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दक्षिण गुजरात में भी पिछड़ी कांग्रेस, आदिवासी वोटर्स पर नहीं चल पाया जादू

गुजरात मे सत्ता तक पहुंचने के लिए कांग्रेस को दक्षिण गुजरात से खास उम्मीद थी जो फिलहाल पूरी होती नहीं दिख रही।

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नई दिल्ली। गुजरात मे सत्ता तक पहुंचने के लिए कांग्रेस को दक्षिण गुजरात से खास उम्मीद थी जो फिलहाल पूरी होती नहीं दिख रही। पाटीदार आंदोलन का सूरत में फायदा होता नहीं दिख रहा है। आदिवासी मतदाताओं को अपने पीला में जुटने के लिए कांग्रेस ने महुआ से तुषार को उतारा था। पिछले लंबे समय से इस सीट पर विधायक रिपीट नही हुआ है। आदिवासी बहुल दूसरी सीटों पर भी कांग्रेस को विशेष फायदा होता नहीं दिख रहा। डेडियापड कांग्रेस ने छोड़ दी थी वसावा के लिए जहां बीजेपी आगे है। वलसाड सीट के बारे में कहा जाता है कि जो यहां से विधायक होता है सरकार उसकी बनती है। यहां से भी बीजेपी आगे है। शुरुआती बढ़त के बाद लिम्बायत से भी कांग्रेस फिलहाल पिछड़ती दिख रही है। कुल मिलकर कांग्रेस को दक्षिण गुजरात ने निराश किया है। न पाटीदारों का साथ मिला और न आदिवासियों का। आदिवासिओ क्षेत्रों में भाजपा ने बीते 6 माह से आक्रामक अभियान चलाया था, जिसका फायदा उसे मिलता दिख रहा है।

दिलचस्प है मुकाबला

पिछले चुनाव में दक्षिण गुजरात में खाता खोलने को तरस गई कांग्रेस को इस बार यहां उम्मीद की किरण देख रही थी। भरुच जिले की भरुच, अंकलेश्वर, जंबूसर और वागरा सीट जीतने वाली भाजपा के सामने जंबूसर में जहां उसके बागी जीत की राह में रोड़ा बने हुए थे, वहीं वागरा पर कांग्रेस प्रत्याशी मुस्लिम होने से कांटे की टक्कर बनी हुई थी। भरुच में भाजपा बढ़त पर है तो अंकलेश्वर में मामला कांग्रेस के साथ सीधी और रोचक लड़ाई में तब्दील हो चुका है। झगडिय़ा सीट कांग्रेस ने जद (यू) नेता छोटू भाई वसावा के लिए छोड़ी थी। दिलचस्प बात यह है कि यहां छोटू भाई की जीत- हार कांग्रेस के परंपरागत मतों पर निर्भर रहेगी जो अब तक छोटू भाई को हराने के लिए एक जुट हुआ करते थे।

आदिवासी मतदाता पालों में बंटे हुए

नर्मदा जिले की दोनों सीटों पर काबिज भाजपा को जीत के लिए इस बार दूसरों पर निर्भर रहना है। आदिवासी बाहुल्य दोनों सीटों पर हार - जीत का कारण सेंधमारी पर निर्भर रहेगा। देडियापाडा की सीट कांग्रेस ने यहां भी छोटू भाई वसावा की भारतीय ट्राइबल पार्टी के लिए छोड़ी। इस फैसले से नाराज तीन बार के विधायक रहे अमर सिंह वसावा कांग्रेस के बागी के रूप में ताल ठोंक रहे हैं। वसावा को मिलने वाले मतों से भाजपा- कांग्रेस की जीत की राह प्रशस्त होगी। नांदोद सीट पर राज्य के मंत्री शब्द शरण तडवी एक बार फिर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पिछले चुनाव में कम मतों से जीते तड़वी को पी.डी.वसावा दमदार चुनौती दे रहे हैं। शेष गुजरात की तरह यहां पाटीदार मतदाताओं का प्रभाव नहीं है। आदिवासी मतदाता पालों में बंटे हुए हैं। बेरोजगारी, जीएसटी और पानी की समस्या यहां रोजमर्रा की हकीकत है, लेकिन चुनावी शोर में गूंज सिर्फ जीएसटी की ही सुनाई देती है। दोनों दल वर्षा की फुहारों के बावजूद कार्यकर्ताओं में जोश भरने में जुटे हैं। भाजपा जहां अपनी पुरानी पकड़ कायम रखना चाहती है वहीं कांग्रेस यहां अपना खाता खोलकर गांधीनगर में सरकार बनाने की अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती है।

चर्चा में अहमद भाई

भरुच जिले की राजनीति में कांग्रेस के कद्दावर नेता अहमद पटेल की तूती सालों से बोलती आ रही है। लेकिन इस बार पटेल पहले जैसे सक्रिय नहीं हैं। भरुच पटेल की राजनीतिक कर्मभूमि रही है। यहां पीएम नरेन्द्र मोदी , अमित शाह की सभाएं हो चुकी है वहीं कांग्रेस का एक भी बड़ा नेता यहां नही आ सका है।

छोटू भाई बनाम छोटू भाई

भरुच जिले की झगडिया सीट से पांच बार चुनाव जीत चुके छोटू भाई इस बार जद (यू) की बजाए भारतीय ट्राईबल पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने यहां जद (यू) के टिकट पर छोटू भाई वसावा नाम के ही प्रत्याशी को उतारा है। सालों से तीर के चुनाव चिन्ह पर लडऩे वाले छोटू भाई को इस बार टैक्सी चुनाव निशान मिला है तो उनके सामने मौजूद दूसरे छोटू भाई के पास तीर का चुनाव चिन्ह है। इससे असमंजस बना हुआ है।

दोनों प्रमुख दलों में से एक मात्र मुस्लिम प्रत्याशी

भरुच में अल्पसंख्यक मतदाताओं की तादात बड़ी संख्या में है। यहां सुलेमान पटेल को भाजपा के अरुण सिंह राना टक्कर दे रहे हैं। जिले की पांच सीटों पर सवा ग्यारह लाख मतदाताओं में से सवा दो लाख मतदाता अल्पसंख्यक हैं। बावजूद इसके सिर्फ एक उम्मीदवार ही सामने है।