
Assam floods : असम में हर साल क्यों आती है बाढ़।
असम एक बार फिर भीषण बाढ़ की मार झेल रहा है। 9 अगस्त 2026 तक राज्य में बाढ़ और उससे जुड़ी घटनाओं में 98 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि यह आंकड़ा लगातार बदल रहा है, क्योंकि कई जिलों में हालात अभी भी सामान्य नहीं हुए हैं। कुछ ही हफ्तों में मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। 25 जुलाई को यह 47 था, 30 जुलाई तक 78 पहुंच गया और 7 अगस्त तक 97 हो गया। यह बताता है कि बाढ़ का संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है।
लेकिन सवाल सिर्फ इस साल की तबाही का नहीं है। असली सवाल यह है कि आखिर असम में लगभग हर साल बाढ़ क्यों आती है और इसके पीछे कौन-कौन सी वजहें जिम्मेदार हैं?
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के अनुसार लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। कई जिलों में गांवों, खेतों और सड़कों पर पानी भर गया। हजारों परिवारों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी।
राज्य की राजधानी गुवाहाटी भी इस संकट से अछूती नहीं रही। कामरूप (मेट्रो) जिले के कई इलाके जलमग्न हो गए, जिससे लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हुआ।
बाढ़ का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ा है। हजारों हेक्टेयर खेत पानी में डूब गए, जिससे धान और अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा।विशेषज्ञों का कहना है कि नुकसान सिर्फ एक सीजन तक सीमित नहीं रहता। बाढ़ के बाद खेतों में गाद जमा हो जाती है, मिट्टी की संरचना बदल जाती है और कई बार अगले सीजन की खेती भी प्रभावित होती है। पशुपालन और मत्स्य पालन पर भी इसका असर पड़ता है।
इस बार बाढ़ के पीछे कई कारण एक साथ काम करते दिखाई दिए।सबसे बड़ा कारण लगातार हुई भारी बारिश रही। भारतीय मौसम विभाग ने पहले ही असम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी। लगातार बारिश के कारण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ गया।
जब नदियों में पानी उनकी क्षमता से ज्यादा हो जाता है तो वह आसपास के इलाकों में फैलने लगता है। यही स्थिति इस बार भी देखने को मिली।
असम की बाढ़ सिर्फ मौसमी समस्या नहीं है, बल्कि यह भौगोलिक और पर्यावरणीय कारणों से जुड़ी एक पुरानी चुनौती है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश होते हुए असम के विशाल मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है। पहाड़ों से उतरते समय नदी अपने साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और गाद लेकर आती है।
जब यह गाद नदी के तल में जमा होती रहती है, तो नदी की गहराई धीरे-धीरे कम होने लगती है। परिणामस्वरूप नदी की पानी संग्रह करने की क्षमता घट जाती है। ऐसे में मानसून के दौरान थोड़ी ज्यादा बारिश भी नदी को उफान पर ला सकती है।
तिब्बत की कैलाश पर्वतमाला से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी 2,900 किलोमीटर लंबी है और भारत में अरुणाचल प्रदेश से होते हुए 916 किलोमीटर तक बहती है। ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे अधिक गाद ढोने वाली नदियों में गिनी जाती है।
यही वजह है कि कई विशेषज्ञ बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ नदी प्रबंधन पर भी जोर देते हैं।
असम और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में जंगलों की कटाई भी बाढ़ की समस्या को बढ़ाने वाली वजह मानी जाती है। सामान्य स्थिति में पेड़ और वनस्पति बारिश के पानी को रोकने और जमीन में समाने में मदद करते हैं। लेकिन जब जंगल कम होते हैं, तो बारिश का पानी सीधे बहकर नदियों में पहुंच जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। पहले जहां बारिश कई दिनों में धीरे-धीरे होती थी, अब कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने लगी है। इससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं, इसलिए बाढ़ प्रबंधन की रणनीति को भी बदलने की जरूरत होगी।
हर साल बाढ़ आने के बाद राहत शिविर, खाद्य सामग्री और बचाव अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल राहत कार्य पर्याप्त नहीं हैं।
Updated on:
10 Aug 2026 10:30 am
Published on:
10 Aug 2026 10:29 am
