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राजस्थान के इस शहर की रक्षक हैं मां चामुंडा, पाकिस्तानी बमों के आगे बना दिया था ऐसा कवच

जोधपुर शहर की शान कहा गया है यहां के मेहरानगढ़ किले को। ये शानदार किला यहां एक 120 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर बना हुआ है।

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जोधपुर शहर की शान कहा गया है यहां के मेहरानगढ़ किले को। ये शानदार किला यहां एक 120 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर बना हुआ है।

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यह किला दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई 73 मीटर से भी ऊंचा है। किले के परिसर में चामुंडा देवी का मंदिर भी है, माना जाता है कि ये माता यहां से अपने शहर और यहां के वाशिंदों की निगरानी रखती हैं।

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मेहरानगढ़ दुर्ग स्थित मंदिर में चामुंडा की प्रतिमा 558 साल पहले विक्रम संवत 1517 में जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने मंडोर से लाकर स्थापित किया था। परिहारों की कुलदेवी चामुंडा को राव जोधा ने भी अपनी इष्टदेवी स्वीकार किया था।

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जोधपुरवासी मां चामुंडा को जोधपुर की रक्षक मानते हैं। मां चामुंडा माता के प्रति अटूट आस्था का कारण यह भी है कि वर्ष 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान जोधपुर पर गिरे बम को मां चामुंडा ने अपने आंचल का कवच पहना दिया था। किले में 9 अगस्त 1857 को गोपाल पोल के पास बारूद के ढेर पर बिजली गिरने के कारण चामुंडा मंदिर कण-कण होकर उड़ गया, लेकिन मूर्ति अडिग रही।

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आद्यशक्ति मां चामुंडा की स्तुति में कहा गया है कि जोधपुर के किले पर पंख फैलाने वाली माता तू ही हमारी रक्षक हैं। रियासतों के भारत गणराज्य में विलय से पहले मंदिर में नवरात्रा की प्रतिपदा को महिषासुर के प्रतीक भैंसे की बलि देने की परम्परा थी जो बंद की जा चुकी है।

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मां चामुंडा के मुख्य मंदिर का विधिवत निर्माण महाराजा अजीतसिंह ने करवाया था। मारवाड़ के राठौड़ वंशज श्येन (चील) पक्षी को मां दुर्गा का स्वरूप मानते हैं। राव जोधा को माता ने आशीर्वाद में कहा था कि जब तक मेहरानगढ़ दुर्ग पर चीलें मंडराती रहेंगी तब तक दुर्ग पर कोई विपत्ति नहीं आएगी।