
नई दिल्ली। राजनीतिक भूतल पर आज जो कांग्रेस सिमटी हुई है, जिसकी लहर एक दम से शांत हो गई है। वही कांग्रेस 1984के आम चुनावों में सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड दर्ज की थी। कांग्रेस ने उस समय 523 लोकसभा सीटों में से 415 पर अकेले जीत दर्ज की थी। ये चुनाव प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के 2 महीने बाद हुई थी। उस दौरान लोगों में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर थी। 1984 के चुनाव में हैरान करने वाली बात ये भी थी कि उस समय कांग्रेस आरएसएस के साथ थी। कहा जाता है कि कांग्रेस को जो इतनी बड़ी जीत मिली थी। वो सिर्फ आरएसएस की वजह से मिली थी।
इस बात की पुष्टि एक किताब में की गई है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राशिद किदवई ने अपनी किताब ’24 अकबर रोड: ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ दि पीपुल बिहाइंड द फॉल एंड द राइज ऑफ द कॉंग्रेस’ में दावा किया है कि तत्कालीन राजनीतिक जटिलताओं का विवरण अन्य कहीं नहीं किया गया है, जैसा उन्होंने अपने किताब में किया है।
कैबिनेट के लोग राजीव गांधी को बनाना चाहते थे पीएम
किदवई ने अपने किताब के तीसरे चैप्टर में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या होने के बाद राजीव गांधी आनन-फानन में दिल्ली लौटे थे। तब एम्स में उनके साथ इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पीसी अलेक्जेंडर और गांधी परिवार के अन्य विश्वस्त लोग वहां मौजूद थे। वहां राजीव गांधी को बताया गया कि कैबिनेट और पार्टी के लोग उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर बिठाना चाहते हैं।
अलेक्जेंडर ने राजीव गांधी को सोनिया से दूर करते हुए कैबिनेट के फैसले से उन्हें अवगत कराया। इसके बाद सोनिया गांधी ने राजीव को ऐसा करने से मना कर दिया था, बावजूद राजीव गांधी ने यह कहते हुए पार्टी के फैसले को मान लिया कि यह उनकी जिम्मेदारी है। किताब में किदवई ने दावा किया कि इस घटना के बाद से राजीव गांधी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ गई थी। इसके कुछ दिनों बाद ही आम चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया गया। 24 से 27 दिसंबर, 1984 के बीच देशभर में आम चुनाव तय हो गए।
कांग्रेस ने खालिस्तान मांग को चुनाव में मुद्दा बनाया
किताब में दावा किया गया है कि राजीव गांधी का चुनाव प्रचार बहुत ही आक्रामक अंदाज में था। सिखों द्वारा अलग खालिस्तान की मांग को कांग्रेस ने बड़ा मुद्दा बनाया। इसके पीछे हिन्दुओं में छिपे असुरक्षा की भावना बड़े स्तर पर उजागर करना था। राजीव गांधी इस चुनाव से लोगों को संदेश देना चाहते थे कि वो हिन्दुओं को पूर्ण सुरक्षा दे सकते हैं। राशिद किदवई के मुताबिक, राजीव गांधी ने 25 दिनों के धुआंधार चुनाव प्रचार में कुल 50 हजार किलोमीटर की यात्रा कार और हेलीकॉप्टर से की थी। उन्होंने दावा किया है कि चुनाव प्रचार के दौरान देश में इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के खिलाफ एक सहानुभूति की लहर चल पड़ी थी। बावजूद इसके राजीव ने हिन्दुत्व कार्ड खेलने के लिए तत्कालीन आरएसएस प्रमुख बाला साहेब देवराज से हाथ मिलाने की सोच ली थी।
आरएसएस और राजीव गांधी के बीच गुप्त बैठक हुई थी
किताब के अनुसार, राजीव गांधी और बाला साहेब के बीच गुप्त बैठक हुई थी। बैठक में परिणाम यह निकला कि आरएसएस बीजेपी के बजाय कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेगी। आरएसएस का बीजेपी को साथ न देने का कारण यह भी था कि उस समय बीजेपी शुरूआती दौर में थी। आरएसएस प्रमुख की राजीव गांधी से मुलाकात कराने में नागपुर के तत्कालीन सांसद बनवारी लाल पुरोहित ने बड़ी भूमिका निभाई थी। पुरोहित ने 2007 में इसका खुलासा किया था और कहा था कि आरएसएस ने समर्थन के लिए शर्त रखी थी कि कांग्रेस को अयोध्या में राम जन्मभूमि का शिलान्यास करने की इजाजत देनी होगी।
Published on:
09 Apr 2018 04:31 pm
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