्माणी (Ordnance Factory) ने इसका उत्पादन शुरू किया।

भारत में अब तक कहां-कहां इस्तेमाल हुई?

जम्मू-कश्मीर : 2010 के बाद से पैलेट गन का सबसे ज्यादा और सबसे विवादित इस्तेमाल कश्मीर में ही हुआ है। 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद घाटी में जबरदस्त प्रदर्शन भड़क उठे, और सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया। सिर्फ एक महीने में करीब 13 लाख पैलेट इस्तेमाल किए गए। इस दौरान 200 से ज्यादा लोग घायल हुए, कुछ की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। जुलाई 2016 से फरवरी 2017 के बीच अकेले जम्मू-कश्मीर में 6,221 लोग पैलेट चोटों का शिकार बने, जिनमें 782 आंखों की चोटें शामिल थीं।

वर्ष 2016 में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर बुरहान वानी मारा गया था। इस दौरान व्यापक रूप से पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था। 2023 मणिपुर में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ। 2024 पंजाब के शंभू बॉर्डर पर किसानों पर पैलेट गन चली, लेकिन पुलिस ने इसे भ्रामक बताया।

जंतर-मंतर पर इस्तेमाल होने का दावा!

जुलाई 2026 में दिल्ली में CJP के प्रोटेस्ट के दौरान पैलेट चोट लगने के दावे सामने आए। फिलहाल, दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों से साफ इनकार किया और इन्हें भ्रामक बताया, लेकिन कई अस्पतालों के रिकॉर्ड और डॉक्टरों के बयान पैलेट चोटों की ओर इशारा करते हैं। यह मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिकाओं के जरिए विचाराधीन है।

  • पैलेट गन के इस्तेमाल की क्या वजह बताई जाती है?
  • हिंसक भीड़ या पत्थरबाजी को तुरंत नियंत्रित करना
  • जानलेवा हथियारों के इस्तेमाल से बचना
  • कम दूरी से त्वरित चेतावनी और नियंत्रण देना
  • अन्य विकल्प खत्म हो जाने पर इसे इस्तेमाल किया जाता

सीआरपीएफ इसे अपना 'सबसे कम घातक विकल्प' बताते हुए यह भी कहता है कि अगर यह हथियार हटा दिया गया, तो चरम स्थितियों में सुरक्षाबलों के पास सीधी गोलीबारी के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा।

स्वास्थ्य पर कितना खतरनाक असर?

पैलेट गन का सबसे बड़ा खतरा इसकी अनियंत्रित फैलाव क्षमता है। चिकित्सा अध्ययनों में सामने आया है कि पैलेट पीड़ितों में से केवल एक-तिहाई घाव ही शरीर के निचले हिस्से में थे। बाकी शरीर के अन्य हिस्सों में लगे, जिनमें एक-चौथाई से ज्यादा सिर के क्षेत्र में थे। इसके संभावित नुकसान में शामिल हैं।

  • आंख की रोशनी जाना या आंशिक-पूर्ण अंधापन (सबसे आम और गंभीर खतरा)
  • चेहरे और सिर पर गंभीर चोटें
  • फेफड़ों और आंतरिक अंगों को नुकसान
  • हड्डियों और त्वचा में छर्रों का हमेशा के लिए फंस जाना
  • स्थायी विकलांगता
  • कुछ मामलों में मौत

ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाओं का कहना है कि हिंसक प्रदर्शनकारियों पर भी शॉटगन से भीड़ में फायरिंग करना अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन है, क्योंकि यह स्वाभाविक रूप से अंधाधुंध और अत्यधिक चोट पहुंचाने वाला तरीका है।

विकल्प तलाशने की कोशिशें

2016 की व्यापक आलोचना के बाद केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय के तहत एक सात-सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई, जिसका काम पैलेट गन के विकल्प तलाशना था। इस समिति ने मिर्च-आधारित PAVA शेल्स (Pelargonic Acid Vanillyl Amide) को विकल्प के तौर पर सुझाया, जो लक्ष्य को अस्थायी रूप से असहाय कर देते हैं। सितंबर 2016 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे मंजूरी भी दी। बाद के वर्षों में प्लास्टिक-हेड वाली गोलियां भी विकसित की गईं, जिन्हें मौजूदा राइफलों में इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि पैलेट गन पर निर्भरता घटाई जा सके।

हालांकि, PAVA शेल्स और अन्य विकल्पों के आने के बावजूद पैलेट गन पूरी तरह हथियारखाने से हटाई नहीं गई है। इसे अब भी दुर्लभ परिस्थितियों में इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा गया है।

क्यों है यह हमेशा विवादों में?

पैलेट गन को कम घातक कहा तो जाता है, लेकिन आलोचकों की मुख्य चिंताएं हैं:

  • यह किसी एक व्यक्ति पर सटीक निशाना नहीं लगा सकती, बल्कि बेतरतीब तरीके से फैलती है
  • कम दूरी से चलाए जाने पर यह लगभग हैंडगन बुलेट जितनी घातक हो सकती है
  • आंखों और चेहरे पर गंभीर, स्थायी चोट पहुंचाने की भारी आशंका
  • मैदानी हकीकत में सुरक्षा प्रोटोकॉल (50 मीटर की दूरी, कमर के नीचे निशाना) का पालन अक्सर मुश्किल हो जाता है
  • यह "गैर-घातक" होने का भरोसा देकर इसके इस्तेमाल को ही ज्यादा बढ़ावा दे सकती है, जबकि भीड़ नियंत्रण के अन्य कम-नुकसानदेह तरीके मौजूद हैंएक नजर में
❓ सवाल✅ जवाब
पैलेट गन क्या है?सैकड़ों छोटे छर्रे दागने वाली 12-बोर पंप-एक्शन शॉटगन
किस सिद्धांत पर काम करती है?शॉटगन सिद्धांत – छर्रे फैलकर बड़े क्षेत्र को कवर करते हैं
"कम घातक" हथियारों की शुरुआत कब हुई?1970 के दशक, उत्तरी आयरलैंड (रबर बुलेट के रूप में)
भारत में पहली बार पैलेट गन कब इस्तेमाल हुई?2010, जम्मू-कश्मीर
सबसे बड़ा और चर्चित इस्तेमाल कब हुआ?2016, बुरहान वानी की मौत के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों में
सबसे बड़ा स्वास्थ्य खतरा क्या है?आंखों की रोशनी जाना और गंभीर चोटें
भारत में क्या विकल्प सुझाया गया?PAVA शेल्स (मिर्च आधारित) – 2016
हालिया विवाद किससे जुड़ा है?जुलाई 2026, दिल्ली छात्र मार्च में कथित इस्तेमाल