
चुनावी मौसम में अधपके चावल से गरम हो गया धान का कटोरा
आवेश तिवारी/रायपुर. छत्तीसगढ़ में किसानों की कर्जमाफी और धान के समर्थन मूल्य ने राज्य की चुनावी राजनीति में भूचाल ला दिया है। अब जबकि चुनाव ख़त्म हो चुके हैं और परिणामों की प्रतीक्षा है। अपने-अपने कलेजे को थामे बैठे नेताओं और आम जनता के मन में यह सवाल बार बार उठ रहा है कि धान के समर्थन मूल्य का राजनैतिक असर इतना व्यापक क्यों कर है?
वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में धान का समर्थन मूल्य 2100 रुपए करने की बात कही थी। यह भी वादा किया गया था कि किसानों का एक-एक दाना धान समर्थन मूल्य पर खरीदा जाएगा। लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बावजूद राज्य सरकार किसानों को बोनस देने को लेकर कोई निर्णय नहीं ले सकी। क्योंकि, केंद्र सरकार उस वक्त बोनस देने के पक्ष में नहीं थी।
सर्वाधिक दुखद यह हुआ कि केंद्र में भाजपा सरकार आने से पहले किसानों का एक एक दाना धान खऱीदा जाता था, लेकिन जब सरकार बदली तो पहले प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदी की सीमा निर्धारित कर दी गई। जब चारों ओर से किसानों द्वारा विरोध किया जाने लगा तो यह सीमा बढ़ाकर 15 क्विंटल प्रति एकड़ कर दी गई। नहीं भुला जाना चाहिए कि उस वक्त संयुक्त किसान मोर्चा और भाजपा समर्थित भारतीय किसान संघ ने पूरे प्रदेश में सरकार के फैसले के विरोध में आंदोलन चलाया था ।
हाइब्रिड बीजों के महंगे दाम से कराहता रहा किसान
इसी साल जुलाई में केंद्र सरकार द्वारा धान की सामान्य किस्म का एमएसपी 200 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया, जो अब तक का रेकॉर्ड है। यह 1,550 से 1,750 रुपए क्विंटल हो गया है। ग्रेड-ए किस्म के धान का समर्थन मूल्य 180 रुपए बढ़ाकर 1,590 से 1,770 रुपए क्विंटल किया गया। रमन सरकार ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सितम्बर माह में किसानों को 300 रुपए प्रति क्विंटल अतिरिक्त बोनस देने का भी ऐलान कर दिया, लेकिन किसानों के उत्पाद का एक-एक दाना लिया जाए इसकी कोई व्यवस्था नहीं की गई। दूसरा पहलू भी था देसी किस्म की बीजों से एक एकड़ में 15 क्विंटल से ज्यादा धान की पैदावार नहीं होती, जबकि हाइब्रिड से किसान इतनी ही जमीन में 25 क्विंटल तक पैदावार करता है।
ऐसे में ज्यादातर किसान हाइब्रिड बीजों की ओर भागने लगे। स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंटरनेशन कंपनी बायर का भारत के हाइब्रिड बीजों के बाजार में 35 फीसदी हिस्सेदारी है। कंपनी का दावा है कि वो हर साल लगभग 38,000 टन हाइब्रिड धान के बीज का कारोबार करती है, जिसकी कीमत 250-300 रुपए प्रति किलो है। बाजार हाइब्रिड धान मांगता रहा और छत्तीसगढ़ के कर्ज में डूबे किसानों के पास महंगे बीज खरीदने के लिए पैसे ही नहीं रहे।
फसल बीमाकर्ताओं की मनमानी
किसानों के इस हाल के पीछे फसल बीमा के तौर-तरीके भी जिम्मेदार हैं । अगर सरकारी आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2016 के दौरान राज्य के 14 लाख किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत मौसमी आपदाओं से बचाव के लिए बीमा कराया था। इनमें से केवल 90 हजार यानी कि 6 फीसदी किसानों को ही बीमा का लाभ मिला। अगले वर्ष यानी 2017 में खरीद के सीजन में किसानों की संख्या 13 लाख हो गई। बीमा का लाभ भी 5 लाख 60 हजार किसानों को मिला, लेकिन बीमा कराने वाले किसानों की संख्या 7 फीसदी घट गई। आश्चर्यजनक यह रहा कि किसानों से प्रति एकड़ बीमा के लिए 400 रुपए लेने वाली बीमा कंपनियों ने मुआवजे का भुगतान 15 से 20 रुपए किया, जबकि धान खरीदी के समय ही किसानों से फसल बीमा का पैसा काट लिया जाता है ।
सोसायटी भी करने लगी किसानों का शोषण
रायपुर जिले के आरंग ब्लाक का एक गांव है तुलसी। वहां के एक किसान हैं रामदयाल। इस गांव के लोगों ने फसल बीमा को लेकर ही चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया था। रामदयाल बताते हैं कि फसल बीमा कम्पनियांं हम लोगों के साथ मजाक करती है। एक तो समर्थन मूल्य बेहद कम है। पिछले साल फसल बर्बाद हुई तो हमें 66 रुपए 33 पैसे मुआवाजे के दिए गए। धान खेत में बिल्कुल नहीं हुआ। सोसायटी में बेचना तो दूर घर में खाने लायक भी खेत में धान नहीं हुआ है। रामदयाल बताते हैं जब हमने सोसायटी से बीज खरीदा था तब सोसायटी ने बिना पूछे फसल का बीमा कर दिया था। फसल नहीं होने पर अब उसी सोसायटी के माध्यम से उसे कंपनी की तरफ से फसल बीमा के रूप में ये राशि मिली है। अब किसान ऐसे में नाराज नहीं होगा तो क्यों भला?
छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए एक बड़ी समस्या यह भी है कि धान की अधिक कीमत मिलने के कारण ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र, मध्य प्रदेश का धान भी यहां आकर बिक जाता था। यह गड़बड़ी रोकने के लिए राज्य सरकार द्वारा धान के फसल के रकबे की जानकारी ली जाने लगी। किसानों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया गौरतलब है कि 2013 -14 में यूपीए सरकार के जाते- जाते छत्तीसगढ़ के धान बेचने के लिए 15 लाख 69 हजार 397 किसानों ने पंजीयन करवाया था। इनमें से 11 लाख 60 हजार 360 ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 80 लाख मीट्रिक टन धान बेचा था। जो कि रेकार्ड था। लेकिन बाद के वर्षोंं में यह उत्पादन कम होता चला गया।
Published on:
24 Nov 2018 03:16 pm
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