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आखिर ऐसी क्या है वजह कि जिले में अब तक गठित नहीं हो सकी बेटियों की फुटबॉल टीम

- फुटबॉल को लेकर यह कहा जा रहा है कि बेटियों को इसमें रुचि नहीं है।

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आखिर ऐसी क्या है वजह कि जिले में अब तक गठित नहीं हो सकी बेटियों की फुटबॉल टीम

आखिर ऐसी क्या है वजह कि जिले में अब तक गठित नहीं हो सकी बेटियों की फुटबॉल टीम

रायगढ़. जिले में बेटियों की फुटबॉल टीम अब तक नहीं बन सकी है, ये कोई साल दो साल की बात नहीं है, कहा जा रहा है कि जब से यहां फुटबॉल खेला जा रहा है तब से गल्र्स इस खेल से दूर रहीं या फिर इन्हें दूर ही रखा गया है। आलम यह है कि इसी जिले में ताईक्वांडो, क्रिकेट, बास्केटबॉल सहित अन्य खेलों में बेटियों की जबरदस्त रुचि देखी जाती है पर फुटबॉल को लेकर यह कहा जा रहा है कि बेटियों को इसमें रुचि नहीं है।

इस मामले में जब डीएफए यानि डिस्ट्रिक फुटबॉल एसोसिएशन के पदाधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने कहा कि कई बार प्रयास किया गया, क्लबों को लिखा गया पर किसी ने कोई रुचि नहीं दिखाई है। दूसरी ओर जब क्लबों से इस विषय में बात की गई तो उनकी ओर से एसोसिएशन पर आरोप लगाया गया, कहा गया कि इनकी ओर से न तो बेहतर माहौल बनाया जा रहा है और न ही कोई प्रयास किया जा रहा है। बहरहाल ये दलील क्लब और एसोसिएशन की हो सकती है पर इसमें जिले की बेटियां कहीं न कहीं पीछे छूट रही हैं। अब यदि प्रदेश के अन्य जिलों की स्थिति को देखें तो वहां बकायदा डिस्ट्रिक लेवल की गल्र्स फुटबॉल की टीम है। बस्तर काफी बढिय़ा कर रहा है, रायपुर सहित अन्य जिले में टीम गठित है, टूर्नामेंट खेल रही है पर रायगढ़ में आज तक इस टीम का गठन नहीं हो सका है।

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ये बात सही है कि न माहौल है न संसाधन
इस खेल से लड़कियों के दूर रहने या दूर रखने के पीछे की प्रमुख वजह माहौल का नहीं होना है। दूसरा संसाधन का आभाव है। शहर के कुछ फुटबॉल क्लबों से बात की गई तो कहा गया कि उनके पास लड़कियां आती हैं पर उनके पास पर्याप्त संसाधन खासकर सुरक्षा का आभाव होता है इसलिए वो फिलहाल दूरी बनाए रखते हैं। क्लबों का कहना है कि यदि गल्र्स खेल में रुचि नहीं ले रही है तो इसके लिए माहौल बनाने की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक फुटबॉल एसोसिएशन की है, उसका काम ही तो यही है कि जिले में फुटबॉल का विकास हो।

कहते हैं रुचि नहीं है
इस मामले में जब एसोसिएशन के पदाधिकारियों से बात की गई तो यह कहा गया कि गल्र्स इस खेल में रुचि ही नहीं लेती हैं, कई बार प्रयास किया गया, कैंप लगाए गए पर बालिकाओं ने इसमें रुचि नहीं दिखाई।

यहां तो हालात उलटे हैं
हाल में ही स्टेडियम में फुटबॉल कैंप का आयोजन किया गया था, इसमें कम ही सही पर गल्र्स आईं थी, पर कैंप खत्म, बात खत्म की तर्ज पर वो वापस चली गईं। अब हम साल २०१७ की बात करें तो फुटबॉल का ही इंटर स्कूल द किक प्रोग्राम हुआ था। आप तस्वीर को देख सकते हैं इस प्रोग्राम में शहर के आधे दर्जन से ज्यादा स्कूलों की छात्राओं ने न सिर्फ हिस्सा लिया बल्कि पूरे उत्साह के साथ मैच भी खेला था। फिर यह कहना बेमानी है या फिर निराधार है कि लड़कियों में फुटबॉल को लेकर रुचि नहीं है। सच यह है कि कभी प्रयास ही नहीं किया गया है।

-ये कहना गलत है कि जिले में लड़कियों को फुटबॉल के प्रति रुचि नहीं है। क्योंकि जब हमने २०१७ में द किक लांच किया था तो बड़ी संख्या में लड़कियां शामिल हुई थी और पूरे उत्साह के साथ फुटबॉल मैच खेली थीं- दीपक गहलोत, मैनेजर, दा फुटबॉल एकेडमी

-जिले में लड़कियों की फुटबॉल टीम नहीं है। कई बार प्रयास किया गया पर इस मामले में न तो क्लब रुचि लेते हैं और न ही लड़कियों की कोई रुचि इसमें दिखी है, फिर भी प्रयास किया जा रहा है- मुकेश चटर्जी, अध्यक्ष, डीएफए