बीजेपी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने वाले लालकृष्ण आडवाणी राजनीति की अंतिम जंग भी जीते

 

  • दशकों के सियासी सफर में आडवाणी पर लगा एक दाग भी आज धुल गया।
  • लालकृष्ण आडवाणी यह साबित करने में सफल हुए कि उन्होंने जो किया उसमें उनका हित नहीं था।
  • अटल जी के साथ बीजेपी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का देखा था सपना।

By: Dhirendra

Updated: 30 Sep 2020, 03:34 PM IST

नई दिल्ली। बाबरी मस्जिद विध्वंश मामले में 28 साल बाद सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा सभी 32 आरोपियों को बेदाग घोषित करने के बाद सबसे ज्यादा सुर्खियों में बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी हैं। ऐसा होना स्वभाविक है। लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के उन शख्सियतों में शुमार हैं जिन्होंने सत्ता की दशा और दिशा तय की। राम मंदिर निर्माण को लेकर जिस रथ यात्रा पर सवार होकर उन्होंने हिंदुत्व के एजेंडे को धार दिया उसके बाद बीजेपी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

अटल जी के साथ मिलकर आडवाणी ने बीजेपी के लिए वो सियासी जमीन तैयार की, उसी पर आगे चलकर पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी अपने दम पर प्रचंड बहुमत से देश की बागडोर संभाले हुए हैं।

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पार्टी को लोगों की भावनाओं से जोड़ने वाला सियासी दूरद्रष्टा

दरअसल, आडवाणी भारतीय राजनीति के उन किरदारों में से एक हैं जो एक नेता ही नहीं बल्कि कुशल संगठनकर्ता, स्पष्टवादी, सियासी दूदद्रष्टा, और भारतीय राजनीति के लौह पुरुष हैं। एक ऐसे नेता जिसने अछूत कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी को न सिर्फ देश की सत्ता तक पहुंचाने का काम किया बल्कि अपनी मुहिम को लोगों की भावनाओं से भी जोड़ा। राम मंदिर को लेकर रथ यात्रा से लेकर बाबरी विध्वंश और देश के उप प्रधानमंत्री पद तक की जिम्मेदारी संभालने के दौरान उन्होंने किया वही किया जो पार्टी के हित में रहा।

1980 में देखा था सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने का संपना

6 अप्रैल, 1980 को अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे नेताओं ने मिलकर संघ के संरक्षण में बीजेपी का गठन किया था। 1984 में बीजेपी को केवल 2 लोकसभा सीटों पर जीत नसीब हुई। तब बीजेपी की कमान अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी गई थी और पार्टी ने उनके नेतृत्व में सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना देखा था।

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इस वजह से बीजेपी हुई रास्ता बदलने को मजबूर

1984 की हार ने बीजेपी को रास्ता बदलने पर मजबूर किया। इस हार का सीधा नतीजा यह निकला कि पार्टी की कमान कट्टर छवि के माने जाने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी को सौंपी गई। आडवाणी हिंदुत्व व राममंदिर मुद्दे को लेकर आगे बढ़े और इसके बाद ये रास्ता बनता हुआ सत्ता से शीर्ष तक चलता चला गया।

आडवाणी ने बीजेपी को दी सियासी संजीवनी

1989 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 85 सीटों के साथ सियासी संजीवनी मिली। बीजेपी दो सीटों से सीधे देश में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। इसका श्रेय हिमाचल के पालमपुर में बीजेपी के राष्ट्रीय अधिवेशन में 1988 में अयोध्या मुद्दे को पार्टी के एजेंडे में शामिल करने और आडवाणी के नेतृत्व में सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा को गया। इस रथयात्रा से आडवाणी जी की लोकप्रियता बढ़ी और वह संघ से लेकर पार्टी की नजर में भी बुलंदी पर पहुंच गए।

बाबरी विध्वंश और शिखर का सफर

इस बीच 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने का मामला हुआ और आडवाणी का नाम जैन हवाला डायरी में भी आ गया। इस बात को ध्यान में रखते हुए बीजेपी और संघ परिवार ने आडवाणी के बजाय अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। 1991 चुनाव में बीजेपी को 120 लोकसभा सीटों पर जीत मिली। 1995 में मुंबई अधिवेशन में वाजपेयी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। 1996 के चुनाव में बीजेपी को अकेले दम पर 161 संसदीय सीटों पर जीत मिली। यानि अटल-आडवाणी की जोड़ी ने बीजेपी को शून्य से शिखर तक पहुंचाने का काम किया।

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बेदाग आडवाणी

बीजेपी ने 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में पहली बार 13 दिन की सरकार बनाई। 1998 में पार्टी को 182 सीटों पर जीत मिली और बीजेपी की सरकार 13 महीने तक चली। 1999 में हुए चुनाव में बीजेपी फिर सत्ता में लौटी और इस बार गठबंधन सरकार पूरे पांच साल चली। लेकिन बाबरी विध्वंश में लालकृष्ण आडवाणी सहित 49 लोगों पर केस चला।

आज उस मामले में भी फैसला आया है। सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने बीजेपी के लौह पुरुष को बेदाग घोषित कर दिया। विशेष अदालत के इस फैसले से विपक्षी पार्टियों के नेताओं द्वारा अंगुली उठाने और उन्हें कोसने के दरवाजे बंद हो गए। ऐसा इसलिए कि करीब तीन दशक बाद ही सही आडवाणी ने साबित कर दिखाया कि उन्होंने जो कुछ भी किया, उसमें उनका खुद का हित तनिक भी नहीं था। उन्होंने जो किया पार्टी और राष्ट्रहित से जुड़ा मसला था।

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