
Allahabad Highcourt
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक रिश्तों और कानूनी जिम्मेदारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट के अनुसार एक विधवा बहू अपने सास-ससुर को गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भले ही यह एक नैतिक जिम्मेदारी हो सकती है लेकिन कानून में सास-ससुर को बहू से खर्चा दिलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
मामला उत्तर प्रदेश के आगरा जिले का है। यहां के रहने वाले बुजुर्ग राकेश कुमार और उनकी पत्नी का इकलौता बेटा प्रवेश कुमार यूपी पुलिस में कांस्टेबल था। 2016 में प्रवेश की शादी हुई थी, जिसके बाद साल 2021 में प्रवेश की मृत्यु हो गई। प्रवेश की पत्नी भी पुलिस विभाग में कार्यरत है। बेटे की मौत के बाद बुजुर्ग माता-पिता ने अपनी बहू से गुजारा भत्ते की मांग की थी। उनका तर्क था कि वे अनपढ़ और गरीब हैं और बेटे की मौत के बाद उनके पास आय का कोई साधन नहीं है।
बुजुर्ग दंपती ने पहले फैमिली कोर्ट में याचिका लगाई थी जिसे अगस्त 2025 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी दलील थी कि बहू को उनके बेटे की जगह सहानुभूति के आधार पर नौकरी मिली है और उसे बेटे के रिटायरमेंट के लाभ भी मिले हैं इसलिए उसे सास-ससुर का ख्याल रखना चाहिए। हालांकि कोर्ट ने पाया कि बहू अपनी योग्यता से नौकरी पर थी और सहानुभूति का कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 125 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार, कोई भी व्यक्ति केवल अपनी पत्नी, बच्चों और अपने माता-पिता के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार है। भरण पोषण की सूची में सास-ससुर का जिक्र कहीं भी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति पर सिर्फ नैतिक आधार पर कानूनी बोझ नहीं डाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा 'नैतिक दायित्व चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो उसे कानूनी जिम्मेदारी में नहीं बदला जा सकता।' अदालत ने कहा कि मेंटेनेंस का अधिकार केवल उन्हीं लोगों को मिल सकता है जिनका नाम कानून में विशेष रूप से दर्ज है। क्योंकि बहू द्वारा सास-ससुर को भत्ता देने का कोई कानून भारत में नहीं है इसलिए बुजुर्ग दंपती की अर्जी खारिज कर दी गई।
Updated on:
30 Mar 2026 03:18 pm
Published on:
30 Mar 2026 03:18 pm
