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भारत के पेड़ कौन गिनता है? सड़क, मेट्रो और हाईवे के लिए कटने वाले पेड़ों का हिसाब कौन रखता है?

Who counts trees in india : सड़क, मेट्रो और हाईवे के लिए काटे जाने वाले पेड़ों का हिसाब कौन रखता है? जानिए भारत में पेड़ों की गिनती की प्रक्रिया, प्रतिपूरक वनीकरण के नियम और लगाए गए नए पौधों के जीवित रहने की कड़वी हकीकत।
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Who counts trees in india

Who counts trees in india : कैसे होती है पेड़ों की गिनती।

देश में जब भी कोई नया हाईवे, एक्सप्रेसवे, रेलवे लाइन, मेट्रो प्रोजेक्ट या औद्योगिक परियोजना बनती है, तो उसके साथ एक सवाल भी उठता है। इसके लिए कितने पेड़ काटे जाएंगे? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या इन पेड़ों का कोई रिकॉर्ड रखा जाता है और बदले में लगाए गए पौधे वास्तव में जीवित रहते हैं या नहीं?

भारत में पेड़ों की गिनती और निगरानी का काम कई स्तरों पर होता है। राष्ट्रीय स्तर पर फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) देश के वन क्षेत्र और वृक्ष आच्छादन का आकलन करता है। हर दो साल में जारी होने वाली इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर बताती है कि देश में वन और वृक्ष क्षेत्र कितना है। हालांकि यह रिपोर्ट किसी एक सड़क या परियोजना के लिए काटे गए पेड़ों की गिनती नहीं करती, बल्कि व्यापक स्तर पर हरित क्षेत्र का आकलन करती है।

जब किसी सड़क, मेट्रो या हाईवे परियोजना के लिए पेड़ काटने की जरूरत होती है, तो संबंधित एजेंसी को पहले वन विभाग या स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है। अनुमति लेने के दौरान यह बताया जाता है कि कितने पेड़ प्रभावित होंगे, कौन-कौन सी प्रजातियां हैं और उनके बदले कितने पौधे लगाए जाएंगे। इसी प्रक्रिया के दौरान पेड़ों की आधिकारिक गिनती की जाती है।

एक नजर में

  • पेड़ों की राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) करता है।
  • सड़क, मेट्रो और हाईवे परियोजनाओं के लिए पेड़ काटने से पहले अनुमति जरूरी होती है।
  • प्रत्येक परियोजना में कटने वाले पेड़ों की संख्या दर्ज की जाती है।
  • बदले में पौधे लगाने को प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) कहा जाता है।
  • पौधे लगाना अनिवार्य है, लेकिन उनका जीवित रहना अलग चुनौती है।

पेड़ों का रिकॉर्ड कैसे रखा जाता है?

किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से पहले पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरियां ली जाती हैं। इस दौरान प्रभावित पेड़ों की सूची तैयार की जाती है। कई राज्यों में अब पेड़ों को जियो-टैग करने और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने की भी शुरुआत हो चुकी है।

रिकॉर्ड में क्या-क्या दर्ज होता है?

  • कुल पेड़ों की संख्या
  • पेड़ों की प्रजातियां
  • स्थान और क्षेत्रफल
  • कटाई की अनुमति की तारीख
  • बदले में लगाए जाने वाले पौधों की संख्या

परियोजना पूरी होने के बाद भी इन रिकॉर्डों को सुरक्षित रखा जाता है और कई मामलों में अदालतें तथा पर्यावरणीय एजेंसियां इनकी समीक्षा करती हैं।

बदले में कितने पेड़ लगाए जाते हैं?

भारत में नियम है कि यदि विकास परियोजना के लिए पेड़ काटे जाते हैं तो उसके बदले नए पौधे लगाए जाएं। इसे प्रतिपूरक वनीकरण कहा जाता है।

आमतौर पर एक पेड़ के बदले कई पौधे लगाने की शर्त रखी जाती है। अलग-अलग राज्यों में यह अनुपात अलग हो सकता है। कई परियोजनाओं में एक पेड़ के बदले 5, 10 या उससे अधिक पौधे लगाने का प्रावधान होता है।

प्रतिपूरक वनीकरण का उद्देश्य

  • हरित क्षेत्र की भरपाई करना
  • जैव विविधता को बचाना
  • कार्बन अवशोषण बनाए रखना
  • पर्यावरणीय नुकसान को कम करना

लेकिन असली सवाल पौधे लगाने से ज्यादा उनके जीवित रहने का है।

क्या लगाए गए पौधे जीवित रहते हैं?

यहीं सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है। अक्सर सरकारी रिपोर्टों में लाखों पौधे लगाए जाने का दावा किया जाता है, लेकिन कुछ वर्षों बाद उनमें से कितने पेड़ बन पाते हैं, यह अलग मुद्दा है।

विशेषज्ञों के अनुसार पौधारोपण और वन तैयार होने में बड़ा अंतर है। पौधे लगाने के बाद कई वर्षों तक उनकी देखभाल, सिंचाई और सुरक्षा जरूरी होती है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो बड़ी संख्या में पौधे सूख जाते हैं।

पौधों के न बचने के प्रमुख कारण

  • पानी और देखभाल की कमी
  • गलत प्रजातियों का चयन
  • पशुओं द्वारा नुकसान
  • शहरी निर्माण का दबाव
  • निगरानी की कमी

कई पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल पौधों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके जीवित रहने की दर पर भी नजर रखनी चाहिए।

तकनीक कैसे बदल रही है तस्वीर?

  • सैटेलाइट मॉनिटरिंग
  • जियो-टैगिंग
  • ड्रोन सर्वे
  • मोबाइल ऐप आधारित निगरानी
  • ऑनलाइन पौधारोपण डैशबोर्ड

इनकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि लगाए गए पौधे वास्तव में मौजूद हैं या नहीं और उनकी स्थिति क्या है।

क्या विकास और पेड़ साथ-साथ चल सकते हैं?

भारत जैसे विकासशील देश में सड़कें, रेलवे, मेट्रो और औद्योगिक परियोजनाएं जरूरी हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना भी उतना ही जरूरी है। अब कई परियोजनाओं में डिजाइन इस तरह तैयार की जा रही है कि पेड़ों की कटाई कम से कम हो और जहां संभव हो वहां पेड़ों को स्थानांतरित (Transplant) भी किया जाए।

भारत में पेड़ों की गिनती और निगरानी के लिए एक औपचारिक व्यवस्था मौजूद है। सड़क, मेट्रो और हाईवे जैसी परियोजनाओं में कटने वाले पेड़ों का रिकॉर्ड रखा जाता है और बदले में पौधे लगाने का नियम भी है। लेकिन असली चुनौती पेड़ काटने की नहीं, बल्कि लगाए गए पौधों को वर्षों तक जीवित रखने की है। आखिरकार पर्यावरण की भरपाई सिर्फ पौधे लगाने से नहीं, बल्कि उन्हें पेड़ बनने तक सुरक्षित रखने से होती है। इसलिए अगली बार जब किसी नई सड़क या मेट्रो परियोजना की चर्चा हो, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कितने पेड़ काटे गए, बल्कि यह भी कि बदले में लगाए गए पौधों में से कितने आज भी जीवित हैं।