
CG News: प्रदेश में सर्वाधिक टमाटर उत्पादन करने वाला दुर्ग जिला इन दिनों टमाटर की बंपर पैदावार से दुखी है। कड़ी मेहनत से तैयार की गई टमाटर की फसल किसानों के लिए अब संकट बन गई है। खुले बाजार में 50 रुपए में 7 से 10 किलो तक बिक रहा हैं, जबकि थोक में 3 से 4 रुपए प्रति किलो की दर पर भी खरीदार नहीं मिल रहे। हालत यह है कि कई किसानों ने तुड़ाई ही छोड़ दी है, तो कुछ सडक़ पर टमाटर फेंकने को मजबूर हैं। बता दें कि दुर्ग जिले का धमधा इलाके में टमाटर की जोरदार पैदावार होती है। यहां से टमाटर देश के कई महानगरों और सऊदी अरब तक निर्यात होता है।
आंकड़ों में समझें स्थिति
प्रदेश में लगभग 64 हजार हेक्टेयर में टमाटर की खेती होती है, जिससे करीब 11 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होता है। इसमें दुर्ग जिले का सर्वाधिक योगदान है। पिछले सीजन में जिले में 9,507 हेक्टेयर में टमाटर की फसल लगाई गई थी, जिससे जनवरी तक 1.90 लाख मीट्रिक टन से अधिक उत्पादन हुआ। जिले की अनुकूल जलवायु और तकनीक के उपयोग से पैदावार तो बेहतर हुई, लेकिन जब एक साथ बड़ी मात्रा में टमाटर बाजार में पहुंचा, तो दाम औंधे मुंह गिर गए।
खर्च भी नहीं निकल रहा
किसानों का कहना है कि खेत से टमाटर तोड़कऱ मंडी तक ले जाने में जितना खर्च आता है, बिक्री के बाद उतनी राशि भी वापस नहीं मिलती। परसुली के किसान विष्णु पटेल के मुताबिक, ऐसी स्थिति में फसल को खेत में सडऩे देना या सडक़ पर फेंकना मजबूरी बन गई है। टमाटर की तुड़ाई हर दो दिन में होती है। प्रत्येक तुड़ाई में प्रति एकड़ 1,000 से 2,500 रुपए तक की उपज निकलती है। यदि औसतन 15 तुड़ाई का नुकसान जोड़ा जाए, तो प्रति एकड़ 15,000 से 37,500 रुपए तक की क्षति होती है। जिले के रकबे के आधार पर यह नुकसान 37 से 90 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है।
फूड पार्क की योजना कागजों पर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जिले में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और टमाटर प्रोसेसिंग प्लांट (सॉस, प्यूरी, केचअप निर्माण) होते, तो किसानों पर तत्काल बिक्री का दबाव नहीं रहता। पूर्व में दुर्ग में कोल्ड स्टोरेज और पाटन-धमधा में फूड पार्क की योजना बनी थी, लेकिन यह कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी।
नुकसान की रकम से बन सकती हैं कई इकाइयां
100 मीट्रिक टन क्षमता का कोल्ड स्टोरेज: 1 से 1.5 करोड़ रुपए
बड़ा स्टोरेज: लगभग 10 करोड़ रुपए
छोटी फूड प्रोसेसिंग इकाई: 20 से 40 लाख रुपए
बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट: 7 से 15 करोड़ रुपए
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
किसानों का आरोप है कि हर वर्ष बंपर आवक के समय यही स्थिति बनती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं होती। जनप्रतिनिधि और संबंधित विभाग मौन हैं। टमाटर, जो कभी किसानों के लिए नकदी फसल माना जाता था, अब घाटे का सौदा बनता जा रहा है। किसान संगठनों का कहना है कि हर साल टमाटर फेंकने से जितना नुकसान होता है, उतनी राशि से कई स्टोरेज व प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जा सकती हैं।
Updated on:
13 Feb 2026 01:08 am
Published on:
13 Feb 2026 01:08 am
