
CG High Court: आपसी सहमति से तलाक याचिका खारिज करना गलत, हाई कोर्ट ने दिया अहम निर्णय(photo-patrika)
CG High Court: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करने वाले अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सदस्य भी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के दायरे में आ सकते हैं।
न्यायालय ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि केवल अनुसूचित जनजाति से होने के आधार पर किसी को इस अधिनियम के प्रावधानों से बाहर नहीं किया जा सकता। आपसी सहमति से तलाक याचिका खारिज करना गलत, हाई कोर्ट ने दिया अहम निर्णयफैमिली कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट ने किया रद्द
यह फैसला जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनाया। अदालत ने जगदलपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आदिवासी पति और उसकी अनुसूचित जाति की पत्नी द्वारा दायर आपसी सहमति से तलाक की याचिका को खारिज कर दिया गया था।
दंपती ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत जगदलपुर स्थित पारिवारिक न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी। दोनों की शादी को करीब 20 वर्ष हो चुके थे और लंबे समय से अलग रहने के कारण उन्होंने कानूनी रूप से विवाह विच्छेद का निर्णय लिया था।
जगदलपुर फैमिली कोर्ट ने 12 अगस्त 2022 को अपना फैसला सुनाते हुए दंपती की याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2 का हवाला देते हुए कहा था कि यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता, जब तक कि केंद्र सरकार की ओर से इसके लिए कोई अधिसूचना जारी न की जाए। इसी आधार पर याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था।
फैमिली कोर्ट के इस फैसले को दंपती ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने मामले के सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों का परीक्षण किया और पाया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करता है, तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों से बाहर नहीं रखा जा सकता।
मामले के अनुसार बस्तर जिले का रहने वाला अपीलकर्ता अनुसूचित जनजाति से है, जबकि उसकी पत्नी अनुसूचित जाति से संबंधित है। दोनों की शादी 15 अप्रैल 2009 को हुई थी। 28 दिसंबर 2011 को उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ, जो वर्तमान में मां के साथ रह रहा है।
बताया गया कि पति-पत्नी 6 अप्रैल 2014 से अलग रह रहे हैं। लंबे समय तक अलग रहने के बाद दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने का फैसला किया और इसके लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे बाद में खारिज कर दिया गया था।
हाई कोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट हुआ है कि परिस्थितियों के आधार पर अनुसूचित जनजाति के सदस्य भी हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में आ सकते हैं, विशेष रूप से तब जब वे हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हों। इस फैसले से ऐसे मामलों में भविष्य में कानूनी प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
Published on:
08 Mar 2026 03:52 pm
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