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लोकसभा चुनाव 2019: यहां रिश्तेदार ही एक-दूसरे के खिलाफ ठोक रहे ताल

एक दूसरे के खिलाफ कर रहे चुनाव प्रचार और कर रहे सियासी हमले कहीं, चाचा-भतीजा तो कहीं, ससुर-दामाद एक दूसरे के खिलाफ संभाल रहे मोर्चा घर में पारीवारिक रिश्ता बरकरार रहता है, लेकिन राजनीतिक सोच अलग-अलग हो जाती है।

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नई दिल्ली। दुनिया में भारत का सबसे बड़ा लोकतंत्र देश है। लोकतंत्र की अपनी एक अलग मर्यादा और खूबसूरती होती है। यहां न केवल विचारधाराएं आपस में टकराती हैं, बल्कि विचारधाराओं की लड़ाई दलगत राजनीति से निकलकर परिवारों तक पहुंच जाती है। तभी तो कई बार देखने में आता हैं कि एक ही परिवार के लोग चुनावी रण में आमने-सामने हो जाते हैं। हालांकि घर में पारिवारिक रिश्ता बरकरार रहता है, लेकिन राजनीतिक सोच अलग—अलग हो जाती है। देश में इस बार लोकतंत्र का एक ऐसा ही खूबसूरत चेहरा उस समय देखने को मिला, जब कुछ नेता परिवारों को पीछे छोड़ चुनावी मैदान में आमने-सामने आ डटे—

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उत्तर प्रदेश की फिरोजाबाद लोकसभा सीट

कुछ ऐसा ही नजारा उत्तर प्रदेश की फिरोजाबाद लोकसभा सीट का है। यहां सैफई परिवार के बीच वर्चस्व की लड़ाई जारी है। यहां वर्तमान सांसद अक्षय यादव के सामने उनके चाचा शिवपाल यादव ही आ डटे हैं। चाचा-भतीजे की इस चुनावी जंग में रिश्तेदार भी बंट गईं हैं। सपा कुनबे में हुई यह सियासी फाड़ जगजाहिर है। अक्षय यादव जहां अखिलेश के चचरे भाई होने के साथ ही उनके करीबी रामगोपाल यादव के बेटे हैं तो वहीं छोटे भाई शिवपाल यादव को भी सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद प्राप्त है।

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झारखंड में गिरिडीह लोकसभा सीट

झारखंड में भी उत्तर प्रदेश की फिरोजाबाद सीट जैसा ही हाल है। यहां चुनाव में ऐसे ही कुछ परिवार सामने आए हैं। यहां गिरिडीह लोकसभा से झारखंड मुक्ति मुक्ति मोर्चा के दिग्गज नेता स्व. टेकलाल महतो के बेटे और मांडू से वर्तमान विधायक जेपी पटेल का नाम दौड़ में आगे चल रहा था। लेकिन टिकट जगरनाथ महतो के हाथ आया। परिणाम यह हुआ कि जेपी ने नाराज होकर पार्टी से बगावत कर दी। अब वो आजसू प्रमुख सुदेश महतो के साथ संपर्क में हैं। पार्टी की खिलाफत करने और एनडीए के साथ नजदीकी बढ़ाने के लिए जेपी पटेल पर उनके ससुर और पूर्व मंत्री मथुरा महतो ने निशाना साधा है। मथुरा ने इसे अपने दामाद का आत्मघाती फैसला बताया है। ऐसे में गिरिडीह लोकसभा सीट पर ससुर और दामाद के बीच जीत हार की जंग जारी है।

पश्चिम बंगाल में मालदा जिले की संसदीय सीट

पश्चिम बंगाल में मालदा जिले की संसदीय सीट का भी अपना अगल इतिहास रहा है। दो लोकसभा सीटों में बंटा यह संसदीय क्षेत्र वरिष्ठ कांग्रेस नेता अब्दुल गनी खान चौधरी का गढ़ माना जाता है। गनी खान के कारण मालदा की ये दोनों सीटें कांग्रेस की पक्की सीट मानी जाती थीं। लेकिन सियासी हालात उस समय बदल गए जब दो बार से मालदा उत्तर सीट से सासंद बनीं मौसम नूर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं। वहीं, कांग्रेस ने यहां सांसद अबु हाशेम खान के बेटे और ईशा खान चौधरी को टिकट दिया है। अब गनी खान की गढ़ में ममेरे भाई-बहन आमने सामने आ गए हैं।

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