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एक तरफ पिता के जाने की खबर, दूसरी तरफ कैमरे पर कॉमेडी सीन, ‘भाभी जी घर पर हैं’ के एक्टर रोहिताश्व ने बयां किया दर्द

Bhabhi Ji Ghar Par Hain Actor Manmohan Tiwari: ‘भाभी जी घर पर हैं’ के मनमोहन तिवारी यानी अभिनेता रोहिताश्व गौड़ ने पत्रिका के साथ अपनी जर्नी शेयर की। कहा कि कैमरे के सामने एक्टिंग नहीं जिंदगी जीनी पड़ती है..
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Bhabhi Ji Ghar Par Hain Actor Manmohan Tiwari

‘भाभी जी घर पर हैं’ के मनमोहन तिवारी रायपुर में ( Photo - Patrika )

Bhabhi Ji Ghar Par Hain in Raipur: ताबीर हुसैन. ‘भाभी जी घर पर हैं’ के चर्चित किरदार मनमोहन तिवारी यानी अभिनेता रोहिताश्व गौड़ पत्नी रेखा के साथ रायपुर में आयोजित निर्मल पांडे स्मृति फिल्म महोत्सव में शामिल होने पहुंचे। रोहिताश्व गौड़ ने बताया कि वे अभिनेता निर्मल पांडे के एनएसडी में क्लासमेट रहे हैं। रायपुर प्रवास के दौरान उन्होंने ‘पत्रिका’ से खास बातचीत में अपने अभिनय सफर, रंगमंच और कैमरा एक्टिंग के फर्क के साथ एक ऐसा संस्मरण भी साझा किया, जो आज भी उन्हें भीतर तक छूता है।

Bhabhi Ji Ghar Par Hain Actor Manmohan Tiwari: पत्रिका को बयां कि दर्द

सुबह सेट पर पहुंचे थे। कॉमेडी सीन था। स्क्रिप्ट पढ़ी गई, रिहर्सल हुई और कैमरे तैयार थे। तभी उन्हें खबर मिली कि उनके पिता नहीं रहे। एक तरफ जिंदगी का सबसे बड़ा निजी सदमा था, दूसरी तरफ कैमरे के सामने कॉमेडी सीन। उन्होंने सीन पूरा किया। रोहिताश्व गौड़ के लिए यह घटना अभिनय की उस जिम्मेदारी को परिभाषित करती है, जिसे वे ‘एक्टर की कमिटमेंट’ कहते हैं।

एक्सप्रेशन देने के बजाय सहज रहना जरूरी है।

रोहिताश्व गौड़ के मुताबिक रंगमंच और कैमरा एक्टिंग में यही सबसे बड़ा फर्क है। रंगमंच पर दर्शकों तक भाव पहुंचाने के लिए आवाज और एक्सप्रेशन अपेक्षाकृत बड़े रखने पड़ते हैं, जबकि कैमरा आंखों की छोटी-सी हरकत तक पकड़ लेता है। इसलिए कैमरे के सामने ज्यादा एक्सप्रेशन देने के बजाय सहज रहना जरूरी है। उनका कहना है कि अभिनेता की निजी जिंदगी में चाहे कितना भी बड़ा भावनात्मक उतार-चढ़ाव चल रहा हो, कैमरे के सामने आते ही उसे किरदार के प्रति ईमानदार रहना पड़ता है। अभिनय का मतलब केवल संवाद बोलना या भाव चेहरे पर लाना नहीं, बल्कि उस क्षण की परिस्थिति को जीना है।

ऑब्जर्वेशन, इमेजिनेशन और कंसंट्रेशन

वे इरफान खान का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उनकी खासियत थी कि हर फिल्म में वे अलग इंसान नजर आते थे। यह सहजता लगातार अभ्यास और अनुभव से आती है। उनके मुताबिक अभिनय की ट्रेनिंग में ऑब्जर्वेशन, इमेजिनेशन और कंसंट्रेशन सबसे महत्वपूर्ण हैं। किरदार को समझने के लिए वे एक अभ्यास बताते हैं। खाली कमरे में किसी काल्पनिक परिस्थिति के साथ प्रवेश करना और बिना संवाद बोले केवल आंखों व बॉडी लैंग्वेज से उस परिस्थिति को व्यक्त करना।

इससे अभिनेता ओवरएक्टिंग से बचता है और किरदार को भीतर से महसूस करना सीखता है। रंगमंच की ट्रेनिंग को जरूरी बताते हुए वे कहते हैं कि इससे कलाकार में अनुशासन और किरदार को समझने की क्षमता विकसित होती है। वहीं कैमरा अभिनेता को सहज होना सिखाता है। उनके शब्दों में, अभिनय की असली खूबी यही है कि मेहनत दिखाई नहीं देनी चाहिए, इट हैज टू बी एफर्टलेस।