10 अगस्त 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

तिरंगा जिनके हाथ में था… लाठियां उन्हीं पर सबसे ज्यादा बरसीं, जानिए रायपुर की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी की कहानी

freedom fighters of Raipur: तिरंगा हाथ में लेकर आजादी की लड़ाई लड़ने वाली रायपुर की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी की कहानी जानिए, जिन पर अंग्रेजों ने आंदोलन के दौरान जमकर लाठियां बरसाईं।
2 min read
Google source verification
Freedom fighters of Raipur

रायपुर की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राधाबाई (Photo Patrika)

Freedom fighters of Raipur: @ ताबीर हुसैन। डॉ. राधाबाई रायपुर की पहली प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों में गिनी जाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनके पास न तो मेडिकल की डिग्री थी और न ही पीएचडी, फिर भी उनके सेवा-भाव और जनसेवा के कारण लोग उन्हें सम्मान से डॉ. राधाबाई कहने लगे। उनका जन्म 1875 में नागपुर में हुआ। मात्र नौ वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं। वर्ष 1918 में वे रायपुर आईं और नगर पालिका में दाई (मिडवाइफ) के रूप में काम करने लगीं।

गरीब महिलाओं की निस्वार्थ सेवा के कारण वे पूरे शहर में लोकप्रिय

गरीब महिलाओं की निस्वार्थ सेवा के कारण वे पूरे शहर में लोकप्रिय हो गईं। 1920 में महात्मा गांधी के रायपुर आगमन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। इसके बाद उन्होंने चरखा, स्वदेशी, विदेशी वस्त्र बहिष्कार, शराबबंदी, अस्पृश्यता उन्मूलन और महिला जागरण को अपना मिशन बना लिया। वे घर-घर जाकर महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ती थीं।

सबसे यादगार घटना

इतिहासकार रामेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं, 1930 में जब सत्याग्रहियों को अमरावती जेल से रायपुर लाया गया, तब राधाबाई महिलाओं के साथ स्टेशन पहुंचीं। एक हाथ में तिरंगा और दूसरे हाथ में भोजन की थाली लेकर उन्होंने सत्याग्रहियों का स्वागत किया। इससे नाराज अंग्रेज कलेक्टर ने लाठीचार्ज का आदेश दिया। तिरंगा थामे होने के कारण सबसे अधिक लाठियां राधाबाई पर बरसीं, लेकिन उन्होंने झंडा नहीं छोड़ा। 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्होंने महिलाओं के जुलूस का नेतृत्व किया। उन्हें 20 अन्य महिला सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार कर छह माह की सजा दी गई। इसके बाद भी वे भारत छोड़ो आंदोलन तक सक्रिय रहीं और कई बार जेल गईं।

कॉलेज का नामकरण

1986 में शुरू हुए गर्ल्स कॉलेज का नाम 2012 में डॉ. राधाबाई के नाम पर किया गया। प्राचार्य वीके जोशी ने बताया कि कॉलेज का खुद का भवन नहीं था बाद में मठपारा में बिल्डिंग बनाई गई।

नौ साल की उम्र में विधवा हो गई थीं राधाबाई

डॉ. राधाबाई का जन्म 1875 में नागपुर में हुआ था। बचपन में ही उनके जीवन पर ऐसा दुख आया, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। महज नौ वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं। उस दौर में बाल विवाह और कम उम्र में विधवा होना महिलाओं के लिए बेहद कठिन सामाजिक परिस्थितियां पैदा करता था। लेकिन राधाबाई ने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी। उन्होंने अपने जीवन को दूसरों की सेवा के लिए समर्पित करने का रास्ता चुना।

लाठियां बरसीं लेकिन तिरंगा हाथ से नहीं छूटा

उस समय अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं था। प्रदर्शन, जुलूस या तिरंगा लेकर सार्वजनिक रूप से सामने आना भी जोखिम भरा था। ऐसे माहौल में राधाबाई का बिना डरे आंदोलन में आगे रहना उनके मजबूत इरादे को दिखाता है। लाठीचार्ज के दौरान उन्हें कितनी भी चोट लगी हो, लेकिन उन्होंने तिरंगे को हाथ से नहीं छोड़ा। यही घटना उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बन गई—जिस महिला ने सेवा से लोगों का भरोसा जीता, उसी महिला ने जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी हुकूमत की लाठियां भी सह लीं।

एक नजर में

जन्म: 1875, नागपुर
1918 में रायपुर आईं
पेशा: नगर पालिका में दाई (मिडवाइफ)।
महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ीं।
2 जनवरी 1950 को निधन हुआ।