
नई दिल्ली। 1978 में कांग्रेस के युवातुर्क नेता शरद पवार ने कांग्रेस आई और कांग्रेस एस में फूट का लाभ उठाकर जनता पार्टी और पीजेंट्स वर्कर्स पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। इस घटना ने उन्हें बड़ा नेता बना दिया। अब चर्चा इस बात की है कि क्या 41 साल बाद मराठा क्षत्रप शरद पवार एक बार फिर अपने ही इतिहास को दोहरा पाएंगे? ताज्जुब की बात ये है कि इस बार उनका प्रतिद्वंद्वी और कोई नहीं अपना भतीजा अजित पवार ही है। इसलिए कहा जा रहा है कि इस बार पवार की हार में भी जीत है।
दरअसल, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 का परिणाम त्रिशंकु विधानसभा के रूप में आने से सरकार गठन का मामला पेचीदा हो गया है। ऐसा इसलिए कि किसी भी पार्टी को इस बार पूर्ण बहुमत नही मिला। बीजेपी 105, शिवसेना 56, एनसीपी 54, कांग्रेस 44 व अन्य शामिल हैं। यानि कोई भी पार्टी इस बार बिना किसी के सहयोग के बगैर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।
इसका लाभ शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और एनसीपी प्रमुख शरद पवार दोनों उठाना चाहते हैं। ऐसा कर जहां उद्धव ठाकरे बाला साहेब ठाकरे को एक शिव सैनिक को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाने का वचन पूरा करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ कई मामलों में कानूनी पेचीदगियों में घिर चुके शरद पवार 41 साल पुराना इतिहास दोहराकर सभी को इस बात का अहसास कराना चाहते हैं कि वो 79 के उम्र में सियासी वार करना चूके नहीं हैं। इसके पीछे उनका मकसद भतीजा अजित पवार को सियासी पाठ पढ़ाना है।
एनसीपी नेता अजित पवार का रातोंरात बगावत कर भाजपा से हाथ मिलाने का निर्णय उनके चाचा शरद पवार की 41 वर्ष पहले की कहानी को याद दिलाता है। जब वे कांग्रेस के 2 धड़ों द्वारा बनाई गई सरकार गिराकर राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे।
शरद पवार ने 1978 में जनता पार्टी और पीजेन्ट्स वर्कर्स पार्टी की गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था जो 2 वर्ष से भी कम समय तक चली थी। इसके बावजूद 1978 में अपनी पार्टी बनाकर उसे एक दशक तक चलाने के निर्णय के कारण पवार को राजनीतिक हलकों में प्रभावशाली नेता कहा जाने लगा।
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव बाद एक बार फिर वे राज्य में कांग्रेस और शिवसेना से हाथ मिलाकर वैसा ही गठबंधन तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं। अजित पवार ने शनिवार सुबह उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली जिस पर पवार ने कहा कि भाजपा को समर्थन देने के निर्णय का उन्होंने समर्थन नहीं किया है। यह उनके भतीजे का व्यक्तिगत फैसला है।
पवार ने अपनी किताब 'ऑन माई टर्म्स' में लिखा है कि 1977 में आपातकाल के बाद के चुनावों में राज्य और देश में इंदिरा विरोधी लहर से कई लोग आश्चर्यचकित थे। पवार के गृह क्षेत्र बारामती से वीएन गाडगिल कांग्रेस के टिकट से हार गए थे। इंदिरा गांधी ने जनवरी 1978 में कांग्रेस का विघटन कर दिया। कांग्रेस (एस- सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता वाली) से अलग होकर कांग्रेस (इंदिरा) का गठन किया।
इनमें से शरद पवार कांग्रेस (एस) के साथ बने रहे और उनके राजनीतिक मार्गदर्शक यशवंतराव चव्हाण भी इसी पार्टी में थे। एक महीने बाद राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस (एस) ने 69 सीट, कांग्रेस (आई) ने 65 सीट पर जीत दर्ज की। जनता पार्टी ने 99 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
यानि किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ। कांग्रेस के दोनों धड़ों ने मिलकर कांग्रेस (एस) के वसंतदादा पाटिल के नेतृत्व में सरकार का गठन किया, जिसमें कांग्रेस (आई) के नासिकराव तिरपुदे उपमुख्यमंत्री बने।
इस बीच कांग्रेस के दोनों धड़ों के बीच टकराव जारी रहा, जिससे सरकार चलाना कठिन हो गया था। पवार ने सरकार छोड़ने का निर्णय किया। उस समय जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर के साथ उनके संबंधों के कारण उन्हें काफी सहयोग मिला। चंद्रशेखर ने पवार से कहा था आपको अब महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। इसके मुताबिक पवार ने विधायकों का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया। बाद में सुशील कुमार शिंदे, दत्ता मेघे और सुंदरराव सोलंकी ने मुख्यमंत्री को अपना इस्तीफा भेज दिया।
वही सुशील शिंदे आगे चलकर राज्य के मुख्यमंत्री और फिर केंद्रीय गृहमंत्री बने। पवार ने कांग्रेस के 38 विधायकों के साथ मिलकर नई सरकार बनाई, जिसे समानांतर सरकार कहा जाता है। पवार तब 38 वर्ष की उम्र में राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे। नई सरकार जनता पार्टी, पीजेंट वर्कर्स पार्टी और अन्य छोटे दलों की गठबंधन सरकार थी।
अपनी पुस्तक में पवार लिखते हैं सदन में जब पूरक मांगों पर चर्चा चल रही थी, सरकार अल्पमत में आ गई थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। बहरहाल, 1980 में इंदिरा गांधी के सत्ता में लौटते ही (पवार नीत) सरकार को बर्खास्त कर दिया गया।
इसके बावजूद पवार ने एक दशक से अधिक समय तक पार्टी का नेतृत्व किया और राजीव गांधी के नेतृत्व के तहत अपनी मूल पार्टी में लौट आए। पालसीकर ने लिखा चूंकि उन्होंने अपनी पार्टी गठित करने का निर्णय किया और इसे एक दशक तक चलाया, जिससे उन्हें प्रभावशाली नेता की छवि हासिल करने में मदद मिली। जिसका लाभ उन्हें कांग्रेस में शामिल होने के बाद मिला भी।
Updated on:
26 Nov 2019 10:43 am
Published on:
26 Nov 2019 07:48 am

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