
कोयला सत्याग्रह
प्रदेशभर के 51 गांवों के सैकड़ों लोगों ने रायगढ़ जिले के गारे गांव में कोयला कानून तोड़कर एक बार फिर गांधीजी के ऐतिहासिक 'नमक सत्याग्रहÓ की याद दिला दी। सत्याग्रह भी ऐसा कि महिलाओं, ग्रामीणों, बुजुर्गों और बच्चों ने हाथों में गैंती-रापा लेकर अपने हक के लिए सरकार के खिलाफ जोरदार आवाज बुलंद की। 'देश हमारा-गांव हमारा, हवा हमारी-पानी हमारा, जमीन हमारी-कोयला हमाराÓ का नारा लगाते हुए संविधान प्रदत्त अधिकारों के लिए कोयला खोदकर देशभर के लोगों को 'जमीन के नीचे का खनिज गांव व समाज की संपत्ति हैÓ का संदेश दिया। लगातार सातवीं बार ग्रामीणों ने कोयला सत्याग्रह किया। लेकिन सवाल है, क्या सरकार की आंखें खुली? क्या वनांचल के ग्रामीणों की जायज मांगें मानी जाएंगी? या फिर प्रदेश को 'औद्योगिक हबÓ बनाने के नाम पर सरकार लोगों को जल, जंगल, जमीन से बेदखल करती रहेगी? खदानों व संयंत्रों से प्रभावित लोगों के धैर्य की परीक्षा लेती रहेगी? पिछले सात साल से 'कोयला सत्याग्रहÓ कर रहे ग्रामीणों की मांग आज देशभर के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार न तो ग्रामीणों की सुन रही है और न ही सुध ले रही है। यह भी सच है कि प्रदेश के विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उद्योग जरूरी हैं। लेकिन आदिवासियों, किसानों, ग्रामीणों को बिना परेशानी में डाले, सरकार चाहे तो कंपनियों से कोयला खनन करवा सकती है।
कहते हैं कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त सम्पदाओं पर सबका अधिकार है। लेकिन इस अधिकार को देने के लिए सरकार ने कितनी पाबंदियां लगा रखीं हैं, कितने नियम-कानून बना रखे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। बहरहाल, सरकार को कोयला खनन की मांग करने वाले ग्रामीणों के साथ खड़े दिखना चाहिए। उनकी समस्याओं का त्वरित समाधान करना चाहिए। ग्रामीणों की आजीविका, रोजगार व समृद्धि के लिए मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।
Published on:
05 Oct 2018 10:23 pm
