
छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल में मरीज ( Photo - Patrika )
Chhattisgarh Health News: पीलूराम साहू. प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर 'सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की एक हालिया राष्ट्रीय रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में होने वाली कुल मौतों में से 60.4% के पीछे एक मुख्य कारण अस्पतालों और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित मेडिकल कर्मियों का अभाव है। इस मामले में छत्तीसगढ़ देश में तीसरे स्थान पर है, जबकि बिहार (67%) और झारखंड (61.8%) क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं।
प्रदेश में स्थिति इतनी चिंताजनक है कि 100 में से 60 मरीजों की जान केवल इसलिए जोखिम में पड़ रही है क्योंकि उन्हें समय पर प्रशिक्षित नर्स या पैरामेडिकल स्टाफ की सेवा नहीं मिल पाती। गांवों और कस्बों से लेकर शहरी इलाकों तक झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला है। बिना विधिवत चिकित्सा शिक्षा के ये लोग स्वयं को सुपर-स्पेशलिस्ट बताने में संकोच नहीं करते।
कई बार इन झोलाछाप डॉक्टरों के गलत इलाज के कारण मरीज इतनी मरणासन्न स्थिति में अस्पताल पहुंचते हैं कि डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाना असंभव हो जाता है। मध्य प्रदेश की तर्ज पर स्वायत्त निकायों के माध्यम से नियमितीकरण न होने के कारण भी बड़ी संख्या में डॉक्टर सरकारी सेवा छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। यह रिपोर्ट सरकार के लिए एक चेतावनी है कि बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे में सुधार, प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति और डॉक्टरों के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियों के बिना इस संकट से उबरना कठिन होगा।
इन झोलाछाप डॉक्टरों का नेटवर्क अत्यंत सुदृढ़ है। (Chhattisgarh News) ये न केवल प्राथमिक उपचार के नाम पर मरीजों का जीवन खतरे में डालते हैं, बल्कि कुछ निजी अस्पतालों के साथ मिलकर एजेंट के रूप में भी काम करते हैं। स्थिति बिगड़ने पर ये मरीजों को बड़े अस्पतालों में रेफर करते हैं, जिसके बदले उन्हें मोटा कमीशन मिलता है। दुखद यह है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से इन पर कार्रवाई न के बराबर है, जिससे इनका हौसला बढ़ता जा रहा है। इनमें से कई कथित डॉक्टर मिडिल या हाई स्कूल पास हैं, जिनका जीव विज्ञान से भी कभी कोई नाता नहीं रहा।
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी स्वास्थ्य सेवाओं की कमर तोड़ रही है। प्रदेश के 10 मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों के 2660 स्वीकृत पदों में से 1290 पद खाली पड़े हैं। आगामी समय में 5 नए मेडिकल कॉलेज शुरू करने की योजना है, लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि वहां नियुक्तियों के लिए डॉक्टर कहां से आएंगे? जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) तक स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी किल्लत बनी हुई है।
वेतन का अंतर: निजी अस्पतालों की तुलना में सरकारी डॉक्टरों का वेतन काफी कम है।
प्रशासनिक उदासीनता: पदोन्नति (प्रमोशन) में देरी और स्थानांतरण (ट्रांसफर) का निरंतर भय।
सुविधाओं का अभाव: सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के लिए अलग कैडर का न होना और नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस का विवाद।
संविदा और अस्थिरता: संविदा डॉक्टरों की तुलना में कम वेतन और समय पर वेतन वृद्धि का अभाव डॉक्टरों के मनोबल को गिरा रहा है।
बिहार - 67.0
झारखंड - 61.8
छत्तीसगढ़ - 60.4
राजस्थान - 54.2
तेलंगाना - 52.6
ओडिशा - 52.0
हिमाचल - 49.2
उत्तरप्रदेश - 49.1
उत्तराखंड - 46.5
तमिलनाडु - 46.0
रिटायर्ड डीएमई डॉ. विष्णु दत्त ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर की रिपोर्ट आंख खोलने वाली है। ( Chhattisgarh News )अगर प्रदेश में प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ के अभाव में 60 फीसदी से ज्यादा मौतें हो रही हैं तो ये आंख खोलनी वाली है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रदेश में डॉक्टर समेत नर्सिंग व पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। यही नहीं गांवों में झोलाछाप का राज है, जो कई केस बिगाड़ने के बाद मरीजों को अस्पताल भेजते हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भर्ती के लिए जरूरी पॉलिसी बनानी चाहिए, जिससे डॉक्टर ज्वाइन करने के लिए आकर्षित हो।
Updated on:
09 Jun 2026 04:13 pm
Published on:
09 Jun 2026 03:15 pm
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