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संविधान बचाओ अभियान: राहुल गांधी को है कांग्रेस से दूर हो गए दलितों की चिंता

लोकसभा चुनाव तक के लिए कांग्रेस ने एक सोची समझी रणनीति के तहत संविधान बचाओ अभियान की शुरुआत की है।

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Dhirendra Kumar Mishra

Apr 23, 2018

rahul gandhi

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी के संविधान बचाओ अभियान को अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके पीछे अहमियत यह है कि देश में दलित और आदिवासी सामाजिक-आर्थिक रूप से भले ही कमजोर माने जाते हों, लेकिन उनकी सियासी हैसियत बहुत बड़ी है। देश का कोई भी राजनीतिक दल उनको नजरअंदाज नहीं कर सकता। दलितों के वोट बैंक की राजनीतिक ताकत का अंदाजा आप इसी से लगा सकते है कि लोकसभा की 545 सीटों में से 131 सीटें एससी और एसटी के आरक्षित हैं। यही वजह है कि कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के एससी/एसटी को लेकर आए निर्णय को पीएम मोदी के खिलाफ प्रयोग कर उसका लाभ उठाने की कोशिश में है। इसके साथ ही कांग्रेस को इस बात का डर है कि 2014 के बाद से कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में भाजपा सेंध लगा चुकी है, जिनकी घर वापसी नहीं हुई तो लोकसभा चुनाव में सत्‍ता हासिल करना पार्टी के लिए मुश्किल भरा हो सकता है।

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लोकसभा की 131 सीटें आरक्षित
आपको बता दें कि लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं। इनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। देश की कुल मतदाताओं में से इन वर्गों की भागीदारी 20 फीसद से अधिक है। इसमें भी दलित मतदाता करीब 17 फीसद हैं। इसलिए कांग्रेस साल 2018-19 के लोकसभा एवं उससे पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के साथ खड़ा दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। कांग्रेस चाहेगी कि दलित हितों को लेकर भारत बंद का लाभ उसे आगामी सभी चुनावों में मिले। यही राहुल गांधी की भी चिंता है। यही वजह है कि संविधान बचाओ अभियान को 14 अप्रैल, 2019 तक चलाने का पार्टी ने रणनीतिक चाल चली है। ताकि इस मुद्दे को 2019 तक जिंदा रखना संभव हो सके।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भुनाने में जुटी कांग्रेस
कांग्रेस इस बात को लेकर पहले से ही चिंतित थी कि दलितों का एक तबका उससे कटता जा रहा है। उसकी इस चिंता को दूर करने में एससी/एसटी एक्‍ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलने ने अहम भूमिका निभाई है। हालांकि शीर्ष कोर्ट के फैसले में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है जिससे दलितों के हितों पर कुठाराघात हो, लेकिन कांग्रेस ने दुष्‍प्रचार के जरिए इस बात को हवा देकर माहौल अपने पक्ष में कर लिया है। दलितों को भाजपा व उसके सहयोगी दलों से काटने के लिए राहुल गांधी ने फैसला आने के तत्‍काल बाद भाजपा और आरएसएस पर हमला बोल दिया था। उन्‍होंने यह भी आरोप लगाया कि दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना आरएसएस और भाजपा के डीएनए में है।

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दलितों पर पकड़ मजबूत करने में जुटी है भाजपा
दूसरी तरफ भाजपा दलितों के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है। इस बात का पता केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के उन बयानों से भी चलता है जिसमें उन्‍होंने कहा था कि अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की मोदी सरकार की अडिग प्रतिबद्धताएं हैं और उसके सारे प्रयासों का उद्देश्य दलितों के जीवन में बदलाव लाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में दो बार अंबेडकर को हरवाया और इसके पीछे हल्के बहाने पेश किए। संसद के केंद्रीय कक्ष में 70 सालों तक उनका चित्र तक संसदीय कक्ष में नहीं लगाया। कांग्रेस ने अंबेडकर को भारत रत्न नहीं मिलने दिया। उनका दावा है कि पीएम मोदी की सरकार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2015 पहले से ज्‍यादा मजबूत बनाया है।