
बाड़ी से तेल निकालने की योजना ठप (Photo AI)
Chhattisgarh Biofuel Scheme: एक समय था जब प्रदेश में डीजल नहीं अब खाड़ी से, डीजल मिलेगा बाड़ी से का नारा ऊर्जा आत्मनिर्भरता की एक बड़ी और क्रांतिकारी उम्मीद बनकर उभरा था। दावा किया गया था कि सूबे की बंजर जमीनों पर उगने वाला रतनजोत (जेट्रोफा) देश को खाड़ी देशों के आयातित तेल से मुक्ति दिलाएगा। इसी महत्वाकांक्षी विजन के तहत अगस्त 2018 में इतिहास रचा गया, जब देश की पहली बॉयोफ्यूल मिश्रित ईंधन वाली स्पाइसजेट फ्लाइट ने देहरादून से दिल्ली तक 900 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरी, लेकिन इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद विभाग और सरकारें इस योजना को आगे नहीं बढ़ा सकीं। अरबों रुपए फूंकने के बाद आज रतनजोत योजना का नामोनिशान मिट चुका है।
अब बढ़ते वैश्विक ईंधन संकट के बीच छत्तीसगढ़ बॉयोफ्यूल विकास प्राधिकरण (सीबीडीए) ने अपनी रणनीति बदल ली है। प्राधिकरण अब रतनजोत को छोड़कर कम्प्रेस्ड बॉयोगैस (सीबीजी), ग्रीन हाइड्रोजन, वेस्ट-टू-फ्यूल और यूस्ड कुकिंग ऑयल से बॉयोफ्यूल बनाने की नई नीति पर काम कर रहा है। प्रदेश में रतनजोत आधारित परियोजनाओं पर करीब 2000 करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए गए। इसके बावजूद न तो बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू हो पाया और न ही कोई स्थायी आपूर्ति श्रृंखला बन सकी। जमीनी हकीकत यह रही कि पौधरोपण तो हुआ, लेकिन प्रोसेसिंग, मार्केटिंग, तकनीकी रखरखाव और किसानों की भागीदारी जैसे मोर्चों पर समन्वय की कमी के कारण पूरी योजना धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चली गई। इसी विफलता के कारण अब प्राधिकरण का ध्यान कृषि वेस्ट मटेरियल, गोबर, जैविक कचरे और इस्तेमाल किए जा चुके कुकिंग ऑयल पर केंद्रित हो गया है।
इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वर्ष 2005 में की थी। वर्ष 2008 में इंडियन ऑयल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी बड़ी कंपनियों के साथ एग्रीमेंट साइन हुआ। बॉयोडीजल से सरकारी कार से अंतिम बार सफर वर्ष 2010 में किया गया। 24 अगस्त 2016 को विधानसभा की लोकलेखा समिति ने योजना को पूरी तरह असफल करार दिया। एग्रीमेंट के बाद तेल कंपनियां पीछे हट गईं। विमानन क्षेत्र में इतिहास रचने से पहले रतनजोत बॉयोडीजल से दो बार भारतीय सेना के विमान भी उड़ान भर चुके थे। प्रदेशभर में 1.65 लाख हेक्टेयर (लगभग 4 लाख 7 हजार एकड़) में पौधे रोपे गए थे। अकेले पेड्रो में 3000 हेक्टेयर में पौधरोपण हुआ, लेकिन समय पर बीज ही नहीं आ पाया। देखरेख के अभाव में अब सिर्फ ठूंठ बचे हैं।
रतनजोत से बने बॉयोफ्यूल का सबसे बड़ा और सफल परीक्षण अगस्त 2018 में हुआ था। तत्कालीन परियोजना अधिकारी सुमीत सरकार ने देहरादून एयरपोर्ट पर स्पाइसजेट के टर्बो क्यू-400 विमान में खुद ईंधन इंजेक्ट किया था। विमान में 25 फीसदी जैव ईंधन और 75 फीसदी सामान्य एविएशन टरबाइन फ्यूल का मिश्रण था। जब उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा हरी झंडी दिखाए जाने के बाद विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा, तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सहित आला अधिकारी हैरान रह गए थे। इस फ्लाइट में सीबीडीए के अधिकारियों के अलावा भारत सरकार के चार वैज्ञानिक, डीजीसीए के अधिकारी और स्पाइसजेट का क्रू मिलाकर कुल 24 लोग सवार थे। दिल्ली में तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी राज्य की इस तकनीकी क्षमता की जमकर सराहना की थी।
रतनजोत योजना अब पूरी तरह बंद हो चुकी है, इसके पीछे क्या तकनीकी या प्रशासनिक कारण रहे, इस पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकता। हालांकि, हमने कई सफल रिसर्च किए थे और फ्लाइट ने भी उड़ान भरी थी। अब बदले समय और नए इनोवेशन के साथ हमारा फोकस कम्प्रेस्ड बॉयोगैस (सीबीजी), ग्रीन हाइड्रोजन और वेस्ट-टू-फ्यूल मॉडल पर है, जिन्हें भविष्य की वास्तविक ऊर्जा के रूप में देखा जा रहा है।
सुजीत सरकार, सीईओ, छत्तीसगढ़ बॉयोफ्यूल विकास प्राधिकरण
Published on:
27 May 2026 08:46 am
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